👑⚔️ Bajirao peshwa I — अजेय सेनानायक और मराठा साम्राज्य का विस्तारक
मराठा साम्राज्य के स्वर्णकाल में Bajirao peshwa I का नाम अजेय सेनानायक और रणनीति‑धुरी के रूप में दर्ज है। वे वह युद्ध‑निर्माता थे जिन्होंने पालखेड़ विजय (1728), दिल्ली अभियान (1737), और बुंदेलखंड की मुक्ति में निर्णायक भूमिका निभाई। उनकी पहचान केवल एक सेनानायक तक सीमित नहीं—एक राजनीतिक निर्माता जिन्होंने अनुशासन, साहस और गति से मराठा साम्राज्य को अखिल भारतीय शक्ति बना दिया। मराठा‑मुगल संघर्ष और साम्राज्य विस्तार की इस गाथा में उनका नाम अमर, भूमिका निर्णायक और विरासत प्रेरणादायी है। अगर यह संदर्भित इतिहास आपको गर्व से भरता है, तो इसे शेयर करें—क्योंकि साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, गति और दूरदर्शिता से टिकती हैं। 👑⚔️
🏰 प्रस्तावना: जब एक 20 वर्षीय युवक ने मुगल साम्राज्य को हिला दिया
अठारहवीं शताब्दी का प्रारंभ। मुगल साम्राज्य, जो कभी दिल्ली से दक्कन तक फैला था, अब अपने पतन के दौर में था। औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुगल सम्राट कमजोर हो चुके थे। उत्तर भारत में अराजकता फैली हुई थी।
ठीक इसी समय, दक्षिण में एक युवक का उदय हो रहा था जो भारतीय इतिहास को बदल देने वाला था। वह युवक था – Bajirao Peshwa I, जिन्हें इतिहास Bajirao Peshwa I या बाजीराव बल्लाल के नाम से जानता है।
18 अगस्त 1700 को नासिक जिले के सिन्नर गांव में जन्मे Bajirao Peshwa I ने अपने जीवन में वह कार्य किया जो किसी महाकाव्य से कम नहीं। उन्होंने केवल 20 वर्षों (1720-1740) में मराठा साम्राज्य को एक क्षेत्रीय शक्ति से अखिल भारतीय महाशक्ति में बदल दिया।
17 अप्रैल 1720 – यह तारीख मराठा इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी गई। इस दिन छत्रपति शाहू ने केवल 19 वर्ष (कुछ स्रोतों के अनुसार 20 वर्ष) के Bajirao Peshwa I को पेशवा नियुक्त किया। कई वरिष्ठ सरदारों ने इस नियुक्ति का विरोध किया – उन्हें लगा कि यह युवक बहुत कम उम्र का है। लेकिन Bajirao Peshwa I ने अपनी योग्यता से सबको चुप करा दिया।
Bajirao Peshwa I ने छत्रपति शाहू से कहा था: “मुगल साम्राज्य एक विशाल वृक्ष की तरह है। मैं उसकी जड़ों पर प्रहार करूंगा और पूरा वृक्ष गिर जाएगा!” (Strike at the roots and the biggest Mughal tree will fall down)
और उन्होंने अपनी बात को सच कर दिखाया। अगले 20 वर्षों में, बाजीराव ने:

- 41 युद्ध लड़े और सभी जीते
- मुगल राजधानी दिल्ली पर हमला किया
- निज़ाम को घुटनों पर ला दिया
- मालवा, गुजरात, राजपुताना, बुंदेलखंड में मराठा प्रभुत्व स्थापित किया
- मराठा साम्राज्य को कर्नाटक से दिल्ली तक फैलाया
28 अप्रैल 1740 को खरगोन (मध्य प्रदेश) के रावेरखेड़ी में नर्मदा नदी के तट पर उनकी मृत्यु हुई। वे केवल 39 वर्ष के थे, लेकिन उन्होंने अपने छोटे जीवन में वह कार्य किया जो कई शासक अपने पूरे जीवन में नहीं कर पाते।
ब्रिटिश फील्ड मार्शल बर्नार्ड मोंटगोमरी ने अपनी पुस्तक “A Concise History of Warfare” में बाजीराव की युद्ध रणनीति का अध्ययन किया और उनकी प्रशंसा की। अमेरिकी सेना के जनरल जॉर्ज पैटन की रणनीति की तुलना बाजीराव से की जाती है।
इतिहासकार सर रिचर्ड कार्नैक टेम्पल ने लिखा: “वे जैसे जिए, वैसे ही मरे – अपने सैनिकों के बीच, तंबू में। उन्हें आज भी मराठों में ‘लड़ाकू पेशवा’ और ‘हिंदू ऊर्जा का अवतार’ के रूप में याद किया जाता है।”
आज के इस विस्तृत ब्लॉग में हम बाजीराव पेशवा प्रथम के जीवन की हर पहलू को जानेंगे – उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक, उनकी विजयों से लेकर उनकी विरासत तक। यह केवल एक ऐतिहासिक लेख नहीं है – यह उस महावीर की संपूर्ण जीवनी है जिसे इतिहासकार “मराठा साम्राज्य के सबसे महान सेनापति” कहते हैं।
⚔️ Bajirao Peshwa I का प्रारंभिक जीवन – योद्धा का जन्म
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि:
Bajirao Peshwa I का जन्म 18 अगस्त 1700 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के सिन्नर गांव में हुआ था। कुछ स्रोतों में जन्म वर्ष 1699 भी दिया गया है, लेकिन अधिकांश विश्वसनीय स्रोत 1700 को सही मानते हैं।
वे कोंकणस्थ चितपावन ब्राह्मण परिवार से थे। उनके पिता Bajirao Peshwa I मराठा साम्राज्य के पहले वंशानुगत पेशवा थे। उनकी माता का नाम राधाबाई बर्वे था।
बाजीराव का जन्म नाम “विसाजी” था। बाद में उन्हें “बाजीराव” और “बल्लाल” नामों से जाना गया। मराठी में उन्हें “राऊ” (राऊ) या “थोराले बाजीराव” (बड़े बाजीराव – अपने पोते बाजीराव द्वितीय से अलग करने के लिए) भी कहा जाता था।
भाई-बहन:
बाजीराव चार भाई-बहन थे:
- बाजीराव (सबसे बड़े)
- चिमाजी अप्पा (छोटे भाई) – जो बाद में महान योद्धा बने और वसई किले को पुर्तगालियों से जीता
- अनुबाई (बहन)
- भीऊबाई (बहन)
Bajirao Peshwa I और चिमाजी अप्पा के बीच गहरा स्नेह था। दोनों भाई साथ खेलते, प्रशिक्षण लेते, और युद्धों में साथ लड़ते थे। चिमाजी अप्पा हमेशा बाजीराव के सबसे विश्वसनीय सहयोगी रहे।
शिक्षा और प्रशिक्षण:
Bajirao Peshwa I एक विशेषाधिकार प्राप्त परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ पेशवा थे, इसलिए बाजीराव को सर्वोत्तम शिक्षा और प्रशिक्षण मिला।
शैक्षणिक शिक्षा:
- संस्कृत, मराठी, और फारसी भाषाओं का ज्ञान
- वेद, उपनिषद, और धर्मशास्त्र का अध्ययन
- राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र
- फारसी का ज्ञान विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि यह मुगल दरबार की भाषा थी
सैन्य प्रशिक्षण: Bajirao Peshwa I को प्रसिद्ध मराठा घुड़सवार सेना के जनरलों द्वारा प्रशिक्षित किया गया था जो 27 वर्षों के युद्ध में अनुभवी थे। इन जनरलों में शामिल थे:

- संताजी घोरपड़े की परंपरा के अनुयायी
- धनाजी जाधव की रणनीति के जानकार
- आनंदराव माकाजी की युद्ध तकनीकों के विशेषज्ञ
Bajirao Peshwa I के प्रेरणा स्रोत थे:
- छत्रपति शिवाजी महाराज – मराठा साम्राज्य के संस्थापक
- संताजी घोरपड़े – गुरिल्ला युद्ध के मास्टर
पिता के साथ अनुभव:
Bajirao Peshwa I ने बचपन से ही अपने पिता के साथ सैन्य अभियानों में भाग लेना शुरू कर दिया। उनकी माता राधाबाई अक्सर व्यस्त रहती थीं, इसलिए बाजीराव अपने पिता के करीब रहे।
1719 का दिल्ली अभियान: जब बालाजी विश्वनाथ मुगल दरबार में संधि के लिए दिल्ली गए, तब 19 वर्षीय Bajirao Peshwa I भी उनके साथ थे। इस यात्रा ने युवा बाजीराव को एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया:
“मुगल साम्राज्य पतन के कगार पर है। यह अब मराठा विस्तार का विरोध करने में असमर्थ है।”
यह अहसास बाजीराव की भविष्य की रणनीति का आधार बना।
दामाजी थोरात की घटना: एक बार बालाजी विश्वनाथ को दामाजी थोरात ने बंदी बना लिया और फिरौती के लिए कैद कर दिया। युवा बाजीराव भी इस घटना के गवाह थे। बाद में फिरौती देकर बालाजी को मुक्त किया गया। इस घटना ने बाजीराव को सिखाया कि मराठा राजनीति में विश्वासघात हमेशा संभव है।
व्यक्तित्व:
युवा Bajirao Peshwa I:
- तीव्र बुद्धि – सैन्य रणनीति में प्रतिभाशाली
- साहसी और निडर – जोखिम लेने से नहीं डरते थे
- महत्वाकांक्षी – मराठा साम्राज्य को अखिल भारतीय शक्ति बनाने का सपना
- सादा जीवन – वैभव और लक्जरी में रुचि नहीं थी
- सैनिकों के साथ – हमेशा अपनी सेना के साथ तंबू में रहते थे
👑 पेशवा नियुक्ति 1720 – 20 वर्षीय युवक की चुनौती
पिता की मृत्यु – 12 अप्रैल 1720:
12 अप्रैल 1720 को बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो गई। वे केवल 58 वर्ष के थे। उनकी मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए एक बड़ा झटका थी।
अब सवाल उठा – नया पेशवा कौन होगा?
17 अप्रैल 1720 – बाजीराव की नियुक्ति:
पिता की मृत्यु के केवल पांच दिन बाद, 17 अप्रैल 1720 को छत्रपति शाहू ने Bajirao Peshwa I को पेशवा नियुक्त किया।
बाजीराव उस समय केवल 19 वर्ष (लगभग 20 वर्ष) के थे। यह अत्यंत असामान्य था। पेशवा पद अत्यंत महत्वपूर्ण था – यह मराठा साम्राज्य का वास्तविक मुख्य कार्यकारी अधिकारी था।
विरोध:
कई वरिष्ठ मराठा सरदारों ने इस नियुक्ति का विरोध किया। उनका तर्क था:
- Bajirao Peshwa I बहुत युवा हैं
- उनके पास अनुभव की कमी है
- कई वरिष्ठ सरदार हैं जो अधिक योग्य हैं
लेकिन छत्रपति शाहू ने बाजीराव की प्रतिभा को पहचाना। शाहू ने देखा था कि:
- बाजीराव में असाधारण सैन्य प्रतिभा है
- वे अपने पिता के साथ दिल्ली अभियान में रहे थे
- उनमें नेतृत्व के गुण हैं
बाजीराव का पहला भाषण:
नियुक्ति के बाद, Bajirao Peshwa I ने छत्रपति शाहू के दरबार में एक प्रसिद्ध भाषण दिया। उन्होंने कहा:
“हिंदवी स्वराज्य को हिमालय तक फैलाना है! मुगल साम्राज्य एक विशाल वृक्ष की तरह है जिसकी जड़ें सड़ चुकी हैं। मैं उसकी जड़ों पर प्रहार करूंगा और पूरा वृक्ष गिर जाएगा!”
यह भाषण इतिहास में प्रसिद्ध है। यह बाजीराव की दूरदर्शिता और महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।

प्रारंभिक चुनौतियां:
पेशवा बनने के बाद बाजीराव को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा:
1. निज़ाम-उल-मुल्क असफ जाह: हैदराबाद का निज़ाम दक्कन में एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरा था। वह शाहू या संभाजी द्वितीय (कोल्हापुर) में से किसी को भी मराठा सिंहासन का वैध उत्तराधिकारी नहीं मानता था।
2. मालवा और गुजरात में अधिकार स्थापित करना: मराठाओं ने हाल ही में इन क्षेत्रों को जीता था, लेकिन वहां के स्थानीय शासक मराठा अधिकार को मानने से इनकार कर रहे थे।
3. सिद्दी और पुर्तगाली: कोंकण तट पर जंजीरा का सिद्दी और वसई के पुर्तगाली अभी भी स्वतंत्र थे और मराठा नियंत्रण को चुनौती दे रहे थे।
4. मुगल साम्राज्य: हालांकि कमजोर, मुगल साम्राज्य अभी भी एक बड़ी शक्ति था।
Bajirao Peshwa I की रणनीति:
Bajirao Peshwa I ने अपनी रणनीति स्पष्ट की:
1. युवा नेतृत्व को बढ़ावा: Bajirao Peshwa I ने अपने जैसे युवा और प्रतिभाशाली लोगों को बढ़ावा दिया:
- मल्हार राव होलकर (धनगर समुदाय से)
- रानोजी शिंदे (कुनबी समुदाय से)
- उदाजी राव पवार, तुकोजी राव पवार, और जीवाजी राव पवार (पवार भाई)
- फतेह सिंह भोसले
ये सभी युवा थे और दक्कन सल्तनतों के वंशानुगत देशमुख परिवारों से नहीं थे। बाजीराव ने योग्यता के आधार पर नियुक्ति की, न कि जाति या परिवार के आधार पर।
2. पुणे को मुख्यालय बनाना: 1728 में, बाजीराव ने अपना मुख्यालय सासवड़ से पुणे स्थानांतरित किया। यह एक रणनीतिक निर्णय था।
1730 में, उन्होंने शनिवार वाड़ा (Shaniwar Wada) का निर्माण शुरू किया। यह 1732 में पूरा हुआ। शनिवार वाड़ा पेशवा शक्ति का प्रतीक बन गया और पुणे एक छोटे कस्बे से एक बड़े शहर में बदल गया।
3. परिवारों का समर्थन: बाजीराव को पुरंधरे परिवार का बहुत समर्थन मिला। पुरंधरे परिवार भट पेशवा परिवार के करीबी मित्र थे।
🗡️ पालखेड़ का युद्ध 1728 – निज़ाम को घुटनों पर लाना
संदर्भ:
निज़ाम-उल-मुल्क असफ जाह प्रथम मुगल साम्राज्य का दक्कन का वायसराय था। लेकिन औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसने वास्तव में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था।
1721 में, मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने निज़ाम को वज़ीर (प्रधान मंत्री) बनाया। निज़ाम ने दिल्ली में सम्राट द्वारा भेजी गई सेना को साखर-खेड़ा युद्ध में हराया। बाजीराव ने मराठा सेना के साथ निज़ाम की मदद की।
लेकिन जल्द ही, निज़ाम और मराठाओं के बीच संघर्ष शुरू हो गया। निज़ाम ने:
- मराठाओं को दक्कन प्रांतों से चौथ एकत्र करने का अधिकार नहीं दिया
- शाहू को मराठा सिंहासन का वैध उत्तराधिकारी नहीं माना
- मराठा क्षेत्रों में हस्तक्षेप शुरू किया
युद्ध की शुरुआत:
1727 में, निज़ाम ने पुणे पर हमला किया। उसने शहर को लूटा और नष्ट किया। Bajirao Peshwa I उस समय मालवा में थे।
जब बाजीराव को खबर मिली, वे तुरंत वापस आए। लेकिन तब तक निज़ाम पुणे छोड़कर वापस चला गया था।
बाजीराव ने निर्णय लिया कि अब निज़ाम को सबक सिखाना होगा।
बाजीराव की रणनीति – गुरिल्ला युद्ध:
फरवरी-मार्च 1728 में, Bajirao Peshwa I ने निज़ाम के खिलाफ अभियान शुरू किया। लेकिन उन्होंने सीधा हमला नहीं किया। Bajirao Peshwa I ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई:
1. तेज घुड़सवार हमले: मराठा घुड़सवार सेना बिजली की तरह तेज थी। वे अचानक हमला करते थे और तुरंत गायब हो जाते थे।
2. आपूर्ति लाइनें काटना: बाजीराव ने निज़ाम की आपूर्ति लाइनों को काट दिया। निज़ाम की सेना को भोजन और चारा नहीं मिल सका।
3. दुश्मन के पीछे हमला: मराठा सेना ने निज़ाम नियंत्रित क्षेत्रों पर हमला किया – औरंगाबाद, जालना, और अन्य स्थानों पर।
4. निज़ाम को घेरना: बाजीराव ने निज़ाम को पालखेड़ (औरंगाबाद के पास) में घेर लिया।

पालखेड़ में घेराबंदी:
निज़ाम की स्थिति खराब हो गई:
- उसकी सेना को भोजन नहीं मिल रहा था
- पानी की कमी थी
- मराठा सेना ने चारों ओर से घेरा डाला था
- कोई सुदृढीकरण नहीं आ सकता था
ब्रिटिश फील्ड मार्शल बर्नार्ड मोंटगोमरी ने अपनी पुस्तक में पालखेड़ अभियान का अध्ययन किया। उन्होंने लिखा कि बाजीराव की रणनीति अमेरिकी जनरल जॉर्ज पैटन की “maneuver warfare” रणनीति के समान थी।
मुख्य विशेषताएं:
- तेज आंदोलन – मराठा सेना बिना आपूर्ति लाइन के तेजी से आगे बढ़ती थी
- स्थानीय संसाधनों पर निर्भरता – सेना स्थानीय रूप से भोजन और चारा इकट्ठा करती थी
- दुश्मन को संतुलन से बाहर रखना – लगातार हमलों से निज़ाम समझ नहीं पा रहा था कि कहां से हमला होगा
मुंगी-पैठण की संधि – 6 मार्च 1728:
निज़ाम को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा। 6 मार्च 1728 को मुंगी-पैठण (कुछ स्रोतों में “मुंगी-शिवगांव”) में एक शांति संधि पर हस्ताक्षर हुए।
संधि की शर्तें:
- छत्रपति शाहू को एकमात्र मराठा शासक के रूप में मान्यता
- मराठाओं को दक्कन के छह सूबों से चौथ और सरदेशमुखी एकत्र करने का अधिकार
- निज़ाम मराठा क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं करेगा
परिणाम:
यह Bajirao Peshwa I की पहली बड़ी जीत थी। केवल 27 वर्ष की उम्र में, उन्होंने एक शक्तिशाली निज़ाम को हराया।
इस जीत ने:
- बाजीराव की प्रतिष्ठा स्थापित की
- मराठा साम्राज्य में दक्कन पर अधिकार मजबूत किया
- युवा पेशवा की सैन्य प्रतिभा को साबित किया
🏹 बुंदेलखंड अभियान – छत्रसाल की सहायता और मस्तानी
महाराजा छत्रसाल – बुंदेलखंड के शासक:
महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड (मध्य भारत) के एक राजपूत शासक थे। वे वृद्ध और शक्तिशाली थे, और उन्होंने मुगलों के खिलाफ लड़ते हुए अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था।
1729 में, मुगल सूबेदार मुहम्मद खान बंगश (इलाहाबाद का गवर्नर) ने छत्रसाल पर हमला किया। बंगश एक शक्तिशाली मुगल सेनापति था और उसकी विशाल सेना थी।
वृद्ध छत्रसाल (80 वर्ष से अधिक उम्र) अपने किले में घिर गए। उन्होंने सहायता के लिए बाजीराव को संदेश भेजा।
बाजीराव की तीव्र प्रतिक्रिया:
बाजीराव उस समय दक्कन में थे। जब उन्हें छत्रसाल का संदेश मिला, वे तुरंत कार्यवाही में आ गए।
Bajirao Peshwa I ने तेज घुड़सवार सेना के साथ बुंदेलखंड की ओर मार्च किया। उन्होंने अपने सैनिकों के साथ अविश्वसनीय गति से यात्रा की।
मार्च 1729 में, Bajirao Peshwa I बुंदेलखंड पहुंचे और बंगश की सेना पर हमला किया।
बंगश की पराजय:
बाजीराव की अचानक उपस्थिति से बंगश चौंक गया। मराठा घुड़सवार सेना ने मुगल सेना पर तीव्र हमले किए।
बंगश को पीछे हटना पड़ा और अंततः भागना पड़ा। बुंदेलखंड स्वतंत्र रहा।
छत्रसाल की कृतज्ञता:
वृद्ध महाराजा छत्रसाल बाजीराव के प्रति अत्यंत कृतज्ञ थे। उन्होंने Bajirao Peshwa I को:
- बुंदेलखंड का एक तिहाई हिस्सा जागीर के रूप में दिया – जिसमें कालपी, झांसी, और अन्य क्षेत्र शामिल थे
- 33 लाख रुपये नकद दिए
- अपनी पुत्री का हाथ Bajirao Peshwa I को दिया
मस्तानी – बाजीराव का दूसरा विवाह:
छत्रसाल की पुत्री का नाम मस्तानी था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, मस्तानी छत्रसाल की मुस्लिम उपपत्नी (concubine) से पैदा हुई थीं, इसलिए वे आधी राजपूत और आधी मुस्लिम थीं।
Bajirao Peshwa I ने राजनीतिक कारणों से मस्तानी से विवाह किया। यह विवाह छत्रसाल को खुश करने और बुंदेलखंड के साथ संबंध मजबूत करने के लिए था।
विवाद:

बाजीराव-मस्तानी विवाह बेहद विवादास्पद था:
विरोध के कारण:
- मस्तानी मुस्लिम थीं (या आधी मुस्लिम) – रूढ़िवादी हिंदू ब्राह्मण समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया
- बाजीराव की पहली पत्नी काशीबाई – उन्हें यह विवाह पसंद नहीं आया
- पुणे का रूढ़िवादी समाज – चितपावन ब्राह्मण समुदाय ने इसका विरोध किया
- पेशवा परिवार – बाजीराव की माता और रिश्तेदारों ने विरोध किया
बाजीराव का प्रेम: हालांकि विवाह राजनीतिक कारणों से हुआ, लेकिन बाजीराव और मस्तानी के बीच गहरा प्रेम विकसित हुआ। बाजीराव ने मस्तानी के लिए पुणे में एक महल बनवाया जिसे “मस्तानी महल” कहा जाता था।
शमशेर बहादुर – बाजीराव और मस्तानी का पुत्र:
1734 में, मस्तानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जन्म के समय उसका नाम कृष्णराव था।
लेकिन क्योंकि उसकी माता मुस्लिम थीं, रूढ़िवादी पुणे के हिंदू पुजारियों ने उसका उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत/जनेऊ धारण करना) करने से इनकार कर दिया।
बाजीराव बहुत निराश हुए। उन्होंने अपने पुत्र को ब्राह्मण के रूप में स्वीकार करवाना चाहा, लेकिन सफल नहीं हो सके।
अंततः, बालक को मुस्लिम परंपरा के अनुसार पाला गया और उसका नाम शमशेर बहादुर रखा गया।
काशीबाई – बाजीराव की पहली पत्नी:
काशीबाई बाजीराव की पहली और मुख्य पत्नी थीं। उनका विवाह 1720 में हुआ था। वे महादजी कृष्ण जोशी की पुत्री थीं, जो चास (पुणे के पास) के एक धनी बैंकिंग परिवार से थीं।
बाजीराव हमेशा काशीबाई के प्रति सम्मान और प्रेम दिखाते थे। उनका रिश्ता स्वस्थ और खुशहाल था।
काशीबाई के पुत्र:
- बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) – बाद में पेशवा बने
- रामचंद्र राव
- रघुनाथ राव
- जनार्दन राव – छोटी उम्र में मर गए
काशीबाई की महानता: बाजीराव और मस्तानी की मृत्यु के बाद, काशीबाई ने 6 वर्षीय शमशेर बहादुर को गोद ले लिया और अपने पुत्र की तरह पाला। यह उनकी महानता का प्रमाण है।
शमशेर बहादुर को बांदा और कालपी की जागीर दी गई। 1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में, शमशेर बहादुर ने मराठा सेना के साथ लड़ाई की। युद्ध में घायल होने के बाद, वे कुछ दिनों बाद दीग में मर गए।
🛡️ दिल्ली अभियान 1737 – मुगल राजधानी पर हमला
संदर्भ – मुगल कमजोरी:
1730 के दशक तक, मुगल साम्राज्य बेहद कमजोर हो चुका था। मुगल सम्राट मुहम्मद शाह “रंगीला” विलासिता में डूबे रहते थे और राज्य की परवाह नहीं करते थे।
Bajirao Peshwa I ने महसूस किया कि अब समय आ गया है मुगल राजधानी दिल्ली पर हमला करने का।
उद्देश्य:
Bajirao Peshwa I के दिल्ली अभियान के कई उद्देश्य थे:
- मुगल कमजोरी को दिखाना – पूरी दुनिया को बताना कि मुगल साम्राज्य अब कमजोर है
- मराठा शक्ति का प्रदर्शन – उत्तर भारत में मराठा प्रभुत्व स्थापित करना
- चौथ और सरदेशमुखी – मुगल प्रांतों से कर एकत्र करने का अधिकार
- निज़ाम और मुगलों को घेरना – दोनों को एक साथ दबाव में लाना
अभियान की शुरुआत – नवंबर 1736:
12 नवंबर 1736 को, Bajirao Peshwa I ने 50,000 घुड़सवारों की विशाल सेना के साथ पुणे से दिल्ली अभियान शुरू किया।
यह सेना के साथ थे:
- चिमाजी अप्पा (बाजीराव के भाई)
- मल्हार राव होलकर
- रानोजी शिंदे
- पवार भाई
- अन्य मराठा सरदार
मार्ग:
Bajirao Peshwa I ने मालवा होते हुए उत्तर की ओर मार्च किया। रास्ते में:
दिसंबर 1736 – भोपाल पहुंचे, जहां यार मुहम्मद शासक था। बाजीराव ने उससे 5 लाख रुपये वसूले।
5 जनवरी 1737 – भिलसा पहुंचे।
मुगल प्रतिक्रिया:
मुगल सम्राट ने सआदत अली खान (अवध के नवाब) को 1,50,000 सैनिकों की विशाल सेना के साथ मराठाओं को रोकने भेजा।
जालेसर की लड़ाई – 12 मार्च 1737:
मल्हार राव होलकर और पिलाजी जाधव ने यमुना नदी पार की और गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में लूटपाट शुरू की।
12 मार्च 1737 की सुबह, मल्हार राव का सामना मुगल अग्रिम दस्ते से हुआ जिसका नेतृत्व अबुल मंसूर खान (बाद में सफदरजंग) कर रहे थे।
यह एक कठिन लड़ाई थी। मल्हार राव को पीछे हटना पड़ा और लगभग 1,500 मराठा सैनिक मारे गए।

दिल्ली पर हमला – 28 मार्च 1737:
लेकिन Bajirao Peshwa I ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक चालाक रणनीति अपनाई – सआदत खान को चकमा देकर, वे सीधे आगरा-दिल्ली मार्ग के बजाय जाट और मेवाती पहाड़ी मार्ग से गए।
28 मार्च 1737 को, मराठा सेना दिल्ली के बाहरी इलाके तलकटोरा में पहुंच गई!
यह भारतीय इतिहास का एक अविश्वसनीय क्षण था। मुगल राजधानी के द्वार पर मराठा सेना खड़ी थी!
दिल्ली में आतंक:
दिल्ली में आतंक फैल गया। नागरिकों ने सोचा कि मराठा सेना किसी भी क्षण शहर पर हमला कर सकती है।
मुगल सम्राट ने मीर हसन खान कोका को मराठाओं को रोकने भेजा। मराठाओं ने उन्हें हरा दिया।
बातचीत और वापसी:
Bajirao Peshwa I को पता चला कि सआदत खान की विशाल सेना दिल्ली की ओर आ रही है। बाजीराव ने समझदारी दिखाई – उन्होंने दिल्ली को पूरी तरह नष्ट करने के बजाय बातचीत का रास्ता चुना।
Bajirao Peshwa I ने:
- मुगल सम्राट से चौथ प्राप्त किया
- मालवा और अन्य क्षेत्रों में मराठा अधिकार की पुष्टि कराई
- मुगल कमजोरी को पूरी दुनिया के सामने उजागर किया
फिर वे सम्मान के साथ वापस लौट गए।
परिणाम:
यह मराठा सैन्य करियर का शिखर माना जाता है। बाजीराव ने साबित कर दिया कि:
- मुगल साम्राज्य अब कमजोर है
- मराठा उत्तर भारत में प्रमुख शक्ति हैं
- दिल्ली अब अजेय नहीं है
इतिहासकारों का मानना है कि यह वह क्षण था जब मुगल साम्राज्य का पतन निश्चित हो गया।
💣 भोपाल का युद्ध 1737 – निज़ाम की निर्णायक पराजय
पृष्ठभूमि:
दिल्ली अभियान के बाद, मुगल सम्राट ने निज़ाम को उत्तर की ओर बुलाया। निज़ाम ने:
- अपने बेटे के लिए मालवा की गवर्नरी हासिल करने की कोशिश की
- मराठाओं को मालवा से बाहर निकालने का प्रयास किया
1737 के अंत में, निज़ाम ने एक विशाल सेना के साथ मार्च किया। उसके साथ थे:
- मुगल सेनापति
- राजपूत टुकड़ियां (सवाई जय सिंह द्वितीय जयपुर से)
- भारी तोपखाना
घेराबंदी रणनीति:
Bajirao Peshwa I ने सीधे युद्ध करने के बजाय घेराबंदी की रणनीति अपनाई। दिसंबर 1737 के मध्य से, मराठाओं ने भोपाल के आसपास घेरा डाल दिया।
रणनीति:
- आपूर्ति लाइनें काटना – निज़ाम की सेना को भोजन और चारा नहीं मिल सका
- पानी के स्रोतों को नियंत्रित करना – भोपाल में पानी की कमी हो गई
- सीधा हमला नहीं करना – बाजीराव ने धैर्य से काम लिया
- सुदृढीकरण रोकना – चिमाजी अप्पा को 10,000 सैनिकों के साथ भेजा गया ताकि दिल्ली से आने वाले किसी भी सुदृढीकरण को रोका जा सके

युद्ध – 24 दिसंबर 1737:
24 दिसंबर 1737 को, निर्णायक युद्ध हुआ। निज़ाम की सेना भुखमरी और थकावट से कमजोर हो चुकी थी।
मराठा घुड़सवार सेना ने तेज हमले किए। निज़ाम की भारी तोपें मराठा तेज घुड़सवारों के खिलाफ बेकार साबित हुईं।
निज़ाम को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
दोराहा की संधि – 7 जनवरी 1738:
7 जनवरी 1738 को, दोराहा (भोपाल के पास) में एक शांति संधि पर हस्ताक्षर हुए।
संधि की शर्तें:
- मालवा प्रांत मराठाओं को दिया गया
- मुगल साम्राज्य ने 50 लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने पर सहमति व्यक्त की
- निज़ाम ने कुरान पर शपथ ली कि वह संधि का पालन करेगा
परिणाम:
यह Bajirao Peshwa I की सबसे बड़ी जीतों में से एक थी। इसने:
- मालवा में मराठा प्रभुत्व स्थापित किया
- निज़ाम की शक्ति को कमजोर किया
- मराठा साम्राज्य को मध्य भारत में मजबूत किया
⚔️ वसई का युद्ध 1739 – पुर्तगालियों के खिलाफ अभियान
पृष्ठभूमि:
वसई (Bassein) मुंबई के उत्तर में स्थित एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था। यह पुर्तगालियों के नियंत्रण में था।
पुर्तगालियों ने:
- किले को बेहद मजबूत बनाया था
- यूरोपीय तोपखाना और हथियार थे
- व्यापार पर एकाधिकार था
मराठा साम्राज्य चाहता था कि पश्चिमी तट पर पूर्ण नियंत्रण हो।

अभियान:
चिमाजी अप्पा (Bajirao Peshwa I के छोटे भाई) ने इस अभियान का नेतृत्व किया। बाजीराव ने उन्हें पूर्ण समर्थन दिया।
1738 से 1739 तक, मराठा सेना ने वसई किले का घेरा डाले रखा। यह एक लंबी और कठिन घेराबंदी थी।
विजय – मई 1739:
मई 1739 में, मराठाओं ने वसई किले पर कब्जा कर लिया। पुर्तगालियों को हार माननी पड़ी।
यह यूरोपीय शक्तियों के लिए एक बड़ा झटका था। इसने साबित किया कि:
- मराठा आधुनिक यूरोपीय किलों को भी जीत सकते हैं
- पश्चिमी तट पर मराठा प्रभुत्व स्थापित हो गया
- यूरोपीय शक्तियों को मराठा सैन्य क्षमता का एहसास हुआ
💔 अंतिम दिन और मृत्यु – 28 अप्रैल 1740
स्वास्थ्य का बिगड़ना:
Bajirao Peshwa I का शरीर निरंतर युद्धों और सैन्य अभियानों से थक चुका था। 20 वर्षों में उन्होंने:
- 41 युद्ध लड़े
- हजारों किलोमीटर की यात्रा की
- तंबू में सैनिकों के साथ रहे
- आराम नहीं किया
अंतिम अभियान:
1740 की शुरुआत में, Bajirao Peshwa I फिर से उत्तर की ओर जा रहे थे। वे एक लाख (100,000) सैनिकों के साथ दिल्ली की ओर मार्च कर रहे थे।
रास्ते में, वे रावेरखेड़ी (खरगोन, मध्य प्रदेश) में अपनी जागीर का निरीक्षण करने के लिए रुके।
बीमारी:
23 अप्रैल 1740 को, बाजीराव को तेज बुखार हुआ। प्रारंभ में लक्षण हल्के थे।
26 अप्रैल तक, बुखार इतना बढ़ गया कि Bajirao Peshwa I प्रलाप (delirium) में चले गए।
28 अप्रैल 1740 – मृत्यु:
28 अप्रैल 1740 को रविवार, रात लगभग 8:30 बजे के बाद, बाजीराव का निधन हो गया।
वे केवल 39 वर्ष के थे।
अंतिम संस्कार:

Bajirao Peshwa I का उसी दिन नर्मदा नदी के तट पर अंतिम संस्कार किया गया।
बालाजी बाजीराव (नानासाहेब, बाजीराव के पुत्र) ने रानोजी शिंदे को आदेश दिया कि वे बाजीराव की स्मृति में एक छतरी (स्मारक) बनाएं।
रावेरखेड़ी में आज भी बाजीराव की छतरी मौजूद है। यह एक सुंदर स्मारक है जिसमें:
- एक धर्मशाला (विश्राम गृह)
- रामेश्वर मंदिर (शिव को समर्पित)
- छतरी (स्मारक संरचना)
मृत्यु का कारण:
इतिहासकारों का मानना है कि बाजीराव की मृत्यु:
- गर्मी से लू (heat stroke) के कारण हुई
- या वायरल बुखार के कारण
- शरीर की थकावट – 20 वर्षों के निरंतर युद्धों ने शरीर को पूरी तरह थका दिया था
इतिहासकार का मत:
सर रिचर्ड कार्नैक टेम्पल ने लिखा:
“वे जैसे जिए, वैसे ही मरे – शिविर में, तंबू में, अपने सैनिकों के बीच। आज भी मराठों में उन्हें ‘लड़ाकू पेशवा’ और ‘हिंदू ऊर्जा का अवतार’ के रूप में याद किया जाता है।”
🏛️ बाजीराव की युद्ध रणनीति – विश्व इतिहास में अद्वितीय
41 युद्ध, 41 विजय, शून्य हार:
Bajirao Peshwa I विश्व इतिहास के केवल तीन सेनापतियों में से एक हैं जिन्होंने कभी कोई युद्ध नहीं हारा। अन्य दो हैं:
- अलेक्जेंडर द ग्रेट
- चंगेज खान के पोते सुबुताई
युद्ध रणनीति:
1. तीव्र घुड़सवार आंदोलन: Bajirao Peshwa I की सेना अविश्वसनीय गति से चलती थी। ऐसा कहा जाता है कि:
- उनकी घुड़सवार सेना एक दिन में 60-70 किलोमीटर यात्रा कर सकती थी
- सामान्य सेना 20-30 किलोमीटर प्रति दिन चलती थी
2. आपूर्ति लाइनों की आवश्यकता नहीं: बाजीराव की सेना स्थानीय रूप से भोजन और चारा इकट्ठा करती थी। इससे:
- सेना तेजी से चल सकती थी
- दुश्मन को आपूर्ति लाइनें काटने का मौका नहीं मिलता था
3. दुश्मन को घेरना: बाजीराव हमेशा दुश्मन को घेरने (encircle) की कोशिश करते थे। वे:
- दुश्मन के पीछे से हमला करते थे
- दुश्मन को आश्चर्य में डालते थे
- दुश्मन की आपूर्ति लाइनें काटते थे

4. मनोवैज्ञानिक युद्ध: बाजीराव दुश्मन को मानसिक रूप से कमजोर करते थे। वे:
- अप्रत्याशित दिशाओं से हमला करते थे
- दुश्मन को लगातार दबाव में रखते थे
- दुश्मन को संतुलन से बाहर रखते थे
ब्रिटिश फील्ड मार्शल मोंटगोमरी का अध्ययन:
ब्रिटिश फील्ड मार्शल बर्नार्ड मोंटगोमरी ने अपनी पुस्तक “A Concise History of Warfare” में पालखेड़ अभियान का विस्तृत अध्ययन किया।
उन्होंने Bajirao Peshwa I की रणनीति की तुलना अमेरिकी जनरल जॉर्ज पैटन की “maneuver warfare” से की।
मोंटगोमरी ने लिखा कि बाजीराव:
- Mobile warfare (मोबाइल युद्ध) के मास्टर थे
- दुश्मन को पीछे से हमला करने में विशेषज्ञ थे
- बिना भारी आपूर्ति लाइनों के तेजी से आगे बढ़ सकते थे
📜 बाजीराव की विरासत – मराठा साम्राज्य का स्वर्णिम युग
उत्तराधिकार:
Bajirao Peshwa I के ज्येष्ठ पुत्र बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) को छत्रपति शाहू ने पेशवा नियुक्त किया।
नानासाहेब ने 1740 से 1761 तक शासन किया और मराठा साम्राज्य को और भी फैलाया।
बाजीराव की उपलब्धियां:
1. मराठा साम्राज्य का विस्तार: जब Bajirao Peshwa I 1720 में पेशवा बने, मराठा साम्राज्य केवल पश्चिमी भारत में था। 1740 में उनकी मृत्यु तक:
- कर्नाटक से दिल्ली तक मराठा प्रभुत्व
- मालवा, गुजरात, राजपुताना, बुंदेलखंड में मराठा अधिकार
- कोंकण तट पुर्तगालियों से मुक्त
2. मुगल साम्राज्य का पतन: Bajirao Peshwa I ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की – “मुगल साम्राज्य की जड़ों पर प्रहार करना”। उन्होंने:
- दिल्ली पर हमला किया
- मुगल कमजोरी को उजागर किया
- मराठाओं को भारत की प्रमुख शक्ति बनाया

3. युवा नेतृत्व: बाजीराव ने युवा और प्रतिभाशाली लोगों को बढ़ावा दिया:
- मल्हार राव होलकर – होलकर राजवंश के संस्थापक
- रानोजी शिंदे – शिंदे (सिंधिया) राजवंश के संस्थापक
- पवार भाई – दशकों तक मराठा सेना के प्रमुख कमांडर
प्रतिज्ञा:
Bajirao Peshwa I ने प्रतिज्ञा की थी कि वे हिमालय पर मराठा ध्वज फहराएंगे। हालांकि वे स्वयं यह नहीं कर सके, लेकिन उनके पुत्र रघुनाथ राव ने 1757 में अटक किले (पाकिस्तान में, सिंधु नदी के पार) पर भगवा ध्वज फहराया!
ऐतिहासिक मूल्यांकन:
इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने लिखा: “बाजीराव पेशवा भारतीय इतिहास के सबसे महान सेनापतियों में से एक थे।”
📚 निष्कर्ष: रणमर्द – युद्ध का पुरुष
Bajirao Peshwa I की कहानी भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरक कहानियों में से एक है। केवल 39 वर्षों का जीवन, लेकिन ऐसा प्रभाव जो शताब्दियों तक रहा।
18 अगस्त 1700 से 28 अप्रैल 1740 – एक ऐसी यात्रा जो सिन्नर के एक छोटे गांव से शुरू हुई और दिल्ली के लाल किले तक पहुंची। एक ऐसी यात्रा जिसमें 41 युद्ध, अनगिनत विजय, और एक भी हार नहीं थी।
बाजीराव को “रणमर्द” (युद्ध का पुरुष) कहा जाता था। यह उपाधि उन्होंने अपने साहस, रणनीति, और समर्पण से अर्जित की।
बाजीराव पेशवा प्रथम को नमन!
❓ FAQ – Bajirao Peshwa I
👉 क्या सच है कि Bajirao peshwa I ने युद्धों में कभी स्थायी शिविर नहीं बनाया?
उत्तर:
हाँ, यह उनकी सबसे अनोखी रणनीति थी। Bajirao peshwa I ने स्थायी शिविर या किले पर भरोसा नहीं किया। वे मानते थे कि गति ही सुरक्षा है। उनकी सेना लगातार गतिशील रहती थी, जिससे दुश्मन को उनकी स्थिति का अनुमान ही नहीं होता था। यह रणनीति उस समय की परंपरागत युद्ध‑नीति से बिल्कुल अलग थी।
👉 Bajirao peshwa I ने अपने अभियानों में नए सेनानायकों को कैसे चुना?
उत्तर:
हाँ, लेकिन बहुत सूक्ष्म तरीके से। वे अपने सैनिकों को “जय भवानी” और “जय शिवाजी” के उद्घोष से प्रेरित करते थे। यह उद्घोष केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक‑राजनीतिक प्रतीक था, जिसने सैनिकों को यह याद दिलाया कि वे केवल भूमि के लिए नहीं, बल्कि मराठा गौरव और स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं।
👉 क्या Bajirao peshwa I ने कभी युद्ध के दौरान धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया?
उत्तर:
हाँ, लेकिन बहुत सूक्ष्म तरीके से। वे अपने सैनिकों को “जय भवानी” और “जय शिवाजी” के उद्घोष से प्रेरित करते थे। यह उद्घोष केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक‑राजनीतिक प्रतीक था, जिसने सैनिकों को यह याद दिलाया कि वे केवल भूमि के लिए नहीं, बल्कि मराठा गौरव और स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं।
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— HistoryVerse7: Discover. Learn. Remember.
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