🌸👑 Dharau Gade Patil: 7 Unbreakable, Inspiring & Untold Facts — संभाजी महाराजांची दूध आई, मातृत्व, निष्ठा आणि स्वराज्याची अमर छाया! ⚔️🔥
👑⚔️ Dharau Gade Patil — मातृशक्ति की अमिट छाप मराठा साम्राज्य की गाथा में Dharau Gade Patil का नाम मातृ‑निष्ठा और त्याग का प्रतीक है। वे वह दूध आई थीं जिन्होंने छत्रपति संभाजी महाराज को जन्म के बाद अपनी गोद में पोषित किया और स्वराज्य की नींव को स्थिरता दी। उनकी पहचान केवल पालन‑पोषण तक…
👑⚔️ Dharau Gade Patil — मातृशक्ति की अमिट छाप
मराठा साम्राज्य की गाथा में Dharau Gade Patil का नाम मातृ‑निष्ठा और त्याग का प्रतीक है। वे वह दूध आई थीं जिन्होंने छत्रपति संभाजी महाराज को जन्म के बाद अपनी गोद में पोषित किया और स्वराज्य की नींव को स्थिरता दी। उनकी पहचान केवल पालन‑पोषण तक सीमित नहीं रही—एक Silent Strength जिन्होंने परिवार‑धुरी, मातृ‑संस्कार और आजीवन निष्ठा के माध्यम से मराठा साम्राज्य को भावनात्मक आधार दिया। कापुरहोळ से पुरंदर तक उनकी मातृ‑सेवा, निष्ठा और त्याग आज भी संस्कृति और नेतृत्व की पाठशाला है। यदि यह विरासत आपको प्रेरित करती है, तो इसे शेयर करें—क्योंकि साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि मातृशक्ति, त्याग और संस्कार से टिकती हैं। 👑⚔️
👑 प्रस्तावना: मातृत्व की अमर गाथा
महाराष्ट्र के गौरवशाली इतिहास में अनेक नायक-नायिकाओं ने अपना अमूल्य योगदान दिया है। राजा, रानी, सरदार, योद्धा – इन सभी की कहानियां हमें पता हैं। लेकिन इतिहास के पन्नों पर ऐसे कई नाम हैं जो शायद बड़े अक्षरों में नहीं लिखे गए, लेकिन जिनके बिना इतिहास अधूरा रहता। धाराऊ गाडे पाटील ऐसा ही एक नाम है जो मराठा इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर बड़े आदर से लिया जाना चाहिए।
Dharau Gade Patil छत्रपति संभाजी महाराज की दूध माता थीं। जब छत्रपति शिवाजी महाराज की पहली पत्नी साईबाई बीमार पड़ीं और नवजात संभाजी राजे को दूध पिलाने में असमर्थ हो गईं, तब धाराऊ बाई ने अपनी ममता और दूध से संभाजी राजे का पालन-पोषण किया। यह केवल शारीरिक पोषण नहीं था बल्कि एक पवित्र रिश्ता था जो जीवन भर टिका रहा।

भारतीय संस्कृति में दूध माता की परंपरा को बहुत पवित्र माना जाता है। जन्म देने वाली माता और दूध माता दोनों को समान आदर दिया जाता है। Dharau Gade Patil की कहानी इस परंपरा का अनुपम उदाहरण है।
आज के समय में कपुरहोल गांव (पुणे जिले के भोर तालुका में) में Dharau Gade Patil का वाड़ा और स्मारक है जो उनके इस महान योगदान की गवाही देते हैं। हजारों श्रद्धालु और इतिहास प्रेमी हर साल इस पवित्र स्थल की यात्रा करते हैं और धाराऊ बाई को नमन करते हैं।
🏛️ धाराऊ गाडे पाटील: मूल तथ्य और पहचान
Dharau Gade Patil का संबंध पुणे जिले के भोर तालुका के कपुरहोल गांव से था। गाडे परिवार एक प्रतिष्ठित पाटील परिवार था जो उस क्षेत्र में सम्मानित था। 17वीं शताब्दी के दौरान, मावळ प्रदेश (पुणे के आसपास का पहाड़ी क्षेत्र) शिवाजी महाराज के स्वराज्य स्थापना के केंद्र में था।
प्रमाणित तथ्य:

- पहचान: Dharau Gade Patil छत्रपति संभाजी महाराज की दूध माता थीं
- स्थान: कपुरहोल गांव, भोर तालुका, पुणे जिला, महाराष्ट्र
- भूमिका: जब साईबाई (शिवाजी महाराज की पहली पत्नी) बीमार पड़ीं, तब धाराऊ बाई ने नवजात संभाजी को स्तनपान कराया
- विरासत: उनका पैतृक घर (वाड़ा) और स्मारक आज भी कपुरहोल में संरक्षित है
- महत्व: वे संभाजी महाराज के प्रारंभिक जीवन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थीं
Dharau Gade Patil का यह योगदान केवल शारीरिक पोषण तक सीमित नहीं था। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि दूध माता बच्चे के प्रारंभिक जीवन में उसके विकास, संस्कार और भावनात्मक सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
गाडे परिवार का शिवाजी महाराज के परिवार से संबंध था, जिसके कारण धाराऊ बाई को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। यह विश्वास और सम्मान का प्रतीक था।
👶 साईबाई का स्वास्थ्य और धाराऊ की भूमिका
14 मई 1657 को पुरंदर किले पर संभाजी राजे का जन्म हुआ। यह शिवाजी महाराज के जीवन का एक बहुत ही खुशी का क्षण था क्योंकि उन्हें उत्तराधिकारी मिला था। साईबाई लाल महल के निंबाळकर परिवार से थीं और शिवाजी महाराज की पहली पत्नी थीं।
दुर्भाग्य से, प्रसव के बाद साईबाई गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। उस समय चिकित्सा सुविधाएं बहुत सीमित थीं और प्रसव के बाद की बीमारियां अक्सर जानलेवा होती थीं। साईबाई की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती गई और वे नवजात संभाजी राजे को स्तनपान कराने में असमर्थ हो गईं।
ऐतिहासिक संदर्भ:
- साईबाई का स्वास्थ्य संभाजी के जन्म के बाद बिगड़ गया
- 1659 में (संभाजी के जन्म के लगभग 2 वर्ष बाद) साईबाई का निधन हो गया
- इस दौरान धाराऊ बाई ने संभाजी राजे की देखभाल की

उस समय दूध माता की परंपरा भारतीय समाज में प्रचलित थी। जब कोई माता अपने बच्चे को दूध नहीं पिला सकती थी, तो किसी दूसरी महिला की मदद ली जाती थी जिसका अपना बच्चा होता था और वह स्तनपान करा रही होती थी।
Dharau Gade Patil की उस समय अपनी संतान थी और वे पूर्ण स्वास्थ्य में थीं। गाडे परिवार की प्रतिष्ठा, Dharau Gade Patil का अच्छा चरित्र और शिवाजी महाराज के परिवार से पहले से संबंध होने के कारण उनका चयन इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए किया गया।
Dharau Gade Patil ने बिना सोचे इस विनती को स्वीकार कर लिया। एक राजकुमार का पालन-पोषण करना केवल सम्मान नहीं था बल्कि एक पवित्र कर्तव्य था।
🍼 दूध माता की परंपरा: भारतीय संस्कृति में महत्व
भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से मराठी संस्कृति में दूध माता की परंपरा को बहुत पवित्र माना जाता है। इस परंपरा का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है और अनेक ऐतिहासिक संदर्भों में दूध माता का उल्लेख मिलता है।
दूध माता परंपरा के मूल सिद्धांत:
- समान आदर: जन्म देने वाली माता और दूध माता दोनों को समान आदर दिया जाता है
- पवित्र रिश्ता: यह रिश्ता जीवन भर का माना जाता है
- सांस्कृतिक महत्व: यह त्याग, प्रेम और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक है
- सामाजिक स्वीकृति: समाज में इसे एक सम्मानजनक भूमिका माना जाता था
प्राचीन भारतीय समाज में यह माना जाता था कि जो महिला किसी बच्चे को दूध पिलाती है, वह उस बच्चे की दूसरी माता बन जाती है। दूध केवल शारीरिक पोषण नहीं बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक पोषण भी देता है – ऐसा विश्वास था।
राजघरानों में दूध माता:

राजघरानों में दूध माता चुनते समय बहुत सावधानी बरती जाती थी। दूध माता का:
- स्वस्थ होना जरूरी था
- अच्छे चरित्र वाली होनी चाहिए
- अच्छे परिवार से होनी चाहिए
- विश्वसनीय होनी चाहिए
- उसका अपना बच्चा भी स्वस्थ होना चाहिए
Dharau Gade Patil की कहानी इस परंपरा का सुंदर उदाहरण है। उन्होंने केवल संभाजी राजे को दूध नहीं दिया बल्कि उनके बचपन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने साथ बिताया।
मराठी समाज में आज भी दूध माता को बहुत सम्मान दिया जाता है। “आई एक, दूधमाई दोन” (एक माता जन्म देती है, दूसरी दूध माता) यह कहावत मराठी लोगों में प्रसिद्ध है।
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👑⚔️ विश्वास, नीति और मातृ‑सेवा का सम्मान
Dharau Gade Patil की भूमिका केवल एक दूध आई तक सीमित नहीं थी। उनके प्रति जो विश्वास और सम्मान राजमाता जिजाऊ और छत्रपति शिवाजी महाराज ने दिखाया, वह मराठा साम्राज्य की मातृ‑नीति और सामाजिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🌸 जिजाऊ का निर्णय
जब संभाजी महाराज का जन्म हुआ और सईबाई अस्वस्थ थीं, तब जिजाऊ ने तुरंत निर्णय लिया कि शिशु को मातृदूध उपलब्ध कराने के लिए किसी विश्वसनीय स्त्री को बुलाया जाए। उन्होंने कापुरहोळ गाँव से धाराऊ को बुलवाया। यह निर्णय केवल मातृत्व का नहीं था, बल्कि यह दर्शाता है कि जिजाऊ को धाराऊ और उनके परिवार पर गहरा विश्वास था।
- जिजाऊ ने यह सुनिश्चित किया कि संभाजी महाराज का पालन‑पोषण किसी ऐसी स्त्री के हाथों हो जो मराठा परंपरा, अनुशासन और निष्ठा को जीती हो।
- यह विश्वास केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि राज्य‑स्तरीय नीति का हिस्सा था।
⚔️ शिवाजी महाराज का सम्मान
Dharau Gade Patil की सेवा को छत्रपति शिवाजी महाराज ने औपचारिक मान्यता दी। उन्होंने Dharau Gade Patil के परिवार को वार्षिक १६ होण की तैनाती दी।

- यह केवल आर्थिक सहायता नहीं थी, बल्कि मातृ‑सेवा को राज्य‑नीति में स्थान देने का संकेत था।
- इससे स्पष्ट होता है कि मराठा साम्राज्य में मातृ‑सेवा को भी उतना ही सम्मान दिया जाता था जितना युद्ध‑सेवा को।
- शिवाजी महाराज का यह कदम बताता है कि वे मातृ‑शक्ति को राज्य‑निर्माण का आधार मानते थे।
👑 परिवार‑आधारित निष्ठा
Dharau Gade Patil के पुत्र अंतोजी और रायाजी आगे चलकर मराठा सेना में शामिल हुए और संभाजी महाराज के साथ रहे। यह दर्शाता है कि धाराऊ का परिवार केवल मातृ‑सेवा ही नहीं, बल्कि सैन्य‑निष्ठा का भी स्तंभ था।
- इस प्रकार, Dharau Gade Patil की सेवा और उनके परिवार की निष्ठा ने मराठा साम्राज्य को भावनात्मक और सैन्य दोनों स्तरों पर स्थिरता दी।
🌺 नीति और विरासत
जिजाऊ और शिवाजी महाराज का धाराऊ पर विश्वास हमें यह समझाता है कि मराठा साम्राज्य में मातृ‑सेवा को औपचारिक सम्मान दिया जाता था। यह नीति बताती है कि राज्य‑निर्माण केवल तलवार और राजनीति से नहीं, बल्कि मातृ‑संस्कार और परिवार‑आधारित निष्ठा से भी होता है।
🏘️ कपुरहोल गांव: धाराऊ की विरासत का स्थान
कपुरहोल गांव पुणे जिले के भोर तालुका में स्थित है। पुणे से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव मावळ प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र में आता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है और मराठा इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा है।
कपुरहोल का महत्व:
- धाराऊ का वाड़ा: गाडे परिवार का मूल वाड़ा आज भी गांव में मौजूद है
- स्मारक: धाराऊ बाई की स्मृति में एक स्मारक बनाया गया है
- विरासत स्थल: यह स्थान मराठा इतिहास का एक महत्वपूर्ण विरासत स्थल माना जाता है
- पर्यटन स्थल: इतिहास प्रेमी और पर्यटक यहां नियमित रूप से आते हैं

वाड़ा की वास्तुकला:
गाडे परिवार का वाड़ा 17वीं शताब्दी की मराठी वास्तुकला का नमूना है। पारंपरिक मराठी शैली में बना यह वाड़ा उस समय के स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करता है। मोटी दीवारें, लकड़ी के खंभे और पारंपरिक डिजाइन इस वाड़े की विशेषता है।
स्मारक और संरक्षण:
महाराष्ट्र सरकार और स्थानीय संस्थाओं ने इस स्थान को संरक्षित करने के लिए विशेष प्रयास किए हैं। वाड़े के परिसर में Dharau Gade Patil की प्रतिमा स्थापित की गई है जहां वे संभाजी महाराज को गोद में लिए हुए दिखाई गई हैं।
स्थानीय महत्व:
कपुरहोल गांव के स्थानीय लोग धाराऊ बाई की स्मृति को बहुत आदर से रखते हैं। गाडे परिवार के वंशज आज भी गांव और आसपास के क्षेत्रों में रहते हैं और अपनी पूर्वज की विरासत पर गर्व करते हैं।
💡 धाराऊ से सीखे गए सबक: आधुनिक समय में प्रासंगिकता
Dharau Gade Patil के जीवन से हमें कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं जो आज के समय में भी बहुत प्रासंगिक हैं।
1. निस्वार्थ सेवा: Dharau Gade Patil ने एक राजकुमार के पालन-पोषण का कार्य स्वीकार किया। यह निस्वार्थ सेवा का उदाहरण है जो आज के स्वार्थी युग में एक महत्वपूर्ण सबक है।
2. मातृत्व का महत्व: Dharau Gade Patil ने दिखाया कि मातृत्व केवल जन्म देने तक सीमित नहीं है। जो महिला प्रेम और ममता से किसी बच्चे का पालन-पोषण करती है, वह उस बच्चे की माता बन जाती है।
3. जिम्मेदारी निभाना: Dharau Gade Patil ने अपनी जिम्मेदारी बहुत ईमानदारी से निभाई। यह आज के समय में हर व्यक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है।

4. सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण: भारतीय संस्कृति में दूध माता की परंपरा का सम्मान करना हमारी संस्कृति को जीवित रखने का एक तरीका है।
5. महिलाओं की शक्ति: Dharau Gade Patil एक साधारण गांव की महिला थीं, लेकिन उन्होंने इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। उन्होंने दिखाया कि महिलाएं समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
6. त्याग का महत्व: Dharau Gade Patil ने अपने बच्चे के साथ संभाजी राजे का भी समान प्रेम से पालन-पोषण किया। यह त्याग उनकी महानता का प्रतीक है।
7. साधारण जीवन की सुंदरता: Dharau Gade Patil एक साधारण महिला थीं लेकिन उनका योगदान असाधारण था। उन्होंने दिखाया कि महानता बाहरी वैभव में नहीं बल्कि अंतर्मन के गुणों में है।
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👑⚔️ मातृ‑संस्कार और नेतृत्व की नींव
Dharau Gade Patil का सबसे गहरा और स्थायी प्रभाव छत्रपति संभाजी महाराज के व्यक्तित्व और नेतृत्व पर पड़ा। वे केवल दूध पिलाने वाली दूध आई नहीं थीं, बल्कि उन्होंने संभाजी के जीवन में भावनात्मक स्थिरता, अनुशासन और मातृ‑संस्कार का बीज बोया।
🌸 भावनात्मक स्थिरता
संभाजी महाराज का जन्म ऐसे समय हुआ जब उनकी जैविक माता सईबाई अस्वस्थ थीं और बाद में उनका निधन भी हो गया। इस कठिन परिस्थिति में Dharau Gade Patil ने उन्हें अपनी गोद में पोषित किया। यह मातृ‑सेवा संभाजी को भावनात्मक सहारा देती रही। बचपन में मातृ‑स्नेह की कमी को धाराऊ ने पूरा किया, जिससे संभाजी महाराज का व्यक्तित्व दृढ़ और संवेदनशील बना।
⚔️ अनुशासन और संस्कार
Dharau Gade Patil का परिवार कुलवंत मराठा घराना था, जो सामाजिक प्रतिष्ठा और अनुशासन के लिए जाना जाता था। उनके पालन‑पोषण में संभाजी ने अनुशासन, निष्ठा और परंपरा का अनुभव किया। यही संस्कार आगे चलकर उनके नेतृत्व में दिखाई दिए—चाहे वह युद्धभूमि पर साहस हो या राज्य संचालन में दृढ़ता।

👑 नेतृत्व की नींव
संभाजी महाराज का नेतृत्व केवल तलवार की धार पर नहीं, बल्कि मातृ‑संस्कारों पर भी आधारित था। धाराऊ की मातृ‑सेवा ने उन्हें करुणा और दृढ़ता का संतुलन दिया। यही कारण है कि संभाजी महाराज कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहे और स्वराज्य की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया।
🌺 सांस्कृतिक प्रतीक
Dharau Gade Patil का प्रभाव केवल संभाजी के जीवन तक सीमित नहीं रहा। वे मराठा समाज में दूध आई की परंपरा का प्रतीक बनीं। यह परंपरा बताती है कि मातृ‑सेवा को राज्य‑निर्माण का हिस्सा माना जाता था। संभाजी के व्यक्तित्व में जो दृढ़ता और भावनात्मक गहराई थी, उसका आधार धाराऊ की मातृ‑सेवा थी।
📜 निष्कर्ष: एक अविस्मरणीय योगदान
Dharau Gade Patil की कहानी केवल इतिहास का एक भाग नहीं है बल्कि यह एक प्रेरणादायक संदेश है। एक साधारण गांव की महिला, जिन्होंने अपनी ममता और त्याग से मराठा साम्राज्य के भावी राजा की देखभाल की। उनके योगदान का महत्व शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
संभाजी महाराज मराठा साम्राज्य के एक महान राजा थे। उन्होंने औरंगजेब के खिलाफ लड़ते हुए स्वराज्य की रक्षा की। उनके विद्वता, शौर्य और राजनीतिक कुशलता की नींव उनके बचपन में रखी गई थी। इस नींव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा धाराऊ बाई द्वारा दी गई देखभाल, संस्कार और प्रेम था।
धाराऊ बाई की कहानी हमें सिखाती है कि महानता केवल राजा-रानी, सरदार-योद्धाओं तक सीमित नहीं है। साधारण लोग, साधारण काम करने वाले लोग भी इतिहास में अमर योगदान दे सकते हैं। धाराऊ बाई ने कोई तलवार नहीं उठाई, किसी युद्ध में भाग नहीं लिया, लेकिन उनका योगदान किसी भी योद्धा से कम नहीं है।

आज कपुरहोल में Dharau Gade Patil का वाड़ा और स्मारक इस महान महिला की स्मृति के जीवित प्रतीक हैं। हर मराठा को अपने जीवन में एक बार इस पवित्र स्थान की यात्रा करनी चाहिए और धाराऊ बाई को नमन करना चाहिए।
मराठी संस्कृति में मातृत्व का स्थान सर्वोच्च है। “माता” यह शब्द हमारे लिए केवल जन्म देने वाली नहीं बल्कि वह सभी महिलाएं हैं जो प्रेम और ममता से पालन-पोषण करती हैं। धाराऊ गाडे पाटील उन सभी माताओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जिन्होंने निस्वार्थ भाव से बच्चों का पालन-पोषण किया।
Dharau Gade Patil की विरासत केवल कपुरहोल गांव की संपत्ति नहीं है, यह पूरे महाराष्ट्र की, पूरे भारत की संपत्ति है। उनकी कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जानी चाहिए, उनके योगदान को याद किया जाना चाहिए और उनके आदर्शों का अनुसरण किया जाना चाहिए।
“जन्म देती माता एक, दूध माता दो, धाराऊ को करोड़ों नमन। संभाजी राजे को संस्कार जो दिए, स्वराज्य की रक्षा उन्होंने की।”
📚 FAQ – धाराऊ
❓ Q1: Dharau Gade Patil कौन थीं और उनका सबसे बड़ा योगदान क्या था?
👉 Answer:
धाराऊ गाडे पाटील कापुरहोळ गाँव (भोर तालुका, पुणे) की कुलवंत मराठा स्त्री थीं। वे दूध आई बनीं जब सईबाई अस्वस्थ थीं और नवजात संभाजी महाराज को मातृदूध उपलब्ध नहीं था। उन्होंने अपने ही शिशु के साथ संभाजी को दूध पिलाया और पालन‑पोषण किया। यही मातृ‑सेवा संभाजी के व्यक्तित्व और नेतृत्व की नींव बनी।
❓ Q2: शिवाजी महाराज और जिजाऊ ने धाराऊ पर इतना विश्वास क्यों किया?
👉 Answer:
जिजाऊ ने धाराऊ को इसलिए चुना क्योंकि वे कुलवंत घराने से थीं, अनुशासन और निष्ठा का प्रतीक थीं। शिवाजी महाराज ने उनकी सेवा को औपचारिक मान्यता दी और उनके परिवार को १६ होण की वार्षिक तैनाती दी। यह दर्शाता है कि मराठा साम्राज्य में मातृ‑सेवा को भी उतना ही सम्मान दिया जाता था जितना युद्ध‑सेवा को।
❓ Q3: आज धाराऊ गाडे पाटील की विरासत कहाँ जीवित है?
👉 Answer:
धाराऊ का वाडा और स्मारक आज भी कापुरहोळ गाँव में मौजूद है। यह स्थान इतिहास प्रेमियों और स्थानीय समाज के लिए प्रेरणा का केंद्र है। आधुनिक मीडिया, सांस्कृतिक चर्चाएँ और स्थानीय आयोजन उनकी मातृ‑सेवा को जीवित रखते हैं। वे मराठा समाज में Silent Strength की प्रतीक हैं—जहाँ दूध की बूंदें तलवार की धार जितनी निर्णायक बन जाती हैं।
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अगर यह प्रामाणिक, विरासत‑आधारित और ऐतिहासिक रिपोर्ट आपको यह समझा पाई कि मराठा साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि मातृशक्ति, त्याग और संस्कार से टिकती हैं — तो इसे शेयर अवश्य करें। Dharau Gade Patil वह नाम हैं, जिन्होंने पुरंदर किले पर छत्रपति संभाजी महाराज को अपनी गोद में पोषित किया और कापुरहोळ की कुलवंत परंपरा से स्वराज्य को भावनात्मक आधार दिया।
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