⚡ Madhavrao Peshwa — जिस युवा प्रतिभा ने पानीपत की राख से साम्राज्य उठाया, फिर 27 में चला गया
16 वर्ष की आयु। एक टूटा हुआ साम्राज्य। 40,000 शहीद योद्धा। शोक में डूबा पूरा राष्ट्र। 1761 में पानीपत के बाद मराठा साम्राज्य की स्थिति इतनी निराशाजनक थी कि कई इतिहासकारों ने सोचा यह साम्राज्य अब कभी नहीं उबरेगा। लेकिन तब Madhavrao Peshwa (1745-1772) ने इतिहास को गलत साबित किया। यह वही युवक था जो अपने बड़े भाई विश्वासराव की छाया में पला था, जिसे कभी राजनीति का प्रशिक्षण नहीं दिया गया क्योंकि विश्वासराव भावी पेशवा थे। लेकिन जब भाग्य ने उन्हें सिंहासन पर बैठाया, तब Madhavrao Peshwa ने साबित किया कि प्रतिभा उम्र नहीं, चरित्र की बात है। ग्यारह वर्षों में उन्होंने हैदर अली को तीन बार हराया, निजाम को झुकाया, दिल्ली तक मराठा ध्वज पुनः फहराया, और पानीपत के दुःस्वप्न को लगभग भुला दिया। लेकिन 1772 में, तपेदिक ने इस असाधारण नेता को छीन लिया। 27 वर्ष। बस 27। और माधवराव की मृत्यु के साथ मराठा साम्राज्य का स्वर्णिम युग भी समाप्त हो गया। यह लेख उस युवा प्रतिभा की कहानी है जिसने असंभव को संभव किया, और जिसकी असमय मृत्यु ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।
प्रस्तावना: मराठा इतिहास का सबसे प्रतिभाशाली किंतु असमय चला गया नेता
भारतीय इतिहास में कुछ ही नेता ऐसे हुए हैं जिन्होंने इतनी कम आयु में इतना अधिक हासिल किया और फिर अचानक चले गए, अपने पीछे “क्या होता यदि” के प्रश्नों की एक लंबी श्रृंखला छोड़कर। Madhavrao Peshwa (1745-1772) ऐसे ही एक असाधारण व्यक्तित्व थे। मात्र 27 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु ने मराठा साम्राज्य को उस समय छोड़ दिया जब वह अभी-अभी पानीपत की विनाशकारी पराजय (1761) से उबर रहा था।
Madhavrao Peshwa का महत्व केवल उनकी उपलब्धियों में नहीं है, बल्कि उस संदर्भ में भी है जिसमें उन्होंने कार्य किया। 1761 में, जब वे मात्र 16 वर्ष के थे, मराठा साम्राज्य अपने इतिहास के सबसे गहरे संकट में था। पानीपत के युद्ध में 40,000 से अधिक मराठा योद्धा शहीद हो गए थे, जिनमें Madhavrao Peshwa के बड़े भाई विश्वासराव और चाचा सदाशिवराव भाऊ शामिल थे। उनके पिता पेशवा बालाजी बाजीराव शोक और निराशा में उसी वर्ष चल बसे। एक किशोर माधवराव को इस तबाही के मलबे से साम्राज्य का पुनर्निर्माण करना था।

और उन्होंने वास्तव में ऐसा किया। 1761 से 1772 के बीच के ग्यारह वर्षों में, माधवराव ने मराठा शक्ति को पुनर्स्थापित किया, हैदर अली को हराया, निजाम को नियंत्रित किया, उत्तर भारत में मराठा प्रभाव बहाल किया, और आंतरिक प्रशासन को सुदृढ़ किया। जी.एस. सरदेसाई ने Madhavrao Peshwa को “पानीपत के बाद का मराठा पुनरुत्थान का वास्तुकार” कहा है। जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि यदि Madhavrao Peshwa दस वर्ष और जीवित रहते, तो मराठा साम्राज्य का इतिहास पूर्णतः भिन्न होता।
परंतु 1772 में, तपेदिक (क्षय रोग) ने इस प्रतिभाशाली युवा नेता का जीवन समाप्त कर दिया। उनकी मृत्यु के साथ मराठा साम्राज्य पुनः नेतृत्व संकट में फंस गया – एक संकट जिससे वह कभी पूरी तरह उबर नहीं सका। माधवराव की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं है; यह प्रतिभा, दृढ़ संकल्प, और त्रासदी का एक मिश्रण है जो हमें सिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत नेतृत्व साम्राज्यों को बचा सकता है – और उनकी अनुपस्थिति उन्हें कैसे विफल कर सकती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पानीपत के बाद का संकट और उत्तराधिकार चुनौती (1761)
माधवराव के पेशवा बनने की परिस्थितियों को समझने के लिए, हमें 1761 के विनाशकारी वर्ष को विस्तार से समझना होगा। पानीपत का तीसरा युद्ध (14 जनवरी 1761) भारतीय इतिहास के सबसे रक्तरंजित युद्धों में से एक था। मराठा साम्राज्य, जो 1758 तक अटक (वर्तमान पाकिस्तान) से बंगाल तक फैला हुआ था, ने अहमद शाह अब्दाली की अफगान सेना के विरुद्ध एक निर्णायक टकराव का सामना किया।
पराजय विनाशकारी थी। मराठा इतिहासकार खांडेराव दाभाडे और अन्य समकालीन स्रोतों के अनुसार, 40,000 से 60,000 मराठा सैनिक, अधिकारी और नागरिक मारे गए। सदाशिवराव भाऊ (पेशवा के चचेरे भाई और मुख्य सेनापति), विश्वासराव (पेशवा के ज्येष्ठ पुत्र और भावी उत्तराधिकारी), और लगभग सभी प्रमुख सैन्य कमांडर युद्धक्षेत्र में शहीद हो गए। जो बचे वे भूखे, घायल और मनोबलहीन होकर दक्षिण लौटे।
पेशवा बालाजी बाजीराव का पतन: जब पानीपत की खबर पुणे पहुंची, तो पेशवा बालाजी बाजीराव टूट गए। अपने ज्येष्ठ पुत्र विश्वासराव की मृत्यु, अपने चचेरे भाई भाऊ की हानि, और साम्राज्य की इस विनाशकारी पराजय ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से नष्ट कर दिया। उन्होंने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया। जून 1761 में, पानीपत के केवल पांच महीने बाद, बालाजी बाजीराव की भी मृत्यु हो गई। इस प्रकार, एक ही वर्ष में मराठा साम्राज्य ने अपने पेशवा, भावी उत्तराधिकारी, मुख्य सेनापति, और सेना का बड़ा हिस्सा खो दिया।

उत्तराधिकार का प्रश्न: बालाजी की मृत्यु के बाद, उत्तराधिकारी कौन होगा? परंपरागत रूप से यह ज्येष्ठ पुत्र होता, परंतु विश्वासराव पानीपत में मर चुके थे। दूसरा पुत्र Madhavrao Peshwa था—परंतु वह मात्र 16 वर्ष का था, और ऐसे संकट में एक किशोर का नेतृत्व संदेहास्पद लग सकता था। तीसरा विकल्प बालाजी का छोटा भाई रघुनाथराव (राघोबा) था – एक अनुभवी सैन्य कमांडर जो 1758 में अटक तक पहुंचे थे।
परंतु यहां मराठा राजनीति जटिल हो गई। बालाजी की विधवा गोपिकाबाई और प्रभावशाली मंत्री नाना फड़नवीस ने Madhavrao Peshwa का समर्थन किया। उनका तर्क था कि पेशवा पद वंशानुगत रूप से पुत्र को जाना चाहिए, और रघुनाथराव एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे जिन्हें छत्रपति और पेशवा परिवार पूर्णतः विश्वास नहीं करते थे। छत्रपति राजाराम द्वितीय (सातारा के छत्रपति) ने अंततः Madhavrao Peshwa को पेशवा के रूप में नियुक्त किया।
यह निर्णय रघुनाथराव के लिए अपमानजनक था, और इसने एक आंतरिक संघर्ष की नींव रखी जो माधवराव के पूरे शासनकाल को प्रभावित करने वाली थी।
माधवराव का प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व निर्माण (1745-1761)
Madhavrao Peshwa का जन्म 16 फरवरी 1745 को पुणे में हुआ। वे पेशवा बालाजी बाजीराव और रानी गोपिकाबाई के दूसरे पुत्र थे। उनका बचपन मराठा साम्राज्य के स्वर्णिम काल में बीता – जब उनके पिता भारत भर में मराठा शक्ति का विस्तार कर रहे थे। पुणे का शनिवार वाडा, जहां Madhavrao Peshwa पले-बढ़े, उस समय एक सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र था।
शिक्षा और प्रशिक्षण: पेशवा परिवार में जन्म का अर्थ था व्यापक शिक्षा। Madhavrao Peshwa ने संस्कृत, मराठी, और फारसी में शिक्षा प्राप्त की। उन्हें धर्मशास्त्र, काव्य और इतिहास पढ़ाया गया। साथ ही, उन्हें घुड़सवारी, तलवारबाजी, और सैन्य रणनीति में भी प्रशिक्षित किया गया। पेशवा दफ्तर के अभिलेखों से पता चलता है कि Madhavrao Peshwa एक मेधावी छात्र थे जो प्रशासन और सैन्य मामलों में गहरी रुचि रखते थे।

पारिवारिक प्रभाव: Madhavrao Peshwa के व्यक्तित्व पर सबसे गहरा प्रभाव उनकी माता गोपिकाबाई का था। गोपिकाबाई एक बुद्धिमान और दृढ़ महिला थीं जिन्होंने अपने पुत्र को राजनीति की जटिलताओं के बारे में सिखाया। Madhavrao Peshwa अपने बड़े भाई विश्वासराव की छाया में बड़े हुए – विश्वासराव को भावी पेशवा के रूप में तैयार किया जा रहा था, और Madhavrao Peshwa को एक सहायक भूमिका के लिए।
1761 का आघात: जब 1761 में पानीपत की खबर आई, तो 16 वर्षीय Madhavrao Peshwa के लिए यह जीवन बदलने वाला क्षण था। उन्होंने अपने बड़े भाई, चाचा, और हजारों योद्धाओं को खो दिया। कुछ महीनों के भीतर, उन्होंने अपने पिता को भी खो दिया। और अचानक, वह जिम्मेदारी जो विश्वासराव की थी, Madhavrao Peshwa के कंधों पर आ गई। महाराष्ट्र राज्य ग्रंथालय के अभिलेखों में माधवराव के शुरुआती पत्र मिलते हैं जो दर्शाते हैं कि एक किशोर कैसे इस विशाल जिम्मेदारी से जूझ रहा था – परंतु साथ ही उसमें दृढ़ संकल्प और परिपक्वता भी थी।
पेशवा पद की प्राप्ति और प्रारंभिक चुनौतियां (1761-1763)
नवंबर 1761: Madhavrao Peshwa को औपचारिक रूप से पेशवा नियुक्त किया गया। यह एक कठिन शुरुआत थी। मराठा साम्राज्य बिखर रहा था। विभिन्न सरदार – होल्कर, शिंदे, भोंसले, गायकवाड़ – अपनी स्वतंत्र नीतियां अपना रहे थे। राजस्व संग्रह ठप था। सेना का मनोबल नीचे था। और सबसे बड़ी चुनौती—रघुनाथराव की महत्वाकांक्षा।
रघुनाथराव के साथ संघर्ष: रघुनाथराव ने Madhavrao Peshwa की नियुक्ति को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने सक्रिय रूप से Madhavrao Peshwa को कमजोर करने का प्रयास किया। 1762 में, रघुनाथराव ने अपने समर्थकों के साथ एक प्रकार का सैन्य दल बनाया और Madhavrao Peshwa से स्वतंत्र अभियान संचालित करने लगे। यह मराठा राज्य के भीतर एक राज्य बनने जैसा था।
Madhavrao Peshwa को एक नाजुक संतुलन बनाना था। एक ओर, रघुनाथराव एक अनुभवी सैन्य कमांडर थे जिनकी सेवाएं आवश्यक थीं। दूसरी ओर, उनकी महत्वाकांक्षा खतरनाक थी। Madhavrao Peshwa ने कूटनीति और दृढ़ता का संयोजन अपनाया। उन्होंने रघुनाथराव को कुछ स्वायत्तता दी, परंतु महत्वपूर्ण निर्णयों पर नियंत्रण बनाए रखा।

नाना फड़नवीस का उदय: इस कठिन समय में, Madhavrao Peshwa को एक असाधारण मंत्री और सलाहकार मिले—नाना फड़नवीस। नाना एक प्रतिभाशाली प्रशासक और कूटनीतिज्ञ थे जिन्होंने माधवराव को राजनीति की जटिलताओं में नेविगेट करने में सहायता की। माधवराव और नाना की जोड़ी मराठा इतिहास की सबसे प्रभावी राजनीतिक साझेदारियों में से एक बन गई।
प्रारंभिक सैन्य अभियान: Madhavrao Peshwa ने जल्दी समझ लिया कि मराठा शक्ति को पुनर्स्थापित करने के लिए सैन्य सफलता आवश्यक थी। 1762-1763 में, उन्होंने छोटे परंतु सफल अभियानों का संचालन किया जिसने मराठा सेना का मनोबल बढ़ाया। इन प्रारंभिक सफलताओं ने यह संदेश दिया कि पानीपत के बाद भी मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई है।
राजनीतिक और सैन्य उपलब्धियां: मराठा पुनरुत्थान का युग (1763-1772)
Madhavrao Peshwa के शासनकाल की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि उन्होंने केवल ग्यारह वर्षों में पानीपत की तबाही से मराठा साम्राज्य को काफी हद तक पुनर्जीवित कर दिया। उनकी उपलब्धियों को कई श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।
दक्षिण भारत में मराठा प्रभुत्व की पुनर्स्थापना
हैदर अली के विरुद्ध अभियान (1764-1772): Madhavrao Peshwa की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धि हैदर अली के विरुद्ध अभियान थे। हैदर अली, मैसूर का शक्तिशाली शासक, पानीपत के बाद मराठा कमजोरी का लाभ उठाकर विस्तार कर रहे थे। 1764 में, Madhavrao Peshwa ने व्यक्तिगत रूप से एक अभियान का नेतृत्व किया।

1764 का रक्कसी-टंगडी युद्ध: इस निर्णायक युद्ध में Madhavrao Peshwa ने हैदर अली को हराया। यह मराठा सेना के लिए पानीपत के बाद पहली बड़ी जीत थी। हैदर अली को संधि के लिए मजबूर होना पड़ा जिसमें उन्हें मराठों को भारी श्रद्धांजलि देनी पड़ी।
Madhavrao Peshwa ने केवल एक बार नहीं, बल्कि तीन बार (1764, 1766, 1770-1772) हैदर अली को हराया। जी.एस. सरदेसाई ने लिखा है कि Madhavrao Peshwa की दक्षिण नीति इतनी सफल थी कि हैदर अली – जो बाद में ब्रिटिश के विरुद्ध सबसे शक्तिशाली प्रतिरोधी बने – Madhavrao Peshwa के जीवनकाल में मराठों की श्रद्धांजलि देते रहे।
निजाम के साथ संबंध
हैदराबाद का निजाम पारंपरागत रूप से मराठों का प्रतिद्वंद्वी था। Madhavrao Peshwa ने निजाम के साथ एक संतुलित नीति अपनाई – कभी दबाव, कभी कूटनीति। 1763 में, जब निजाम ने मराठा क्षेत्रों पर हमला करने का प्रयास किया, तो Madhavrao Peshwa ने त्वरित प्रतिक्रिया दी और निजाम को पीछे हटने के लिए मजबूर किया।
उत्तर भारत में मराठा प्रभाव की बहाली
पानीपत के बाद उत्तर भारत में मराठा प्रभाव लगभग समाप्त हो गया था। Madhavrao Peshwa ने धीरे-धीरे इसे पुनर्स्थापित किया। उन्होंने दिल्ली के मुगल बादशाह के साथ संबंध सुधारे। रोहिल्खंड, बुंदेलखंड और राजपुताना में मराठा सेनाएं पुनः सक्रिय हुईं। 1771 तक, मराठा प्रभाव पुनः दिल्ली तक पहुंच गया था।
प्रशासनिक सुधार
Madhavrao Peshwa केवल सैन्य नेता नहीं थे; वे एक सक्षम प्रशासक भी थे। उन्होंने राजस्व प्रणाली को सुदृढ़ किया, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण किया, और न्याय प्रणाली में सुधार किया। पेशवा दफ्तर के अभिलेख दिखाते हैं कि Madhavrao Peshwa व्यक्तिगत रूप से प्रशासनिक मामलों में शामिल थे – याचिकाएं पढ़ते थे, न्यायिक मामलों को सुनते थे, और भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित करते थे।
ऐतिहासिक विश्लेषण: इतिहासकारों का दृष्टिकोण
Madhavrao Peshwa पर इतिहासकारों की सहमति लगभग एकमत है – वे मराठा इतिहास के सबसे प्रतिभाशाली पेशवाओं में से एक थे, और उनकी असमय मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए एक विनाशकारी क्षति थी।
जी.एस. सरदेसाई का मूल्यांकन: सरदेसाई ने “न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज” में Madhavrao Peshwa को “पानीपत के बाद मराठा पुनरुत्थान का एकमात्र वास्तुकार” कहा है। उनके अनुसार, Madhavrao Peshwa ने जो हासिल किया वह असाधारण था – एक किशोर ने एक टूटे हुए साम्राज्य को ग्यारह वर्षों में पुनर्जीवित कर दिया।
जदुनाथ सरकार का विश्लेषण: सरकार ने Madhavrao Peshwa की सैन्य और प्रशासनिक प्रतिभा की प्रशंसा की, परंतु साथ ही यह भी बताया कि Madhavrao Peshwa को रघुनाथराव के साथ आंतरिक संघर्ष ने कमजोर किया। सरकार का तर्क है कि यदि Madhavrao Peshwa इस आंतरिक समस्या को हल कर पाते, तो मराठा शक्ति और भी तेजी से बढ़ती।

स्टीवर्ट गॉर्डन का दृष्टिकोण: गॉर्डन ने “द मराठाज 1600-1818” में Madhavrao Peshwa को एक “संक्रमणकालीन नेता” के रूप में देखा – जिन्होंने पानीपत के बाद के संकट को संभाला परंतु मराठा राज्य व्यवस्था की मूलभूत समस्याओं को हल नहीं कर सके। गॉर्डन के अनुसार, मराठा साम्राज्य की विकेंद्रीकृत प्रकृति – जहां विभिन्न सरदार अर्ध-स्वतंत्र थे – एक संरचनात्मक कमजोरी थी जो माधवराव भी पूर्णतः दूर नहीं कर सके।
विवादास्पद प्रश्न: क्या Madhavrao Peshwa यदि जीवित रहते तो ब्रिटिश विस्तार को रोक सकते थे? कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हां – 1770 के दशक में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अभी बंगाल में सीमित थी। एक मजबूत मराठा साम्राज्य उनके विस्तार को चुनौती दे सकता था। परंतु अन्य यह तर्क देते हैं कि ब्रिटिश की तकनीकी और संगठनात्मक श्रेष्ठता अंततः निर्णायक होती।
विरासत और दीर्घकालिक प्रभाव
Madhavrao Peshwa की 18 नवंबर 1772 की मृत्यु ने मराठा साम्राज्य को पुनः गहरे संकट में डाल दिया।
तात्कालिक परिणाम: Madhavrao Peshwa के कोई पुत्र नहीं थे। उनके उत्तराधिकारी उनके छोटे भाई नारायणराव बने – परंतु नारायणराव मात्र 18 वर्ष के थे और राजनीतिक रूप से अनुभवहीन। इससे भी बुरा, रघुनाथराव ने पुनः पेशवा पद प्राप्त करने का प्रयास किया।
1773 की त्रासदी: 1773 में, रघुनाथराव की साजिश में नारायणराव की हत्या कर दी गई। यह मराठा इतिहास की सबसे काली घटनाओं में से एक थी। इसके बाद दशकों तक आंतरिक संघर्ष चला जिसने मराठा शक्ति को कमजोर किया।

ब्रिटिश लाभ: मराठा आंतरिक संघर्ष ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में विस्तार का अवसर दिया। 1775-1782 का प्रथम एंग्लो-मराठा युद्ध सीधे मराठा आंतरिक संकट से जुड़ा था।
“क्या होता यदि” परिदृश्य: यदि Madhavrao Peshwa दस वर्ष और जीवित रहते (1782 तक), तो मराठा इतिहास संभवतः भिन्न होता। वे एक स्थिर उत्तराधिकार स्थापित कर सकते थे, ब्रिटिश विस्तार को चुनौती दे सकते थे, और मराठा राज्य व्यवस्था को सुदृढ़ कर सकते थे।
लेखक (Abhishek) की टिप्पणी: इतिहास के अध्येता का चिंतन
इतिहास के अध्येता के रूप में, Madhavrao Peshwa की कहानी मुझे हमेशा मार्मिक और प्रेरक दोनों लगती है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जिसने असंभव परिस्थितियों में असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कीं। 16 वर्ष की आयु में – जब अधिकांश युवक अभी अपनी शिक्षा पूरी कर रहे होते हैं – Madhavrao Peshwa को एक टूटे हुए साम्राज्य का पुनर्निर्माण करना था।
जो चीज Madhavrao Peshwa को विशेष बनाती है, वह केवल उनकी सैन्य या प्रशासनिक सफलता नहीं है। यह उनकी परिपक्वता, दृढ़ संकल्प और दूरदर्शिता है। ग्यारह वर्षों में, उन्होंने यह साबित किया कि नेतृत्व आयु का नहीं, चरित्र का मामला है।

परंतु Madhavrao Peshwa की कहानी एक गहरी त्रासदी भी है। 27 वर्ष—यह एक जीवन के लिए बहुत कम है। और माधवराव ने अपने जीवन के अंतिम दो वर्षों में तपेदिक के साथ संघर्ष किया, फिर भी राज्य कार्य जारी रखा। उनकी मृत्यु के बाद, मराठा साम्राज्य कभी पूरी तरह उबर नहीं सका। यह हमें याद दिलाता है कि व्यक्तिगत नेतृत्व कितना महत्वपूर्ण हो सकता है – और इसकी अनुपस्थिति कितनी विनाशकारी
स्रोत और संदर्भ
Sardesai, G.S. – New History of the Marathas, Volume 3 (1948) Sarkar, Jadunath – Fall of the Mughal Empire, Volume 3 (1934) Gordon, Stewart – The Marathas 1600-1818 (1993) Duff, James Grant – History of the Mahrattas, Volume 2 (1826) Maharashtra State Gazetteers – Pune District Gazetteer (1954)
FAQ — Madhavrao Peshwa
प्रश्न 1: Madhavrao Peshwa ने हैदर अली को तीन बार (1764, 1766, 1770-72) हराया, लेकिन हैदर अली बाद में ब्रिटिश के विरुद्ध भारत के सबसे शक्तिशाली प्रतिरोधी बन गए। क्या यह विरोधाभास Madhavrao Peshwa की सैन्य रणनीति की कमजोरी दर्शाता है, या यह हमें 18वीं शताब्दी के भारतीय युद्ध की प्रकृति के बारे में कुछ और सिखाता है?
उत्तर: यह प्रश्न एक गहन ऐतिहासिक विरोधाभास को उजागर करता है जो वास्तव में Madhavrao Peshwa की रणनीति की कमजोरी नहीं, बल्कि 18वीं शताब्दी के भारतीय युद्ध के मूलभूत चरित्र को प्रकट करता है। Madhavrao Peshwa ने हैदर अली को तीन बार निर्णायक रूप से हराया – 1764 का रक्कसी-टंगडी युद्ध सबसे प्रसिद्ध है जहां हैदर अली पूरी तरह पराजित हुए। परंतु Madhavrao Peshwa का उद्देश्य हैदर अली को नष्ट करना नहीं था – यह वश में करना था।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। मराठा विस्तार की रणनीति “चौथ” और “सरदेशमुखी” (श्रद्धांजलि) पर आधारित थी। माधवराव चाहते थे कि हैदर अली एक शक्तिशाली परंतु अधीनस्थ शासक के रूप में जीवित रहें जो मराठों को नियमित श्रद्धांजलि दें। यह मुगल साम्राज्य की परंपरा थी – राजपूत राजा, मराठा सरदार, सब मुगल सम्राट को श्रद्धांजलि देते थे परंतु अपने क्षेत्रों में स्वायत्त थे।
माधवराव की रणनीति का तर्क: (1) हैदर अली को पूरी तरह नष्ट करना संसाधन-गहन होता – मैसूर के किलों को जीतना, क्षेत्र को स्थायी रूप से शासित करना। (2) हैदर अली को अधीनस्थ मित्र के रूप में रखना राजनीतिक रूप से लाभदायक था – वे दक्षिण में एक buffer बन सकते थे। (3) माधवराव के पास अन्य प्राथमिकताएं थीं – निजाम, उत्तर भारत, रघुनाथराव का आंतरिक संघर्ष।
परंतु यहां समस्या थी: हैदर अली एक असाधारण रूप से दृढ़ और अनुकूलनशील नेता थे। प्रत्येक पराजय से वे सीखते थे। माधवराव के जीवनकाल में वे मराठों को श्रद्धांजलि देते रहे – यह सत्य है। परंतु जब 1772 में माधवराव की मृत्यु हुई और मराठा साम्राज्य आंतरिक संघर्ष में फंस गया, तब हैदर अली ने अवसर देखा।
ब्रिटिश के विरुद्ध हैदर अली की सफलता: जब हैदर अली (और बाद में उनके पुत्र टीपू सुल्तान) ब्रिटिश के विरुद्ध लड़े, तब संदर्भ पूरी तरह भिन्न था। ब्रिटिश विजय और स्थायी शासन चाहते थे – श्रद्धांजलि नहीं। हैदर अली के लिए यह अस्तित्व का युद्ध था। इसने उन्हें अधिक हताश और इसलिए अधिक नवीन बना दिया। उन्होंने फ्रांसीसी से तोपखाना तकनीक सीखी, रॉकेट युद्ध विकसित किया, और गुरिल्ला रणनीति अपनाई। मराठों के विरुद्ध वे एक पारंपरिक शासक थे जो श्रद्धांजलि की शर्तों पर बातचीत कर रहे थे। ब्रिटिश के विरुद्ध वे एक स्वतंत्रता सेनानी बन गए।
अंतिम विश्लेषण: Madhavrao Peshwa की रणनीति उनके समय के लिए सही थी। 18वीं शताब्दी के भारतीय राजनीति में, पूर्ण विजय दुर्लभ और अक्सर अव्यावहारिक थी। श्रद्धांजलि-आधारित प्रभुत्व सामान्य था। माधवराव ने यह हासिल किया। परंतु यह प्रणाली तभी काम करती है जब केंद्रीय शक्ति (मराठा साम्राज्य) मजबूत रहे। जब माधवराव की मृत्यु के बाद मराठा कमजोर हुए, तो हैदर अली मुक्त हो गए। यह Madhavrao Peshwa की विफलता नहीं थी – यह उनके उत्तराधिकारियों की विफलता थी जो उनकी विरासत को बनाए नहीं रख सके।
प्रश्न 2: Madhavrao Peshwa तपेदिक (क्षय रोग) से 27 वर्ष की आयु में मर गए। 18वीं शताब्दी में इस रोग का कोई इलाज नहीं था। परंतु क्या उनके जीवन के अंतिम दो वर्षों में – जब वे स्पष्ट रूप से बीमार थे – उन्होंने उत्तराधिकार योजना बनाई? यदि नहीं, तो क्यों नहीं, और यह चूक मराठा इतिहास को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर: यह प्रश्न Madhavrao Peshwa की कहानी के सबसे दुखद और साथ ही सबसे चौंकाने वाले पहलू को छूता है। ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि Madhavrao Peshwa को 1770 के आसपास तपेदिक के लक्षण दिखने लगे थे—लगातार खांसी, वजन घटना, कमजोरी। 1771-1772 तक उनकी स्थिति गंभीर हो गई थी। फिर भी, जब 18 नवंबर 1772 को उनकी मृत्यु हुई, तब कोई स्पष्ट उत्तराधिकार योजना नहीं थी।
तथ्य जो चौंकाते हैं: (1) Madhavrao Peshwa के कोई पुत्र नहीं थे – यह एक बड़ी समस्या थी। (2) उन्होंने कोई लिखित वसीयत या उत्तराधिकार निर्देश नहीं छोड़े। (3) उनकी मृत्यु के बाद, उनके 18 वर्षीय छोटे भाई नारायणराव पेशवा बने – परंतु यह निर्णय स्वचालित नहीं था, यह गोपिकाबाई और नाना फड़नवीस द्वारा किया गया था।
क्यों नहीं बनाई उत्तराधिकार योजना? यहां कई संभावनाएं हैं:
संभावना A: मनोवैज्ञानिक इनकार: 27 वर्ष – यह मरने के लिए बहुत कम उम्र है। माधवराव, जो इतने दृढ़ और तर्कसंगत थे, शायद अपनी आसन्न मृत्यु को स्वीकार नहीं कर सके। आधुनिक मनोविज्ञान हमें बताता है कि युवा, सफल लोग अक्सर अपनी मृत्यु की संभावना को dismiss करते हैं। शायद माधवराव ने सोचा, “मैं ठीक हो जाऊंगा। मेरे पास समय है।”
संभावना B: राजनीतिक जटिलता: उत्तराधिकार योजना बनाना राजनीतिक रूप से खतरनाक था। यदि Madhavrao Peshwa ने नारायणराव को आधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित किया होता, तो यह रघुनाथराव को भड़काता – जो पहले से ही बेचैन और महत्वाकांक्षी थे। रघुनाथराव बालाजी बाजीराव के छोटे भाई थे और कई लोगों का मानना था कि पेशवा पद उनका अधिकार है। यदि माधवराव ने स्पष्ट रूप से नारायणराव को चुना होता, तो रघुनाथराव ने माधवराव के जीवित रहते ही विद्रोह कर दिया होता।
संभावना C: कोई आदर्श उत्तराधिकारी नहीं: माधवराव की दुविधा यह थी कि कोई भी विकल्प अच्छा नहीं था। नारायणराव मात्र 18 वर्ष के थे, राजनीतिक रूप से अनुभवहीन। रघुनाथराव अनुभवी थे परंतु अविश्वसनीय और महत्वाकांक्षी। कोई तीसरा विकल्प नहीं था। शायद माधवराव जानबूझकर अस्पष्टता बनाए रखना चाहते थे – यह सोचकर कि उनकी मृत्यु के बाद नाना फड़नवीस और अन्य बुद्धिमान सलाहकार सर्वोत्तम निर्णय लेंगे।
परिणाम विनाशकारी थे: Madhavrao Peshwa की मृत्यु के एक वर्ष बाद, 1773 में, रघुनाथराव की साजिश में नारायणराव की हत्या हो गई। यह मराठा इतिहास का सबसे काला अध्याय था। इसके बाद दशकों तक आंतरिक संघर्ष चला। यदि माधवराव ने एक स्पष्ट, सार्वजनिक, अटल उत्तराधिकार योजना बनाई होती – शायद एक regency council के साथ जो नारायणराव को परिपक्व होने तक guide करती – तो शायद यह त्रासदी टाली जा सकती थी।
ऐतिहासिक सबक: व्यक्तिगत नेतृत्व महत्वपूर्ण है, परंतु संस्थागत निरंतरता और भी महत्वपूर्ण है। Madhavrao Peshwa ने साम्राज्य को बचाया, परंतु वे उसे अपने बाद बचाने की व्यवस्था नहीं कर सके। यह उनकी सबसे बड़ी चूक थी – और इसके लिए पूरे मराठा साम्राज्य ने कीमत चुकाई।
प्रश्न 3: Madhavrao Peshwa ने अपने चाचा रघुनाथराव के साथ एक दशक (1761-1772) तक आंतरिक संघर्ष किया। रघुनाथराव एक अनुभवी सैन्य कमांडर थे जो 1758 में अटक तक पहुंचे थे। क्या Madhavrao Peshwa को रघुनाथराव के साथ एक power-sharing arrangement बनानी चाहिए थी – जैसे “dual leadership” – जो रोमन “consuls” या मुगल “co-regency” की तरह हो? क्या यह मराठा साम्राज्य को मजबूत करता या और कमजोर?
उत्तर: यह प्रश्न मराठा इतिहास की सबसे fascinating “क्या होता यदि” परिकल्पनाओं में से एक है। सतह पर, यह विचार आकर्षक लगता है: Madhavrao Peshwa (युवा, बुद्धिमान, प्रशासक) + रघुनाथराव (अनुभवी, सैन्य प्रतिभा) = सही संयोजन। परंतु ऐतिहासिक वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है।
मामला power-sharing के पक्ष में: (1) पूरक कौशल: Madhavrao Peshwa प्रशासन, कूटनीति और दीर्घकालिक योजना में उत्कृष्ट थे। रघुनाथराव सैन्य अभियान में। यदि वे सहयोग करते, तो मराठा शक्ति दोगुनी हो सकती थी। (2) ऐतिहासिक उदाहरण: रोमन गणराज्य में दो consuls थे जो शक्ति साझा करते थे। मुगल साम्राज्य में अकबर ने बैरम खान के साथ शुरुआती co-regency की थी। (3) संसाधन उपयोग: रघुनाथराव अपनी सेना के साथ उत्तर में रह सकते थे, माधवराव दक्षिण और प्रशासन संभाल सकते थे।
परंतु यहां समस्याएं हैं – और ये समस्याएं संरचनात्मक थीं:
समस्या 1: पेशवा पद की प्रकृति: पेशवा पद एकल नेतृत्व के लिए डिज़ाइन किया गया था। यह प्रधानमंत्री का पद था – दो प्रधानमंत्री नहीं हो सकते। छत्रपति (सातारा में) औपचारिक रूप से सर्वोच्च थे, परंतु पेशवा वास्तविक शक्ति थे। यदि दो पेशवा होते (या एक पेशवा और एक “सह-पेशवा”), तो यह संवैधानिक अराजकता होती।
समस्या 2: रघुनाथराव का चरित्र: यह कठोर सत्य है – रघुनाथराव power-sharing के लिए उपयुक्त नहीं थे। ऐतिहासिक अभिलेख दिखाते हैं कि वे महत्वाकांक्षी, अधीर, और षड्यंत्रकारी थे। 1761 में जब माधवराव पेशवा बने, तब रघुनाथराव ने तुरंत विरोध किया। उन्होंने Madhavrao Peshwa को कमजोर करने के प्रयास किए। 1773 में नारायणराव की हत्या में उनकी संलिप्तता यह दर्शाती है कि वे किसी भी शक्ति-साझाकरण को स्वीकार नहीं करते।
समस्या 3: राजनीतिक गुट: मराठा दरबार में विभिन्न गुट थे – कुछ Madhavrao Peshwa के समर्थक, कुछ रघुनाथराव के। power-sharing व्यवस्था इन गुटों को संस्थागत वैधता देती। प्रत्येक निर्णय पर दोनों गुट अपने नेता का पक्ष लेते हैं। यह paralysis उत्पन्न करता।
ऐतिहासिक तुलना – क्यों यह काम नहीं करता:
रोमन consuls: यह व्यवस्था अक्सर संघर्ष में परिणत होती थी। Julius Caesar ने इसे तोड़कर एकल तानाशाही स्थापित की।
मुगल co-regency: अकबर और बैरम खान की साझेदारी संघर्ष में समाप्त हुई – अकबर ने बैरम खान को निर्वासित कर दिया।
मराठा उदाहरण: 18वीं शताब्दी में जब भी दो प्रतिस्पर्धी शक्ति केंद्र थे (सातारा बनाम कोल्हापुर, बाद में पुणे के विभिन्न गुट), यह कमजोरी लाया, शक्ति नहीं।
माधवराव का वास्तविक दृष्टिकोण – और यह सही क्यों था: Madhavrao Peshwa ने रघुनाथराव को सीमित स्वायत्तता दी – कुछ सैन्य अभियान, कुछ क्षेत्रीय जिम्मेदारी – परंतु अंतिम निर्णय हमेशा Madhavrao Peshwa के थे। यह एक नाजुक संतुलन था। यह रघुनाथराव को पूरी तरह अलग नहीं करता (जो विद्रोह को trigger करता), परंतु उन्हें पूर्ण शक्ति भी नहीं देता (जो माधवराव को कमजोर करता)।
अंतिम विश्लेषण: power-sharing सिद्धांत में अच्छा लगता है, परंतु व्यवहार में – विशेषकर Madhavrao Peshwa जैसे व्यक्ति के साथ – यह विनाशकारी होता। Madhavrao Peshwa का दृष्टिकोण – सीमित स्वायत्तता परंतु स्पष्ट श्रेष्ठता – सर्वोत्तम था जो संभव था। असली समस्या यह नहीं थी कि माधवराव ने power-sharing नहीं की। असली समस्या यह थी कि Madhavrao Peshwa बहुत जल्दी मर गए। यदि वे दस वर्ष और जीवित रहते, तो रघुनाथराव या तो reconcile हो जाते या राजनीतिक रूप से irrelevant हो जाते।
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👑 माधवराव पेशवा और पानीपत के बाद मराठा पुनरुत्थान का असाधारण काल
यह लेख पेशवा काल, पानीपत के बाद मराठा पुनर्निर्माण और 18वीं शताब्दी के
मराठा-मैसूर संबंधों पर आधारित हमारी शोध-श्रृंखला का हिस्सा है।
माधवराव पेशवा के हैदर अली के विरुद्ध सफल अभियान, निजाम के साथ कूटनीति,
रघुनाथराव के साथ आंतरिक संघर्ष, प्रशासनिक सुधार और
27 वर्ष की आयु में उनकी असमय मृत्यु के मराठा साम्राज्य पर प्रभाव को
गहराई से समझने के लिए नीचे दिए गए आंतरिक और विश्वसनीय बाहरी स्रोत देखें।
HistoryVerse7 — प्रामाणिक शोध • भूला हुआ इतिहास • सत्य की खोज
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