Malhar Rao Holkar
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Malhar Rao Holkar: 9 Remarkable Stories of the Maratha Commander Who Shaped Malwa

👑⚔️ Malhar Rao Holkar — मालवा, दिल्ली और पानीपत की अमिट गाथा मराठा साम्राज्य के उत्तर अभियानों में Malhar Rao Holkar का नाम मालवा का शेर और इंदौर राज्य का संस्थापक के रूप में दर्ज है। वे वह रणनीति‑धुरी थे जिन्होंने दिल्ली अभियानों (1757–1764), पेशावर–वसई अभियानों और तीसरे पानीपत (1761) में निर्णायक भूमिका निभाई। उनकी…

👑⚔️ Malhar Rao Holkar — मालवा, दिल्ली और पानीपत की अमिट गाथा

मराठा साम्राज्य के उत्तर अभियानों में Malhar Rao Holkar का नाम मालवा का शेर और इंदौर राज्य का संस्थापक के रूप में दर्ज है। वे वह रणनीति‑धुरी थे जिन्होंने दिल्ली अभियानों (1757–1764), पेशावर–वसई अभियानों और तीसरे पानीपत (1761) में निर्णायक भूमिका निभाई। उनकी पहचान केवल एक सेनानायक तक सीमित नहीं—एक राजनीतिक निर्माता जिन्होंने अनुशासन, साहस और प्रशासन से मालवा को मराठा साम्राज्य की रीढ़ बना दिया। मराठा–अफगान संघर्ष और मालवा की स्थिरता की इस गाथा में उनका नाम अमर, भूमिका निर्णायक और विरासत प्रेरणादायी है। अगर यह संदर्भित इतिहास आपको गर्व से भरता है, तो इसे शेयर करें—क्योंकि साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, अनुशासन और विरासत से टिकती हैं। 👑⚔️

🏰 प्रस्तावना: धूल से सिंहासन तक का सफर

अठारहवीं शताब्दी का भारत। मुगल साम्राज्य अपने पतन के दौर में था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद दिल्ली की सत्ता कमजोर हो चुकी थी। इस शून्य को भरने के लिए नई शक्तियां उभर रही थीं। मराठा साम्राज्य उनमें सबसे प्रमुख था।

इस दौर में एक ऐसा व्यक्ति उभरा जिसकी कहानी किसी महाकाव्य से कम नहीं। Malhar Rao Holkar – एक साधारण धनगर (गड़रिया) परिवार में जन्मा बालक, जो अपनी बहादुरी, रणनीति और समर्पण के बल पर मराठा साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली सेनापतियों में से एक बन गया।

16 मार्च 1693 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के फलटण के पास मुरुम गांव में जन्मे मल्हार राव ने वह जीवन जिया जो प्रेरणा का स्रोत है। उनकी कहानी केवल युद्धों और विजयों की नहीं है – यह कूटनीति, प्रशासन, और एक नए राजवंश की स्थापना की कहानी है।

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मल्हार राव होलकर ने होलकर राजवंश की नींव रखी, जो आज भी भारतीय इतिहास में एक प्रमुख स्थान रखता है। उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होलकर ने भारतीय इतिहास में सबसे महान शासकों में से एक के रूप में अपनी पहचान बनाई।

20 मई 1766 को अलमपुर (मध्य प्रदेश) में उनकी मृत्यु के समय, वे लगभग पूरे मालवा क्षेत्र के वास्तविक शासक थे। उन्हें मराठा नियंत्रण को भारत भर में फैलाने के प्रमुख वास्तुकारों में से एक माना जाता है।

आज इस विस्तृत blog में हम मल्हार राव होलकर के जीवन की हर पहलू को जानेंगे – उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक, उनकी विजयों से लेकर उनकी विरासत तक। यह केवल एक ऐतिहासिक लेख नहीं है – यह एक महान योद्धा और प्रशासक की संपूर्ण जीवनी है।

⚔️ Malhar Rao Holkar का प्रारंभिक जीवन – गड़रिये से सेनापति तक का सफर

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि:

Malhar Rao Holkar का जन्म 16 मार्च 1693 को महाराष्ट्र के मुरुम गांव (फलटण के पास, सतारा जिला) में एक धनगर-गड़रिया परिवार में हुआ था। धनगर समुदाय पारंपरिक रूप से भेड़-बकरियां पालने का काम करता था। यह समुदाय मराठा समाज में सामान्य वर्ग से था, लेकिन मल्हार राव ने साबित किया कि जन्म नहीं, बल्कि कर्म व्यक्ति की पहचान बनाते हैं।

उनके पिता का नाम खांडू जी होलकर था। दुर्भाग्यवश, मल्हार राव के पिता की मृत्यु 1696 में हो गई, जब Malhar Rao Holkar केवल तीन वर्ष के थे। इस त्रासदी ने बालक मल्हार के जीवन को गहराई से प्रभावित किया।

मामा के संरक्षण में पालन-पोषण:

पिता की मृत्यु के बाद, Malhar Rao Holkar का पालन-पोषण उनके मामा सरदार भोजराजराव बरगल के संरक्षण में हुआ। भोजराजराव बरगल तलोड़ा (नंदुरबार जिला, महाराष्ट्र) के किले में रहते थे। वे एक मराठा सरदार कदम बांडे की सेना में घुड़सवार टुकड़ी (cavalry) के कमांडर थे।

यह वातावरण बालक Malhar Rao Holkar के लिए सैन्य प्रशिक्षण का प्रारंभिक केंद्र बन गया। उन्होंने अपने मामा के साथ रहते हुए घुड़सवारी, तलवारबाजी, और युद्ध कौशल सीखा। मामा के घर में वे मराठा सैन्य परंपरा, रणनीति, और युद्ध के नियमों से परिचित हुए।

प्रारंभिक करियर – घुड़सवार सेना में शामिल होना:

जैसे-जैसे Malhar Rao Holkar बड़े हुए, उनकी बहादुरी और घुड़सवारी कौशल प्रमुख हो गया। उनके मामा भोजराजराव बरगल ने उन्हें अपनी घुड़सवार टुकड़ी में शामिल किया। कुछ समय बाद, Malhar Rao Holkar को एक घुड़सवार दस्ते का प्रभारी बना दिया गया।

यह Malhar Rao Holkar के करियर का महत्वपूर्ण मोड़ था। एक साधारण सैनिक से दस्ते के प्रभारी बनना उनकी योग्यता का प्रमाण था। उन्होंने जल्द ही साबित कर दिया कि वे केवल एक साधारण योद्धा नहीं, बल्कि एक कुशल नेता भी हैं।

विवाह – 1717:

1717 में, मल्हार राव ने अपनी मामा की बेटी गौतमाबाई बरगल से विवाह किया। गौतमाबाई एक शिक्षित और साहसी महिला थीं। उनकी मृत्यु 29 सितंबर 1761 को हुई।

Malhar Rao Holkar ने कुल मिलाकर कई विवाह किए, जो उस समय मराठा सरदारों में सामान्य था। 1719 से 1726 के बीच, उन्होंने बाना बाई साहिब होलकर, द्वारका बाई साहिब होलकर, और हरकू बाई साहिब होलकर से विवाह किया। उन्होंने एक राजकुमारी से भी विवाह किया, जिसे खांडा रानी के रूप में जाना जाता है – यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि मल्हार राव ने विवाह समारोह में स्वयं उपस्थित न होकर अपनी तलवार (मराठी में ‘खांडा’) भेजी थी।

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बाजीराव पेशवा से महत्वपूर्ण मुलाकात:

Malhar Rao Holkar के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब वे पेशवा बालाजी विश्वनाथ की 1719 की दिल्ली अभियान में एक भाड़े के सैनिक (mercenary) के रूप में शामिल हुए। इस अभियान में उन्होंने अपनी बहादुरी दिखाई।

लेकिन असली परिवर्तन 1721 में आया जब मल्हार राव पेशवा बाजीराव प्रथम की सेवा में शामिल हुए। यहीं से Malhar Rao Holkar के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई।

बाजीराव और मल्हार राव – एक प्रसिद्ध घटना:

Malhar Rao Holkar और बाजीराव के बीच एक प्रसिद्ध घटना इतिहास में दर्ज है, जो उनके संबंधों की शुरुआत को दर्शाती है। यह घटना डॉ. उदय कुलकर्णी की पुस्तक “The Era of Baji Rao” में विस्तार से वर्णित है:

दिल्ली अभियान के दौरान, यह आदेश था कि किसी गांव के खेतों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। हालांकि, Malhar Rao Holkar के आदमियों ने एक खेत में घुसकर फसल काट ली और अपने घोड़ों को खिला दी। जब यह बात पेशवा तक पहुंची, तो बाजीराव को इस मामले को संभालने के लिए भेजा गया। बाजीराव ने एक दोषी सैनिक को डंडे से पीटा।

Malhar Rao Holkar उस समय अपने तंबू के बाहर बैठे रस्सी बुन रहे थे। उन्होंने बाजीराव को गालियां दीं और गीली मिट्टी का एक गोला उन पर फेंक दिया। Malhar Rao Holkar ने कहा, “क्या तुम हमें वेतन दे रहे हो, कि तुम हमें डंडे से पीट रहे हो?“

अगले दिन जब Malhar Rao Holkar को पता चला कि पेशवा उन्हें दंडित करने की योजना बना रहे हैं, तो उन्होंने अपने सभी घोड़े शिविर में छोड़ दिए, अपने तंबू जला दिए, और अपने आदमियों के साथ राख शरीर पर लगाकर एक पहाड़ी पर जा बैठे। पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने घोड़े इकट्ठा किए, Malhar Rao Holkar के आदमियों को वापस बुलाया और उन्हें कपड़े दिए।

वापसी की यात्रा पर, बाजीराव एक नदी के किनारे नहा रहे थे और छाया में बैठकर भोजन कर रहे थे। तभी Malhar Rao Holkar पांच सौ घुड़सवारों के साथ जंगल से प्रकट हुए। घोड़े पर बैठे हुए, उन्होंने अपना भाला बाजीराव की छाती पर रख दिया और कहा, “उस दिन मैंने तुम पर गीली मिट्टी फेंकी थी। अब क्या मुझे यह भाला तुम्हारे शरीर में डाल देना चाहिए? क्या यहां कोई है जो तुम्हें बचा सके?“

बाजीराव उठे, Malhar Rao Holkar को घोड़े से नीचे उतारा, और उनकी तलवारबाजी की प्रशंसा की। बाजीराव ने कहा, “हर युद्ध में मैंने तुम्हारी चमकती तलवार देखी है – मेरे साथ भोजन करो।”

Malhar Rao Holkar ने कहा, “तुम्हारा मन मेरे बारे में साफ नहीं है। मैं तुम्हारे साथ कैसे भोजन कर सकता हूं?“

तब बाजीराव ने कहा, “मैं इस भोजन पर शपथ लेता हूं – अगले अभियान में तुम्हें पांच हजार घुड़सवारों की कमान मिलेगी।”

उस दिन से, Malhar Rao Holkar बाजीराव की सेना में एक महत्वपूर्ण सरदार बन गए।

🗡️ पेशवा बाजीराव का विश्वासपात्र सेनापति – मल्हार राव का उदय

1724 – पहली बड़ी नियुक्ति:

1724 में, पेशवा बाजीराव प्रथम ने Malhar Rao Holkar को 500 घुड़सवारों की कमान सौंपी। यह मल्हार राव के करियर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। एक साधारण धनगर परिवार से आए व्यक्ति को पेशवा द्वारा इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना उनकी योग्यता का प्रमाण था।

Malhar Rao Holkar ने इस विश्वास को सही साबित किया। वे जल्द ही बाजीराव के मुख्य सेनापति बन गए, विशेष रूप से मालवा क्षेत्र में। उनका मुख्यालय महेश्वर और इंदौर में स्थापित हुआ।

1720 – बालापुर का युद्ध:

Malhar Rao Holkar ने 1720 में बालापुर के युद्ध में भाग लिया, जहां मराठा सेना निज़ाम के खिलाफ लड़ी। हालांकि यह युद्ध मराठाओं के लिए चुनौतीपूर्ण था और उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन मल्हार राव ने अपनी बहादुरी दिखाई। यह उनका पहला बड़ा युद्ध अनुभव था।

1728 – पालखेड़ का युद्ध:

फरवरी 1728 में, पालखेड़ के युद्ध में Malhar Rao Holkar ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह युद्ध पेशवा बाजीराव और निज़ाम-उल-मुल्क (हैदराबाद के निज़ाम) के बीच लड़ा गया।

निज़ाम ने पुणे पर आक्रमण किया और शहर को लूटा। बाजीराव ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। Malhar Rao Holkar, रानोजी शिंदे, और पवार भाइयों के साथ मिलकर बाजीराव ने निज़ाम द्वारा नियंत्रित क्षेत्रों पर हमले शुरू किए।

मराठा सेना ने निज़ाम की आपूर्ति लाइनों को काट दिया, उनके शहरों को नष्ट किया, और निज़ाम की सेना को कमजोर कर दिया। अंततः, निज़ाम को मुंगी शेवगांव की संधि (6 मार्च 1728) पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस संधि में निज़ाम ने मराठा अधिकार को मान्यता दी और मराठाओं के चौथ (कर) एकत्र करने के अधिकार को स्वीकार किया।

1729 – अमझेरा का युद्ध:

फरवरी 1729 में, अमझेरा के युद्ध में मल्हार राव ने निर्णायक भूमिका निभाई। यह युद्ध मालवा में लड़ा गया, जहां मराठा सेना ने मुगल गवर्नरों के खिलाफ युद्ध किया।

पेशवा बाजीराव, उनके छोटे भाई चिमाजी अप्पा, और सेनापतियों Malhar Rao Holkar, रानोजी शिंदे, तथा पवार भाइयों ने मिलकर मुगल सेना पर हमला किया। मुगल गवर्नर गिर्धर बहादुर और दया बहादुर युद्ध में मारे गए।

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इस विजय के बाद, रानोजी शिंदे और Malhar Rao Holkar को मालवा में जागीरें दी गईं। मल्हार राव को मध्य मालवा की जागीर मिली। उन्होंने किलेबंद चौकियां स्थापित कीं और राजस्व संग्रहण शुरू किया, जो सालाना 10-15 लाख रुपये था।

यह Malhar Rao Holkar के राजनीतिक और प्रशासनिक करियर की शुरुआत थी। अब वे केवल एक सैन्य कमांडर नहीं थे, बल्कि एक प्रांत के शासक भी बन गए थे।

1732 – इंदौर राज्य की स्थापना:

29 जुलाई 1732 – यह तारीख Malhar Rao Holkar के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण थी। इस दिन पेशवा बाजीराव प्रथम ने 28.5 परगना (प्रशासनिक इकाइयां) को मिलाकर मल्हार राव होलकर को इंदौर राज्य शासन के लिए सौंपा।

इंदौर पहले से ही कांपेल के नंदलाल मांडलोई द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र रियासत के रूप में मौजूद था। मराठा सेना ने नंदलाल मांडलोई को हराया और होलकर परिवार को खान (कांह) नदी के पार शिविर लगाने की अनुमति दी।

यह तारीख होलकर राजवंश की आधिकारिक स्थापना का दिन मानी जाती है। मल्हार राव होलकर होलकर राजवंश के संस्थापक और पहले शासक बने।

1734 – मल्हारगंज की स्थापना:

1734 में, मल्हार राव ने इंदौर में एक शिविर स्थापित किया, जिसे बाद में मल्हारगंज कहा गया। यह क्षेत्र आज भी इंदौर शहर का एक प्रमुख हिस्सा है।

1747 – राजवाड़ा महल का निर्माण:

1747 में, मल्हार राव ने अपने शाही महल राजवाड़ा का निर्माण शुरू किया। यह सात मंजिला महल आज इंदौर का प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक है। राजवाड़ा होलकर राजवंश की शक्ति और वैभव का प्रतीक बन गया।

🏹 दिल्ली अभियान 1737 – मुगल राजधानी पर मराठा हमला

ऐतिहासिक संदर्भ:

18वीं शताब्दी के तीसरे दशक में, मुगल साम्राज्य तेजी से कमजोर हो रहा था। मुगल सम्राट मुहम्मद शाह (जिन्हें “रंगीला” भी कहा जाता था) की कमजोर नेतृत्व क्षमता के कारण साम्राज्य का नियंत्रण ढीला पड़ गया था। पेशवा बाजीराव ने इस स्थिति का लाभ उठाने का निर्णय लिया।

अभियान की शुरुआत – नवंबर 1736:

12 नवंबर 1736 को, पेशवा बाजीराव ने 50,000 घुड़सवारों की विशाल सेना के साथ पुणे से दिल्ली अभियान शुरू किया। यह अभियान मुगल साम्राज्य के दिल पर सीधा हमला था।

दिसंबर 1736 में, बाजीराव भोपाल पहुंचे, जहां का शासक यार मुहम्मद था। बाजीराव ने उनसे 5 लाख रुपये वसूले। 5 जनवरी 1737 को, वे भिलसा पहुंचे, जहां Malhar Rao Holkar और रानोजी शिंदे उनके साथ आ मिले।

जालेसर का युद्ध:

मुगल सम्राट ने सआदत अली खान को 1,50,000 सैनिकों की विशाल सेना के साथ मराठाओं को रोकने के लिए भेजा। Malhar Rao Holkar और पिलाजी जाधव ने यमुना नदी पार की और गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में लूटपाट शुरू की।

12 मार्च 1737 को सुबह, Malhar Rao Holkar की सेना का सामना सआदत खान के अग्रिम दस्ते से हुआ, जिसका नेतृत्व अबुल मंसूर खान (बाद में सफदरजंग के नाम से प्रसिद्ध) कर रहे थे। उनके पास 12,000 घुड़सवार थे।

मल्हार राव ने इस सेना को घेरने की कोशिश की, लेकिन मंसूर खान पीछे हट गए। मल्हार राव ने उनका पीछा किया, लेकिन तभी उनका सामना सआदत खान की मुख्य सेना से हो गया, जिसमें 50,000 सैनिक थे।

मल्हार राव ने महसूस किया कि उनकी सेना मुगल सेना से छह गुना छोटी थी। उन्होंने पीछे हटने का निर्णय लिया। मुगल सेना ने उनका पीछा किया और लगभग 1,500 मराठा सैनिक मारे गए। कुछ मराठा सैनिक यमुना नदी में गलत जगह पर घुस गए और डूब गए। बाकी सेना अंततः कोटिला (ग्वालियर के पास) में बाजीराव के शिविर में पहुंची।

यह Malhar Rao Holkar के लिए एक कठिन हार थी, लेकिन उन्होंने इससे महत्वपूर्ण सबक सीखा।

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दिल्ली पर हमला – 28 मार्च 1737:

बाजीराव ने सआदत खान और मुगल सेना को चकमा देने के लिए एक चालाक रणनीति अपनाई। वे सीधे आगरा-दिल्ली मार्ग के बजाय जाट और मेवाती पहाड़ी मार्ग से गए।

28 मार्च 1737 को, मराठा सेना दिल्ली के बाहरी इलाके तलकटोरा में पहुंच गई। मुगल सम्राट ने मीर हसन खान कोका को मराठा सेना को रोकने के लिए भेजा। मराठाओं ने उन्हें हरा दिया।

दिल्ली में आतंक फैल गया। नागरिकों ने सोचा कि मराठा सेना किसी भी क्षण शहर पर हमला कर सकती है। यह मराठा साम्राज्य के सैन्य करियर का शिखर माना जाता है।

हालांकि, बाजीराव को पता चला कि सआदत खान की विशाल सेना दिल्ली की ओर बढ़ रही है। बाजीराव ने समझदारी से दिल्ली से पीछे हटने का निर्णय लिया। उन्होंने चौथ और मुगल सम्राट से धन प्राप्त किया और वापस लौट आए।

इस अभियान ने मुगल साम्राज्य की कमजोरी को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया।

🛡️ भोपाल का युद्ध 1737 – निज़ाम के खिलाफ निर्णायक विजय

युद्ध का प्रसंग:

दिल्ली अभियान के बाद, मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने निज़ाम को उत्तर की ओर बुलाया। निज़ाम ने अपने बेटे के लिए मालवा की गवर्नरी हासिल करने का प्रयास किया और मराठाओं को बाहर निकालने की कोशिश की।

निज़ाम की सेना:

निज़ाम-उल-मुल्क असफ जाह प्रथम ने एक विशाल सेना के साथ मार्च किया, जिसमें शामिल थे:

  • मुगल सेनापति
  • राजपूत टुकड़ियां (जयपुर के सवाई जय सिंह द्वितीय से)
  • भारी तोपखाना

यह सेना संख्या में मराठा सेना से कहीं अधिक थी।

मराठा रणनीति:

पेशवा बाजीराव और चिमाजी अप्पा ने, Malhar Rao Holkar, रानोजी शिंदे, और अन्य सेनापतियों के साथ मिलकर एक चतुर रणनीति बनाई।

दिसंबर 1737 के मध्य से, मराठाओं ने भोपाल के आसपास घेरा डाल दिया। उन्होंने:

  1. आपूर्ति लाइनें काट दीं: निज़ाम की सेना को भोजन और चारा नहीं मिल सका।
  2. पानी के स्रोतों को जहरीला किया: कुछ इतिहासकारों का दावा है कि मराठाओं ने पानी में जहर मिलाया।
  3. सीधा हमला नहीं किया: बाजीराव ने शहर पर सीधा हमला करने के बजाय घेराबंदी की रणनीति अपनाई।
  4. चिमाजी अप्पा को सुदृढीकरण रोकने भेजा: चिमाजी अप्पा को 10,000 सैनिकों के साथ भेजा गया ताकि दिल्ली से आने वाले किसी भी सुदृढीकरण को रोका जा सके।

युद्ध – 24 दिसंबर 1737:

24 दिसंबर 1737 को, भोपाल में निर्णायक युद्ध हुआ। निज़ाम की सेना भुखमरी और थकावट से कमजोर हो चुकी थी। मराठाओं ने अपनी तीव्र गुरिल्ला युद्ध रणनीति का उपयोग किया।

मराठा घुड़सवार सेना ने निज़ाम की सेना पर तेज हमले किए और तुरंत पीछे हट गए। निज़ाम की भारी तोपें इन तेज़ घुड़सवारों के खिलाफ बेकार साबित हुईं।

परिणाम: निज़ाम को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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दोराहा की संधि – 7 जनवरी 1738:

7 जनवरी 1738 को, दोराहा (भोपाल के पास) में पेशवा बाजीराव और सवाई जय सिंह द्वितीय के बीच एक शांति संधि पर हस्ताक्षर हुए। निज़ाम ने भी इस संधि को स्वीकार किया।

संधि की शर्तें:

  1. मालवा प्रांत मराठाओं को दिया गया
  2. मुगल साम्राज्य ने मराठाओं को 50 लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने पर सहमति व्यक्त की
  3. निज़ाम ने मराठा अधिकारों को मान्यता दी

यह विजय Malhar Rao Holkar के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। इसने मालवा में होलकर राज्य को मजबूत किया।

💣 वसई का युद्ध 1739 – पुर्तगालियों के खिलाफ अभियान

पृष्ठभूमि:

वसई (Bassein, जिसे बसीन भी कहा जाता है) मुंबई के उत्तर में स्थित एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था। यह पुर्तगालियों के नियंत्रण में था। पुर्तगालियों ने इस किले को मजबूत बनाया था और यह उनकी भारतीय संपत्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

मराठा साम्राज्य ने तय किया कि पश्चिमी तट पर पूर्ण नियंत्रण के लिए वसई को जीतना आवश्यक है।

अभियान:

चिमाजी अप्पा (पेशवा बाजीराव के छोटे भाई) ने इस अभियान का नेतृत्व किया। Malhar Rao Holkar उनके प्रमुख सेनापतियों में से एक थे।

1738 से 1739 तक, मराठा सेना ने वसई किले का घेरा डाले रखा। यह एक कठिन घेराबंदी थी क्योंकि पुर्तगालियों ने किले को बहुत मजबूत बनाया था और उनके पास यूरोपीय तोपखाना था।

मल्हार राव की भूमिका:

Malhar Rao Holkar ने इस घेराबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने:

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  1. पुर्तगाली आपूर्ति लाइनों को काटा
  2. किले के चारों ओर मराठा स्थिति मजबूत की
  3. गुरिल्ला हमलों का नेतृत्व किया

विजय – मई 1739:

मई 1739 में, मराठाओं ने वसई किले पर कब्जा कर लिया। यह पुर्तगाली साम्राज्य के लिए एक बड़ा झटका था।

इस विजय का महत्व:

  1. मराठा साम्राज्य ने पश्चिमी तट पर अपना नियंत्रण मजबूत किया
  2. यूरोपीय शक्तियों को मराठा सैन्य क्षमता का एहसास हुआ
  3. मराठाओं को आधुनिक यूरोपीय सैन्य तकनीकों का अनुभव मिला

⚔️ रोहिल्ला अभियान और उत्तर भारत में विस्तार (1748-1760)

रोहिल्ला कौन थे?

रोहिल्ला अफगान मूल के लोग थे जो उत्तर भारत के रोहिलखंड क्षेत्र (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में बस गए थे। उन्होंने एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया था और मुगल साम्राज्य की कमजोरी का फायदा उठा रहे थे।

1748 का अभियान:

1748 में, पेशवा ने उत्तर भारत में मराठा प्रभाव बढ़ाने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया। Malhar Rao Holkar इस अभियान के प्रमुख सेनापतियों में से एक थे।

इस अभियान में मल्हार राव ने खुद को विशेष रूप से प्रतिष्ठित किया। उन्होंने अपनी सैन्य कुशलता और कूटनीतिक दक्षता दोनों का प्रदर्शन किया।

फत्तेहगढ़ और फर्रुखाबाद के युद्ध (1751-1752):

मार्च 1751 से अप्रैल 1752 के बीच, Malhar Rao Holkar, जयप्पा शिंदे, गंगाधर तात्या, तुकोजीराव होलकर, और खांडेराव होलकर ने मिलकर रोहिल्ला और बंगश सेनाओं के खिलाफ युद्ध लड़े।

यह अभियान सफदरजंग (अवध के नवाब) की मदद के लिए शुरू किया गया था, जो शादुल्ला खान, अहमद खान बंगश, मोहम्मद खान, और बहादुर खान रोहिल्ला के खिलाफ लड़ रहे थे।

फत्तेहगढ़ और फर्रुखाबाद के युद्धों में, मराठाओं ने रोहिल्ला और बंगश सेनाओं को निर्णायक रूप से हराया। Malhar Rao Holkar की गुरिल्ला रणनीति इस जीत में महत्वपूर्ण थी।

नजीब-उद-दौला:

एक रोचक तथ्य यह है कि नजीब-उद-दौला (जो बाद में अहमद शाह अब्दाली के प्रमुख सहयोगी बने) को Malhar Rao Holkar का “पालक पिता” (foster father) कहा जाता था। यह उनके बीच के जटिल संबंधों को दर्शाता है।

1754 – सिकंदराबाद का पहला युद्ध:

1754 में, मुगल सम्राट अहमद शाह बहादुर और सफदरजंग के बीच संघर्ष हुआ। गाज़ी-उद-दीन खान फिरोज जंग तृतीय ने मराठाओं की मदद से सफदरजंग को हराया।

मुगल सम्राट ने एक बड़ी सेना एकत्र की और सिकंदराबाद में डेरा डाला। दूसरी ओर, पेशवा के छोटे भाई रघुनाथराव, Malhar Rao Holkar, और 2,000 मराठा सैनिकों ने अपने सहयोगी फिरोज जंग III के साथ मिलकर मुगल सम्राट की शाही सेना को हराया।

सम्राट अपनी मां, पत्नियों और 8,000 महिलाओं का एक समूह छोड़कर दिल्ली भाग गया। यह मुगल साम्राज्य की कमजोरी का एक और प्रमाण था।

1757 – दिल्ली पर हमला:

11 अगस्त 1757 को, Malhar Rao Holkar, रघुनाथराव, शमशेर बहादुर, गंगाधर तात्या, सखारामबापू, नारोशंकर, और मौजीराम बनिया ने दिल्ली पर हमला किया। उन्होंने नजीब-उल-दौला को हराया और अहमद खान मीर बख्शी बने।

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1758 – सरहिंद और लाहौर की विजय:

मार्च 1758 में, मराठाओं ने सरहिंद जीता। 20 अप्रैल 1758 को, मल्हार राव होलकर और रघुनाथराव ने मिलकर लाहौर पर हमला किया और उसे जीत लिया।

यह मराठा साम्राज्य के उत्तरी विस्तार का चरम था। पहली बार मराठाओं ने पंजाब के सबसे महत्वपूर्ण शहर पर नियंत्रण हासिल किया।

1757 – सुबेदार का पद:

1757 में, Malhar Rao Holkar को सुबेदार (प्रांतीय गवर्नर) के पद पर पदोन्नत किया गया। यह मराठा प्रशासन में एक बहुत उच्च पद था। मल्हार राव अब मालवा के वास्तविक शासक थे, हालांकि आधिकारिक रूप से वे अभी भी पेशवा के अधीन थे।

1757 – जयपुर के साथ संबंध:

Malhar Rao Holkar ने जयपुर के महाराजा माधोसिंह प्रथम की मदद की, जब वे ईश्वरी सिंह के साथ संघर्ष में थे। इसके बदले में, मल्हार राव को रामपुरा, भानपुरा, और टोंक की जागीरें मिलीं।

यह मल्हार राव की कूटनीतिक कुशलता का एक और उदाहरण था। उन्होंने राजपूत राज्यों के साथ गठबंधन बनाए और अपने क्षेत्र का विस्तार किया।

💔 कुंभेर का घेरा 1754 – पुत्र खांडेराव की शहादत

कुंभेर किला:

कुंभेर किला (वर्तमान भरतपुर, राजस्थान) जाट महाराजा सूरजमल के राज्य का एक महत्वपूर्ण किला था। जाट और मराठा के बीच तनाव बढ़ रहा था।

घेराबंदी – 20 जनवरी से 18 मई 1754:

20 जनवरी 1754 को, मराठाओं ने कुंभेर किले की घेराबंदी शुरू की। यह घेराबंदी लगभग चार महीने तक चली।

Malhar Rao Holkar के इकलौते पुत्र खांडेराव होलकर इस अभियान में शामिल थे। खांडेराव एक बहादुर योद्धा थे और अपने पिता के साथ कई युद्धों में लड़ चुके थे।

24 मार्च 1754 – दुखद दिन:

24 मार्च 1754 – यह Malhar Rao Holkar के जीवन का सबसे दुखद दिन था।

खांडेराव होलकर एक दिन खुली पालकी में अपनी सेना का निरीक्षण कर रहे थे। किले से एक तोप का गोला दागा गया, जो सीधे उन पर लगा। खांडेराव होलकर की मृत्यु तुरंत हो गई।

मल्हार राव का शोक और क्रोध:

अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु से Malhar Rao Holkar अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हो गए। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे महाराजा सूरजमल का सिर काट देंगे और किले की मिट्टी को यमुना नदी में फेंक देंगे।

मराठाओं ने किले पर दबाव बढ़ा दिया। सूरजमल अकेले पड़ गए क्योंकि कोई अन्य शासक उनकी मदद के लिए तैयार नहीं था।

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कूटनीतिक समाधान:

इस कठिन समय में, महारानी किशोरी (सूरजमल की पत्नी) ने समझदारी दिखाई। उन्होंने दीवान रूप राम कटारा से संपर्क किया। महारानी को पता था कि Malhar Rao Holkar और जयप्पा शिंदे के बीच मतभेद थे और जयप्पा अपने निर्णयों में बहुत दृढ़ थे।

अंततः, कूटनीतिक प्रयासों से घेराबंदी समाप्त हुई। किला नहीं गिरा, लेकिन मल्हार राव का क्रोध कभी शांत नहीं हुआ।

खांडेराव की पत्नी – अहिल्याबाई:

खांडेराव की पत्नी अहिल्याबाई होलकर थीं। हिंदू परंपरा के अनुसार, विधवाओं को कभी-कभी सती होने के लिए मजबूर किया जाता था (पति के साथ चिता पर जलना)।

Malhar Rao Holkar ने अहिल्याबाई को सती होने से रोका। यह उनकी प्रगतिशील सोच का प्रमाण था। उन्होंने अहिल्याबाई को प्रोत्साहित किया और उन्हें प्रशासन में शामिल किया।

यह निर्णय भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि अहिल्याबाई होलकर बाद में भारतीय इतिहास की सबसे महान शासकों में से एक बनीं।

🌊 पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 – अफगानों के खिलाफ संघर्ष

पृष्ठभूमि:

1750 के दशक के अंत तक, मराठा साम्राज्य उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ा चुका था। लेकिन अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी साम्राज्य का शासक) भी भारत पर अपना नियंत्रण चाहता था।

1760 – सिकंदराबाद का दूसरा युद्ध:

1760 में, Malhar Rao Holkar को दुर्रानी साम्राज्य की घुड़सवार सेना ने सिकंदराबाद के दूसरे युद्ध में निर्णायक रूप से हराया। जहां खान के नेतृत्व में अफगान सेना ने मल्हार राव को पराजित किया।

दत्ताजी राव शिंदे की मदद नहीं:

जब दत्ताजी राव शिंदे अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ लड़ रहे थे, तो मल्हार राव होलकर ने उनकी मदद नहीं की। वे राजपुताना में थे और अपनी स्थिति को मजबूत कर रहे थे।

कई इतिहासकार इस कदम के लिए मल्हार राव की आलोचना करते हैं, यह कहते हुए कि राष्ट्रीय खतरे के समय वे शिंदे की मदद करने नहीं आए। हालांकि, कुछ इतिहासकार उनके पक्ष में तर्क देते हैं कि अगर वे राजपुताना छोड़ देते, तो उनकी स्थिति कमजोर हो जाती।

पानीपत का तीसरा युद्ध – 14 जनवरी 1761:

14 जनवरी 1761 को, पानीपत का तीसरा युद्ध लड़ा गया। यह भारतीय इतिहास के सबसे बड़े और सबसे खूनी युद्धों में से एक था।

सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना और अहमद शाह अब्दाली के नेतृत्व में दुर्रानी-रोहिल्ला गठबंधन के बीच यह युद्ध हुआ।

मल्हार राव की भूमिका:

Malhar Rao Holkar इस युद्ध में शामिल थे, लेकिन उनकी भूमिका सीमित थी। ऐसा कहा जाता है कि सदाशिवराव भाऊ ने Malhar Rao Holkar की सलाह को अस्वीकार कर दिया, जिससे मल्हार राव नाराज हो गए।

युद्ध के दौरान, मल्हार राव ने गुरिल्ला हमलों का नेतृत्व किया। उन्होंने अफगान सेना के खिलाफ छापामार युद्ध में हजारों दुर्रानी और रोहिल्ला सैनिकों को मार डाला।

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हालांकि, जब यह स्पष्ट हो गया कि मराठा सेना हार रही है, तो मल्हार राव ने युद्ध के मैदान से पीछे हटने का फैसला किया। यह एक विवादास्पद निर्णय था, लेकिन इसने उन्हें और उनकी सेना को जीवित रहने में मदद की।

युद्ध का परिणाम:

पानीपत का तीसरा युद्ध मराठा साम्राज्य के लिए एक भयानक हार थी। सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव (पेशवा का पुत्र), और हजारों मराठा सैनिक मारे गए।

यह हार मराठा साम्राज्य की उत्तर भारत में विस्तार की योजनाओं को एक बड़ा झटका थी। हालांकि, मल्हार राव ने इस हार से सीखा और बाद में मध्य भारत में मराठा शक्ति के पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मंगरोल का युद्ध:

पानीपत के बाद, मल्हार राव ने राजपूत सेनाओं को मंगरोल में निर्णायक रूप से हराया। उन्होंने मध्य भारत में मराठा शक्ति के पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

🏛️ मल्हार राव की विरासत – मृत्यु और होलकर राजवंश की स्थापना

1765 – कुरा का युद्ध – अंतिम पराजय:

1764 में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बक्सर के युद्ध में अवध के नवाब शुजा-उद-दौला को हराया। शुजा ने Malhar Rao Holkar से मदद मांगी।

1765 में कुरा के मैदानों में, ईस्ट इंडिया कंपनी के मेजर फ्लेचर ने मल्हार राव होलकर को हराया। यह बूढ़े योद्धा (72 वर्ष की उम्र में) अपनी सेना को नियंत्रित नहीं कर सके। यह उनकी पहली हार थी जो ब्रिटिश हाथों हुई।

Malhar Rao Holkar इस हार से गुस्से और आहत थे। उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने की प्रतिज्ञा की। 1766 में, रघुनाथराव 40,000 सैनिकों की सेना के साथ उत्तर आए ताकि मराठा नुकसान को पूरा किया जा सके।

मृत्यु – 20 मई 1766:

लेकिन कुछ भी करने से पहले, 20 मई 1766 को, Malhar Rao Holkar का निधन अलमपुर (भिंड, मध्य प्रदेश) में हो गया। वे 73 वर्ष के थे।

उनकी मृत्यु के स्थान पर, उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होलकर ने एक समाधि छतरी (स्मारक) बनवाई। यह आज भी भिंड जिले के अलमपुर में मौजूद है।

उत्तराधिकार:

Malhar Rao Holkar के इकलौते पुत्र खांडेराव होलकर 1754 में ही मर चुके थे। इसलिए, मल्हार राव के पोते माले राव होलकर (खांडेराव और अहिल्याबाई के पुत्र) को 1766 में इंदौर का महाराजा घोषित किया गया। अहिल्याबाई होलकर को रीजेंट (संरक्षक) बनाया गया।

दुर्भाग्यवश, माले राव 1767 में मर गए (कुछ स्रोतों के अनुसार मानसिक बीमारी के कारण)। इसके बाद, अहिल्याबाई होलकर ने इंदौर की शासिका के रूप में पदभार संभाला और 1767 से 1795 तक शासन किया।

अहिल्याबाई का शासन न्याय, शांति, और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। उन्हें भारतीय इतिहास की सबसे महान शासकों में से एक माना जाता है। मल्हार राव की सबसे बड़ी विरासत अहिल्याबाई को सती होने से रोकना और उन्हें प्रशासन में शामिल करना था।

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होलकर राजवंश:

Malhar Rao Holkar द्वारा स्थापित होलकर राजवंश भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस राजवंश ने:

  1. अहिल्याबाई होलकर (1767-1795): न्याय और धार्मिक सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध
  2. तुकोजीराव होलकर प्रथम (1795-1797): अहिल्याबाई के दत्तक पुत्र
  3. यशवंतराव होलकर प्रथम (1797-1811): “मध्य भारत का नेपोलियन” कहे जाने वाले महान योद्धा
  4. और कई अन्य शासक

होलकर राजवंश 1947 तक (भारतीय स्वतंत्रता तक) चला। 1818 में, यह एक ब्रिटिश संरक्षित रियासत बन गया।

मल्हार राव की उपलब्धियां – संक्षेप में:

  1. होलकर राजवंश के संस्थापक – एक राजवंश जो 215 वर्षों तक चला
  2. इंदौर के पहले महाराजा (1732-1766)
  3. मालवा के सुबेदार (1757-1766)
  4. पेशवा बाजीराव के सबसे विश्वसनीय सेनापतियों में से एक
  5. मराठा साम्राज्य के उत्तरी विस्तार के प्रमुख वास्तुकारों में से एक
  6. अनेक प्रमुख युद्धों में विजयी: पालखेड़ (1728), अमझेरा (1729), दिल्ली (1737), भोपाल (1737), वसई (1739), लाहौर (1758)

व्यक्तित्व:

मल्हार राव होलकर को गुरिल्ला युद्ध के सबसे बड़े विशेषज्ञों में से एक माना जाता था। उन्होंने मुगल सेनाओं की भारी तोपों और बड़ी सेनाओं के खिलाफ तेज घुड़सवार हमलों की रणनीति अपनाई।

वे एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने राजपूत राज्यों, जाट शासकों, और अन्य शक्तियों के साथ जटिल गठबंधन बनाए।

ऐतिहासिक मूल्यांकन:

इतिहासकारों ने मल्हार राव होलकर को मराठा नियंत्रण को भारत भर में फैलाने के प्रमुख वास्तुकारों में से एक माना है। उनकी मृत्यु के समय, वे मालवा के वास्तविक शासक थे और मराठा संघ के लगभग स्वतंत्र पांच शासकों में से एक के रूप में स्वीकार किए गए थे।

📚 निष्कर्ष: धूल से सिंहासन तक – एक अद्भुत यात्रा

मल्हार राव होलकर की कहानी भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरक कहानियों में से एक है। एक साधारण धनगर (गड़रिया) परिवार में जन्मे बालक ने अपनी बहादुरी, बुद्धिमत्ता, और समर्पण के बल पर एक राजवंश की स्थापना की जो दो शताब्दियों से अधिक समय तक चला।

क्या हमने सीखा:

✅ जन्म नहीं, कर्म महत्वपूर्ण है: मल्हार राव ने साबित किया कि व्यक्ति की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उसके कर्म उसकी पहचान बनाते हैं।

✅ साहस और रणनीति का संयोजन: मल्हार राव केवल एक बहादुर योद्धा नहीं थे – वे एक कुशल रणनीतिकार भी थे जिन्होंने गुरिल्ला युद्ध को कला के रूप में विकसित किया।

✅ कूटनीति की शक्ति: मल्हार राव ने दिखाया कि कभी-कभी तलवार से ज्यादा शब्दों की ताकत होती है। उन्होंने राजपूत, जाट, और अन्य शक्तियों के साथ जटिल गठबंधन बनाए।

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✅ प्रगतिशील सोच: अहिल्याबाई को सती होने से रोकना और उन्हें प्रशासन में शामिल करना मल्हार राव की प्रगतिशील सोच का प्रमाण था।

✅ विरासत का महत्व: मल्हार राव की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद होलकर राजवंश की स्थापना थी, जिसने अहिल्याबाई जैसे महान शासकों को जन्म दिया।

आधुनिक समय में प्रासंगिकता:

मल्हार राव होलकर की कहानी आज भी प्रासंगिक है। वे हमें सिखाते हैं कि:

  1. परिस्थितियां बहाना नहीं हैं – प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सफलता संभव है
  2. निरंतर सीखना आवश्यक है – मल्हार राव ने जीवन भर नई रणनीतियां और तकनीकें सीखीं
  3. टीम का महत्व – मल्हार राव ने अकेले नहीं, बल्कि अन्य सेनापतियों के साथ मिलकर विजय हासिल की
  4. विरासत बनाना – अल्पकालिक सफलता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रभाव महत्वपूर्ण है

अंतिम विचार:

मल्हार राव होलकर को नमन!

16 मार्च 1693 से 20 मई 1766 – 73 वर्षों की एक यात्रा, जो एक साधारण गांव से शुरू हुई और राजसी महलों तक पहुंची। एक ऐसी यात्रा जिसमें असंख्य युद्ध, विजय, पराजय, खुशी, और दुख शामिल थे।

Malhar Rao Holkar भारतीय इतिहास के उन महान व्यक्तियों में से एक हैं जिन्होंने अपने समय की राजनीतिक दिशा बदल दी। उन्होंने मराठा साम्राज्य को उत्तर भारत में फैलाया, मुगल साम्राज्य को कमजोर किया, और एक ऐसा राजवंश स्थापित किया जो आज भी इतिहास में जीवित है।

उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि महानता किसी एक युद्ध या विजय में नहीं, बल्कि जीवन भर के समर्पण, कठिन परिश्रम, और दूरदर्शिता में होती है।

❓ FAQ – Malhar Rao Holkar

Q1: मल्हार राव होलकर कौन थे?

A: मल्हार राव होलकर (1693-1766) मराठा साम्राज्य के एक महान सेनापति, होलकर राजवंश के संस्थापक, और इंदौर के पहले महाराजा थे।

Q2: मल्हार राव होलकर का जन्म कब और कहां हुआ?

A: मल्हार राव होलकर का जन्म 16 मार्च 1693 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के फलटण के पास मुरुम गांव में हुआ था।

Q3: होलकर राजवंश की स्थापना कब हुई?

A: होलकर राजवंश की आधिकारिक स्थापना 29 जुलाई 1732 को हुई, जब पेशवा बाजीराव प्रथम ने मल्हार राव होलकर को इंदौर राज्य का शासन सौंपा।

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👑⚔️ Share the Eternal Legacy of Malhar Rao Holkar — मालवा, दिल्ली अभियानों और तीसरे पानीपत का अमिट अध्याय

अगर यह प्रामाणिक, विरासत‑आधारित और ऐतिहासिक रिपोर्ट आपको यह समझा पाई कि मराठा जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, अनुशासन और प्रशासन से टिकती हैं — तो इसे शेयर अवश्य करें। Malhar Rao Holkar वह नाम हैं, जिन्होंने मालवा को मराठा साम्राज्य की रीढ़ बनाया, दिल्ली अभियानों (1757–1764) में निर्णायक भूमिका निभाई, इंदौर राज्य की नींव रखी और तीसरे पानीपत (1761) के बाद भी प्रशासनिक पुनर्गठन से विरासत को स्थिर किया।

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  1. परिस्थितियां बहाना नहीं हैं – प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सफलता संभव है🚩💪

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