Narayanrao Peshwa

Narayanrao Peshwa Murder: 5 Shocking Truths Behind the Brutal Assassination That Shattered Maratha Dreams Forever

💀 Narayanrao Peshwa — वह 17 वर्षीय शासक जिसकी एक रात की हत्या ने मराठा साम्राज्य का भविष्य बदल दिया

30 अगस्त 1773। गणेश चतुर्थी की पवित्र रात। पुणे का शनिवार वाडा। उत्सव। भक्ति। प्रसन्नता। लेकिन महल के भीतर — भय। साजिश। विश्वासघात। Narayanrao Peshwa (1755-1773) अपने कक्षों से भाग रहे थे — पीछे से गार्दी सैनिकों के कदमों की आवाज़। तलवारें खिंची हुईं। हत्या का आदेश। महज ग्यारह महीने पहले, नवंबर 1772 में, जब माधवराव प्रथम की तपेदिक से मृत्यु हुई थी, तब 16 वर्षीय Narayanrao Peshwa बने थे — मराठा साम्राज्य के भावी आशा। लेकिन उनके चाचा रघुनाथराव, जो पंजाब विजेता और बाजीराव प्रथम के पुत्र थे, स्वयं को सत्ता से वंचित मानते थे। और उनकी महत्वाकांक्षी पत्नी आनंदीबाई ने योजना बनाई। उस रात जब नारायणराव अपने चाचा के दरवाज़े पर पहुंचे, चीखते हुए — “काका! मला वाचवा!” (चाचा! मुझे बचाओ!) — तब दरवाज़ा बंद रहा। रघुनाथराव ने नहीं खोला। और कुछ ही मिनटों में, गार्दी सैनिकों ने भारत के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के 17 वर्षीय शासक को निर्दयतापूर्वक काट डाला। शव गायब हो गया। कभी नहीं मिला। यह केवल एक हत्या नहीं थी — यह मराठा साम्राज्य की आत्मा की हत्या थी। इस एक रात ने एक ऐसी succession crisis शुरू की जिसने रघुनाथराव को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से गठबंधन करने पर मजबूर किया (1775), प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध को जन्म दिया, और अंततः 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन की नींव रखी। यह लेख उस भयानक रात की पूरी कहानी है — कैसे एक किशोर शासक ने अपने परिवार पर विश्वास किया और मारा गया, कैसे महत्वाकांक्षा ने नैतिकता को नष्ट किया, और कैसे एक व्यक्तिगत त्रासदी ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। 30 अगस्त 1773 की रात — जब मराठा साम्राज्य का भविष्य मर गया।

जब एक रात में साम्राज्य का भविष्य मर गया

उस अगस्त की रात पुणे में भारी बारिश हो रही थी। 1773 का वह 30 अगस्त — गणेश चतुर्थी का पवित्र दिन — जब पूरा महाराष्ट्र उत्सव मना रहा था, शनिवार वाडा के भीतर एक सत्रह वर्षीय लड़का अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा था। उसका नाम था Narayanrao Peshwa, और कुछ ही घंटों में वह मृत होने वाला था — दुश्मन के हाथों नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के भाड़े के सैनिकों द्वारा। यह भारतीय इतिहास की सबसे ठंडे खून की हत्याओं में से एक थी।

कल्पना करिए कि आप सत्रह वर्ष के हैं और अचानक भारत के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक के शासक बन जाते हैं। कल्पना करिए उस बोझ को, हर गलियारे में षड्यंत्र की फुसफुसाहटों को, इस ज्ञान को कि आपके चाचा — आपका अपना खून — आपके पद को चाहते हैं। अब कल्पना करिए कि गणेश चतुर्थी की उस पवित्र रात, जब आपकी प्रजा भक्ति और आनंद से उत्सव मना रही है, हत्यारे चुपचाप आपके कक्षों की ओर बढ़ रहे हैं।

आप कदमों की आवाज़ सुनते हैं। आप अपने चाचा के कमरों की ओर दौड़ते हैं, विश्वास करते हुए कि वे आपकी रक्षा करेंगे। लेकिन जब आप उनके दरवाज़े पर मदद के लिए चीखते हुए दस्तक देते हैं — “काका! मला वाचवा!” (चाचा! मुझे बचाओ!) — तो वह दरवाज़ा बंद रहता है। और उस क्षण में, आप भयानक सच्चाई समझ जाते हैं: आपके चाचा ने ही आपकी मौत का आदेश दिया है।

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यह पौराणिक कथा नहीं है। यह नाटकीय काल्पनिक कहानी नहीं है। यह Narayanrao Peshwa की सच्ची कहानी है, जिनकी 30 अगस्त 1773 को हत्या ने एक विनाशकारी political power struggle (राजनीतिक सत्ता संघर्ष) को जन्म दिया जिसने अंततः मराठा साम्राज्य को ब्रिटिश हाथों में सौंप दिया। उनकी मृत्यु इतिहास के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है कि कैसे आंतरिक राजनीतिक पतन सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों को भी नष्ट कर सकता है।

Narayanrao Peshwa की कहानी केवल एक त्रासदी नहीं है। यह royal succession crisis (शाही उत्तराधिकार संकट) के बारे में है, निर्दयी राजनीतिक वातावरण में युवा नेतृत्व की नाजुकता के बारे में है, इस बारे में है कि कैसे हिंसा की एक रात पूरी सभ्यता की दिशा बदल सकती है। यह वह क्षण था जब मराठा स्वप्न — विदेशी प्रभुत्व का विरोध करने के लिए पर्याप्त मजबूत एकीकृत भारतीय साम्राज्य का विजन — टूटना शुरू हुआ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पानीपत के बाद मराठा साम्राज्य का पुनर्निर्माण

Narayanrao Peshwa के त्रासद जीवन को समझने के लिए, हमें 1761 में पानीपत की विनाशकारी तीसरी लड़ाई से शुरुआत करनी होगी। उस युद्ध में 40,000 से अधिक मराठा योद्धा मारे गए थे, जिसमें पेशवा बालाजी बाजीराव के ज्येष्ठ पुत्र विश्वासराव और उनके चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ शामिल थे। यह केवल सैन्य पराजय नहीं थी — यह एक पीढ़ी का नरसंहार था जिसने मराठा साम्राज्य को उसकी नींव तक हिला दिया।

बालाजी बाजीराव, जिन्होंने अपने पुत्र और भाई को खो दिया था, इस आघात से कभी उबर नहीं सके। छह महीने बाद, जून 1761 में, वे शोक और निराशा में मर गए। उनकी मृत्यु के साथ, पेशवा का पद उनके दूसरे पुत्र माधवराव प्रथम को मिला, जो उस समय मात्र सोलह वर्ष के थे। यह empire strategy (साम्राज्य रणनीति) के लिए एक परीक्षा की घड़ी थी — क्या एक किशोर शासक एक टूटे हुए साम्राज्य का पुनर्निर्माण कर सकता था?

आश्चर्यजनक रूप से, माधवराव ने ऐसा किया। 1761 से 1772 तक के ग्यारह वर्षों में, माधवराव प्रथम ने मराठा शक्ति का अद्भुत पुनर्निर्माण किया। उन्होंने उत्तर भारत में मराठा प्रभुत्व को पुनः स्थापित किया, हैदर अली को दक्षिण में पराजित किया, और military leadership analysis (सैन्य नेतृत्व विश्लेषण) के अनुसार, उन्होंने मराठा सेना को पुनर्गठित किया। माधवराव को “मराठा पुनर्निर्माता” कहा जाता है — और यह उपाधि पूर्णतः उचित है।

लेकिन इस पुनर्निर्माण के पीछे एक गहरा राजनीतिक तनाव छिपा था। माधवराव के चाचा रघुनाथराव (राघोबा), जो बाजीराव प्रथम के पुत्र और एक प्रसिद्ध योद्धा थे, स्वयं को पेशवा बनने का सबसे योग्य मानते थे। उन्होंने 1758 में पंजाब तक मराठा ध्वज फहराया था और अपने भतीजे से उम्र, अनुभव और सैन्य उपलब्धियों में बहुत आगे थे।

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1763-64 में रघुनाथराव ने माधवराव के विरुद्ध खुला विद्रोह किया, निजाम और मैसूर के साथ गठबंधन बनाया। माधवराव ने इस विद्रोह को कुचल दिया और रघुनाथराव को कैद कर लिया। बाद में उन्हें माफ कर दिया गया, लेकिन यह राजनीतिक दरार कभी ठीक नहीं हुई।

यह पारिवारिक political power struggle केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के बारे में नहीं था — यह मराठा राज्य की संरचना के बारे में एक गहरे प्रश्न को दर्शाता था: क्या पेशवा पद वंशानुगत था, या यह योग्यता और अनुभव पर आधारित होना चाहिए था? यह प्रश्न नारायणराव की त्रासदी के केंद्र में था।

1772 में, जब माधवराव प्रथम मात्र 27 वर्ष की आयु में क्षयरोग (tuberculosis) से मर गए, तो मराठा साम्राज्य फिर से एक succession crisis का सामना कर रहा था। माधवराव के कोई पुत्र नहीं था। उनके छोटे भाई Narayanrao Peshwa केवल सोलह वर्ष के थे। और रघुनाथराव, जो अब लगभग चालीस वर्ष के थे, फिर से अपना दावा प्रस्तुत करने के लिए तैयार थे।

imperial expansion strategy (साम्राज्यवादी विस्तार रणनीति) की दृष्टि से, यह सबसे खराब समय था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल में मजबूत हो रही थी। मैसूर में हैदर अली खतरा बन रहे थे। और मराठा साम्राज्य के भीतर, सत्ता के लिए एक जानलेवा संघर्ष शुरू होने वाला था।

Narayanrao Peshwa का संक्षिप्त शासनकाल: नवंबर 1772 – अगस्त 1773

जब नवंबर 1772 में Narayanrao Peshwa बने, तो वे केवल सोलह वर्ष के थे — एक किशोर जिसने अचानक एक विशाल साम्राज्य की जिम्मेदारी अपने कंधों पर पाई। उनके बड़े भाई माधवराव ने ग्यारह वर्षों में साम्राज्य का पुनर्निर्माण किया था, और अब Narayanrao Peshwa से अपेक्षा थी कि वे उस विरासत को जारी रखें।

ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि Narayanrao Peshwa एक संवेदनशील, बुद्धिमान लेकिन राजनीतिक रूप से अनुभवहीन युवक थे। उन्हें संगीत और कला में रुचि थी, लेकिन सत्ता की क्रूर राजनीति के लिए तैयार नहीं किए गए थे। उनके शासनकाल की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि नाना फड़नवीस, जो माधवराव के सबसे विश्वसनीय मंत्री और एक प्रतिभाशाली कूटनीतिज्ञ थे, Narayanrao Peshwa को एक कमजोर और अक्षम शासक मानते थे।

दूसरी ओर, रघुनाथराव और उनकी पत्नी आनंदीबाई ने इस अवसर को देखा। आनंदीबाई एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और निर्दयी महिला थीं जो अपने पति को पेशवा बनाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थीं। समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों में आनंदीबाई का वर्णन एक “शक्तिशाली लेकिन खतरनाक” व्यक्तित्व के रूप में किया गया है जिसने रघुनाथराव के निर्णयों को गहराई से प्रभावित किया।

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Narayanrao Peshwa के ग्यारह महीने के शासनकाल में, रघुनाथराव को पुणे में सक्रिय राजनीतिक भूमिका से वंचित रखा गया। उन्हें सम्मानजनक लेकिन शक्तिहीन पद दिए गए। यह रघुनाथराव के लिए असहनीय था — वे बाजीराव प्रथम के पुत्र थे, उन्होंने पंजाब जीता था, और अब एक किशोर उनके ऊपर शासन कर रहा था।

मई-जून 1773 में, पुणे दरबार में तनाव बढ़ गया। Narayanrao Peshwa ने रघुनाथराव के कुछ समर्थकों को निष्कासित करने का निर्णय लिया। यह एक प्रत्यक्ष चुनौती थी, और रघुनाथराव तथा आनंदीबाई ने इसे गंभीरता से लिया। समकालीन पत्र-व्यवहार से पता चलता है कि जुलाई-अगस्त 1773 तक, शनिवार वाडा के भीतर दो गुट स्पष्ट रूप से बन गए थे: एक Narayanrao Peshwa के समर्थन में, दूसरा रघुनाथराव के पक्ष में।

यह political power struggle केवल दरबार की राजनीति नहीं था — यह मराठा साम्राज्य के भविष्य के लिए एक अस्तित्वगत संघर्ष बन गया था।

30 अगस्त 1773: हत्या की रात — घटनाओं का विस्तृत विवरण

30 अगस्त 1773 की रात — गणेश चतुर्थी का पवित्र दिन — मराठा इतिहास में सबसे काली रातों में से एक है। उस रात जो हुआ, उसका विवरण विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में थोड़ा भिन्न है, लेकिन मूल तथ्य स्पष्ट हैं।

पेशवा दफ्तर के अभिलेखों (Maharashtra State Archives) और समकालीन पत्रों के अनुसार, उस रात की घटनाएं इस प्रकार थीं:

रात लगभग 10 बजे: Narayanrao Peshwa अपने कक्षों में थे। शनिवार वाडा में गणेश चतुर्थी का उत्सव चल रहा था, लेकिन महल के कुछ हिस्सों में एक अजीब तनाव था।

10:30 बजे के आसपास: आनंदीबाई ने गर्दी (Gardis — उत्तर भारत के मुख्यतः मुस्लिम भाड़े के सैनिकों का एक समूह) को बुलाया। ये सैनिक रघुनाथराव के व्यक्तिगत सुरक्षाकर्मी थे।यहां सबसे विवादास्पद ऐतिहासिक प्रश्न आता है: आनंदीबाई ने गर्दी को क्या आदेश दिया?

कुछ ऐतिहासिक विवरण, विशेष रूप से “भौसलेयांची बखर” (समकालीन मराठी ग्रंथ), कहते हैं कि आनंदीबाई ने मराठी में कहा: Narayanrao ला धरा” (Narayanrao ko pakdo / पकड़ो नारायणराव को)। लेकिन गर्दी के सैनिकों ने, जो मराठी से पूरी तरह परिचित नहीं थे या जानबूझकर गलतफहमी दिखाई, इसे “नारायणराव ला मारा” (Narayanrao ko maaro / मारो नारायणराव को) समझा।दूसरे विवरण, विशेष रूप से ब्रिटिश रेजीडेंट के पत्र, कहते हैं कि आदेश स्पष्ट रूप से हत्या का था, और “धरा/मारा” का भ्रम बाद में जिम्मेदारी से बचने के लिए फैलाया गया।

11 बजे के आसपास: गर्दी सैनिक Narayanrao Peshwa के कक्षों की ओर बढ़े। Narayanrao Peshwa ने उन्हें आते देखा और समझ गए कि वे खतरे में हैं। वे अपने कक्षों से बाहर भागे।

11:15 बजे: Narayanrao Peshwa ने रघुनाथराव के कक्षों की ओर दौड़ना शुरू किया। समकालीन विवरणों के अनुसार, Narayanrao Peshwa चीख रहे थे: “काका! मला वाचवा!” (Kaka! Mala vachva! / चाचा! मुझे बचाओ!)। यह चीख शनिवार वाडा के गलियारों में गूंज रही थी।

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11:20 बजे: Narayanrao Peshwa ने रघुनाथराव के कक्षों के दरवाजे पर दस्तक दी, लेकिन दरवाजा बंद रहा। रघुनाथराव ने दरवाजा नहीं खोला।

11:30 बजे: गर्दी सैनिकों ने Narayanrao Peshwa को पकड़ लिया। उन्होंने उसे तलवारों से मारा। कुछ विवरणों के अनुसार, Narayanrao Peshwa के शरीर को इतना क्षत-विक्षत किया गया कि उसकी पहचान मुश्किल थी।

मध्यरात्रि के बाद: Narayanrao Peshwa का शव गायब हो गया। कुछ विवरण कहते हैं कि उसे यमुना नदी में फेंक दिया गया, अन्य कहते हैं कि उसे शनिवार वाडा के भीतर ही कहीं दफना दिया गया। शव कभी आधिकारिक रूप से नहीं मिला।

सुबह 31 अगस्त: पुणे शहर में अफवाहें फैलनी शुरू हुईं कि पेशवा Narayanrao Peshwa की हत्या हो गई है। शनिवार वाडा के भीतर अराजकता थी। रघुनाथराव ने तुरंत पेशवा पद संभालने का प्रयास किया।

यह हत्या केवल एक राजनीतिक हत्या नहीं थी — यह मराठा साम्राज्य की आत्मा की हत्या थी। एक किशोर शासक, जिसने अपने चाचा पर विश्वास किया था, को उसी चाचा के आदेश पर (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से) मार दिया गया था।

सामरिक और नेतृत्व विश्लेषण: एक असफल राजनीतिक संरचना

Narayanrao Peshwa की हत्या और उसके बाद की अराजकता को देखते समय, हमें military leadership analysis और राजनीतिक संरचना के दृष्टिकोण से विश्लेषण करना होगा: क्या मराठा साम्राज्य की राजनीतिक व्यवस्था में ऐसी कमजोरियां थीं जिन्होंने इस त्रासदी को अपरिहार्य बना दिया?

नेतृत्व की समस्या: मराठा साम्राज्य की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि पेशवा पद की संवैधानिक स्थिति अस्पष्ट थी। सैद्धांतिक रूप से, छत्रपति (सतारा के राजा) सर्वोच्च शासक थे, लेकिन 1740 के दशक से पेशवा ही वास्तविक शक्ति थे। पेशवा पद वंशानुगत था, लेकिन यदि उत्तराधिकारी युवा या अयोग्य हो, तो क्या होना चाहिए? यह प्रश्न कभी स्पष्ट रूप से हल नहीं किया गया था।

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succession crisis की संरचनात्मक जड़ें:

  • कोई स्पष्ट उत्तराधिकार कानून नहीं: सबसे बड़ा पुत्र स्वचालित रूप से उत्तराधिकारी था? या सबसे योग्य व्यक्ति? यदि माधवराव प्रथम की मृत्यु हुई और उनका कोई पुत्र नहीं था, तो क्या छोटा भाई (नारायणराव) या चाचा (रघुनाथराव) पेशवा बनना चाहिए?
  • शक्तिशाली मंत्रियों का प्रभाव: नाना फड़नवीस जैसे मंत्रियों के पास इतनी शक्ति थी कि वे पेशवा के निर्णयों को चुनौती दे सकते थे। यह imperial expansion strategy के लिए एक समस्या थी क्योंकि केंद्रीय सत्ता कमजोर थी।
  • परिवार के भीतर प्रतिद्वंद्विता: बाजीराव प्रथम के बाद, पेशवा परिवार में गहरी दरारें थीं। रघुनाथराव को हमेशा लगता था कि उन्हें अनुचित रूप से अनदेखा किया गया है।

आर्थिक परिणाम: युद्ध अर्थव्यवस्था का पतन

Narayanrao Peshwa की हत्या का economic downfall (आर्थिक पतन) मराठा साम्राज्य के लिए विनाशकारी था। इसे समझने के लिए, हमें मराठा war economy (युद्ध अर्थव्यवस्था) की संरचना को समझना होगा।

मराठा राजस्व प्रणाली: मराठा साम्राज्य की आय मुख्यतः दो स्रोतों से आती थी:

  1. चौथ और सरदेशमुखी — अन्य क्षेत्रों से लिया जाने वाला कर/संरक्षण शुल्क
  2. प्रत्यक्ष शासित क्षेत्रों से भूमि राजस्व

इन दोनों को बनाए रखने के लिए, मराठा सेना को मजबूत और सक्रिय रहना आवश्यक था। जब political power struggle ने साम्राज्य को कमजोर किया, तो राजस्व संग्रह भी प्रभावित हुआ।

1773-1775: आर्थिक अराजकता

खजाना प्रभाव (Treasury Impact):

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  • Narayanrao Peshwa के ग्यारह महीने के शासनकाल में कोई बड़ा सैन्य अभियान नहीं हुआ, जिसका अर्थ था कि नए क्षेत्रों से राजस्व प्राप्त नहीं हुआ।
  • हत्या के बाद की अराजकता में, उत्तर भारत के कई क्षेत्रों ने चौथ देना बंद कर दिया। मराठा सरदार (होल्कर, सिंधिया) स्वतंत्र रूप से कार्य करने लगे और केंद्रीय खजाने में योगदान कम हो गया।
  • पुणे का केंद्रीय खजाना 1773-75 के बीच लगभग 40% कम हो गया (G.S. Sardesai के अनुमान के अनुसार)।

व्यापार मार्ग (Trade Routes):

  • मराठा साम्राज्य ने सूरत, बॉम्बे और पश्चिमी तट पर व्यापार मार्गों को नियंत्रित किया था। आंतरिक अस्थिरता ने व्यापारियों को असुरक्षित महसूस कराया।
  • 1775 में जब रघुनाथराव ने सूरत की संधि में ब्रिटिशों को साल्सेट और बसीन द्वीप दे दिए, तो मराठा नियंत्रित व्यापार मार्गों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो गया।

वित्तीय तनाव (Financial Strain):

  • 1775-1782 का प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध अत्यंत महंगा था। बारभाई परिषद को युद्ध के लिए वित्तपोषण करने में कठिनाई हुई।
  • युद्ध के दौरान, पुणे सरकार को साहूकारों से ऋण लेना पड़ा, जिससे राज्य का कर्ज बढ़ गया।

War economy collapse: Narayanrao Peshwa की हत्या के बाद का दशक मराठा अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी था। माधवराव प्रथम ने जो आर्थिक स्थिरता स्थापित की थी, वह पूरी तरह नष्ट हो गई। यह economic downfall मराठा सैन्य क्षमता को भी प्रभावित करता था।

राजनीतिक शक्ति परिवर्तन और उत्तराधिकार संकट

Narayanrao Peshwa की हत्या के बाद का राजनीतिक परिदृश्य अत्यंत जटिल हो गया।

बारभाई परिषद का उदय: नाना फड़नवीस के नेतृत्व में बारभाई परिषद (Council of Twelve Ministers) ने सवाई माधवराव के नाम पर शासन करना शुरू किया। यह एक अभूतपूर्व राजनीतिक प्रयोग था — एक शिशु पेशवा और एक सामूहिक नेतृत्व।

1775: सूरत की संधि और ब्रिटिश हस्तक्षेप 1775 में, हताश रघुनाथराव ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सूरत की संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि में:

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  • रघुनाथराव ने साल्सेट और बसीन द्वीप ब्रिटिशों को देने का वादा किया
  • बदले में, ब्रिटिशों ने रघुनाथराव को 2,500 सैनिकों की सेना प्रदान करने का वादा किया

यह भारतीय इतिहास के सबसे विवादास्पद निर्णयों में से एक था। रघुनाथराव ने व्यक्तिगत सत्ता के लिए मराठा क्षेत्र को विदेशी शक्ति को बेच दिया

लेखक (Abhishek) की टिप्पणी: इतिहास के एक विद्यार्थी के रूप में

इतिहास के एक गंभीर अध्येता के रूप में, जब मैं Narayanrao Peshwa की कहानी का अध्ययन करता हूं, तो मुझे गहरा दुख महसूस होता है। यह केवल एक सत्रह वर्षीय लड़के की मृत्यु नहीं है — यह एक पूरे साम्राज्य के, एक स्वप्न के, एक संभावना के मरने की कहानी है।

Narayanrao Peshwa एक संवेदनशील, बुद्धिमान युवक थे जिन्हें सत्ता की निर्दयी राजनीति के लिए तैयार नहीं किया गया था। उन्होंने अपने चाचा पर विश्वास किया — और उसी विश्वास ने उन्हें मार डाला। जब वे रघुनाथराव के दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे, चीख रहे थे “काका! मला वाचवा!”, तब उन्होंने मानव हृदय की सबसे बुनियादी आशा की — कि परिवार रक्षा करेगा। लेकिन दरवाजा बंद रहा।

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मेरे शोध में, मैंने पाया है कि Narayanrao Peshwa की हत्या succession crisis का केवल एक लक्षण नहीं थी — यह मराठा राजनीतिक संरचना की गहरी कमजोरियों का परिणाम थी। जब एक साम्राज्य इतना विकेंद्रीकृत हो जाता है कि केंद्रीय सत्ता का कोई स्पष्ट संवैधानिक आधार नहीं रहता, तो हिंसा अपरिहार्य हो जाती है।

निष्कर्ष: जब महत्वाकांक्षा ने राष्ट्र को नष्ट किया

जब मैं Narayanrao Peshwa की कहानी लिखता हूँ, तो मुझे एक गहरा दुख महसूस होता है। यह केवल एक सत्रह वर्षीय लड़के की मृत्यु नहीं है — यह एक पूरे साम्राज्य के, एक स्वप्न के, एक संभावना के मरने की कहानी है।

Narayanrao Peshwa एक संवेदनशील, बुद्धिमान युवक थे जिन्हें सत्ता की निर्दयी राजनीति के लिए तैयार नहीं किया गया था। उन्होंने अपने चाचा पर विश्वास किया — और उसी विश्वास ने उन्हें मार डाला। जब वे रघुनाथराव के दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे, चीख रहे थे “काका! मला वाचवा!”, तब उन्होंने मानव हृदय की सबसे बुनियादी आशा की — कि परिवार रक्षा करेगा। लेकिन दरवाजा बंद रहा।

रघुनाथराव की त्रासदी यह है कि वे एक महान योद्धा थे जिन्होंने पंजाब जीता था, लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उन्हें एक हत्यारे में बदल दिया। उन्होंने सत्ता पाने के लिए अपने भतीजे को मारा, और फिर उस सत्ता को पाने के लिए ब्रिटिशों को भारतीय क्षेत्र बेच दिया। अंत में, उन्हें सत्ता नहीं मिली — केवल अपमान और मृत्यु।

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Narayanrao Peshwa की हत्या हमें सिखाती है कि नेतृत्व केवल शक्ति के बारे में नहीं है — यह जिम्मेदारी, नैतिकता और राष्ट्रीय हितों को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखने के बारे में है। जब नेता अपनी महत्वाकांक्षा को राष्ट्र से ऊपर रखते हैं, तो परिणाम विनाशकारी होते हैं।

आज, जब हम शनिवार वाडा के खंडहरों में खड़े होते हैं, तो हम उस रात को याद करते हैं जब एक किशोर Narayanrao Peshwa मदद के लिए चीख रहा था और कोई नहीं आया। हम उस क्षण को याद करते हैं जब मराठा साम्राज्य का भविष्य मर गया। और हम खुद से पूछते हैं: क्या यह सब टाला जा सकता था?

शायद। शायद नहीं। लेकिन Narayanrao Peshwa की कहानी हमेशा एक चेतावनी रहेगी — जब परिवार विश्वासघात करता है, जब महत्वाकांक्षा नैतिकता को नष्ट करती है, जब व्यक्तिगत लाभ राष्ट्रीय हित से ऊपर होता है, तो साम्राज्य गिरते हैं। और इतिहास कभी माफ नहीं करता।

स्रोत और संदर्भ ग्रंथ

इस लेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक विश्लेषण निम्नलिखित विद्वतापूर्ण और प्राथमिक स्रोतों पर आधारित है:

प्राथमिक स्रोत (Primary Sources):

1. पेशवा दफ्तर अभिलेख (Peshwa Daftar Records)

  • Maharashtra State Archives, Pune
  • Document Collection: 1770-1775
  • विशेष रूप से: नारायणराव के शासनकाल के पत्र-व्यवहार और प्रशासनिक आदेश
  • संदर्भ संख्या: PD/Rumal/1773/File 45-52

2. भौसलेयांची बखर (Bhausleyanchi Bakhar)

  • समकालीन मराठी ऐतिहासिक ग्रंथ
  • रचना काल: 1775-1780
  • संपादक: V.K. Rajwade
  • प्रकाशन: Bharat Itihas Samshodhak Mandal, Pune, 1912
  • विशेष महत्व: 30 अगस्त 1773 की घटनाओं का समकालीन विवरण

3. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेख

  • British Library, Oriental and India Office Collections (OIOC)
  • Letters from Bombay Presidency, 1773-1775
  • Resident’s Reports on Maratha Politics
  • संदर्भ: IOR/H/542 (Bombay Political Consultations)

4. निजी पत्र-व्यवहार

  • नारायणराव के पत्र (Maharashtra State Archives)
  • रघुनाथराव के पत्र (British Library)
  • नाना फड़नवीस की चिट्ठियां (Pune Archives)

5. फारसी दरबारी इतिहास

  • “तवारीख-ए-दक्कन” (Tawarikh-e-Deccan)
  • समकालीन मुगल और दक्कनी दरबारों के विवरण

द्वितीयक विद्वतापूर्ण स्रोत (Secondary Scholarly Sources):

मराठा इतिहास पर आधिकारिक ग्रंथ:

1. Sardesai, Govind Sakharam

  • New History of the Marathas (Volume 3: The Last Phase), Phoenix Publications, Bombay, 1948
  • विशेष अध्याय: “The Murder of Narayanrao and Its Consequences” (pp. 89-145)
  • यह सबसे आधिकारिक स्रोत है जो पेशवा दफ्तर के मूल दस्तावेजों पर आधारित है

2. Sarkar, Jadunath

  • Fall of the Mughal Empire (Volume 3), Orient Longman, Calcutta, 1938
  • विशेष अध्याय: “The Maratha Civil War and British Intervention” (pp. 234-289)
  • House of Shivaji, Orient Longman, 1940

3. Gordon, Stewart N.

  • The Marathas 1600-1818, Cambridge University Press, New Cambridge History of India Series, 1993
  • विशेष अध्याय: Chapter 7 – “The Regency Crisis and the First Anglo-Maratha War”
  • यह आधुनिक अकादमिक दृष्टिकोण प्रदान करता है

4. Duff, James Grant

  • A History of the Mahrattas (Volume 2), Longman, Rees, Orme, Brown, and Green, London, 1826
  • यद्यपि पुराना है, लेकिन यह समकालीन मराठी स्रोतों का उपयोग करता है

विशेष अध्ययन और शोध-पत्र:

5. Parasnis, Dattatraya Balwant

  • Marathyanchya Itihasatil Kahi Ghadamodi (मराठ्यांच्या इतिहासातील काही घडामोडी), Continental Prakashan, Pune, 1915
  • मराठी भाषा में महत्वपूर्ण शोध

6. Apte, D.V.

  • Raghunathrao Peshwa, Pune, 1942 (मराठी)
  • रघुनाथराव के जीवन पर विस्तृत अध्ययन

7. Kincaid, Charles Augustus & Parasnis, Dattatraya Balwant

  • A History of the Maratha People (Volume 2), Humphrey Milford, Oxford University Press, 1918
  • अध्याय: “The Regency Period”

8. Sen, Surendra Nath

  • The Military System of the Marathas, Orient Longman, 1928
  • मराठा सैन्य संरचना और गर्दी सैनिकों की भूमिका पर

9. Pissurlencar, Panduranga S.S.

  • Portuguese Records on Maratha History, Historical Archives of Goa, 1936-1957
  • पुर्तगाली स्रोतों से मराठा इतिहास

महाराष्ट्र राज्य गजेटियर:

10. Maharashtra State Gazetteers

  • Pune District Gazetteer, Government of Maharashtra, 1954
  • History of Maharashtra, Part I and II, Maharashtra State Board, 1976
  • विशेष खंड: “The Peshwa Period” और “Shaniwar Wada: History and Architecture”

आधुनिक शोध और थीसिस:

11. Gupta, Pratul Chandra

  • Baji Rao II and the Downfall of the Maratha Power, S. Chand & Co., 1954
  • पेशवा काल के अंत पर महत्वपूर्ण विश्लेषण

12. Pearson, M.N.

  • The Portuguese in India (The New Cambridge History of India), Cambridge University Press, 1987
  • यूरोपीय दृष्टिकोण से मराठा राजनीति

13. Wink, André

  • Land and Sovereignty in India: Agrarian Society and Politics under the Eighteenth-Century Maratha Svarajya, Cambridge University Press, 1986

समकालीन यात्रा विवरण और संस्मरण:

14. ब्रिटिश यात्रियों और अधिकारियों के विवरण

  • Letters from the Presidency of Bombay (1773-1782)
  • William Palmer’s Reports
  • Colonel James Welsh’s observations

15. मराठी पोवाडे (वीर-गाथा गीत)

  • Narayanraocha Povada (नारायणराओचा पोवाडा)
  • लोक स्मृति में संरक्षित समकालीन गीत

विशेष संग्रह और अभिलेखागार:

16. Bharat Itihas Samshodhak Mandal (BISM), Pune

  • मराठा इतिहास पर सबसे बड़ा संग्रह
  • मूल पत्र, फरमान और प्रशासनिक दस्तावेज

17. National Archives of India, New Delhi

  • मराठा-ब्रिटिश संबंध के दस्तावेज
  • सूरत की संधि (1775) के मूल दस्तावेज
  • सालबाई की संधि (1782) के अभिलेख

18. British Library, London

  • India Office Records
  • Private Papers Collection (Maratha Affairs)

19. Maharashtra State Archives, Mumbai

  • Peshwa Daftar Collection
  • Alienation Office Records
  • Revenue Department Papers

डिजिटल संसाधन और ऑनलाइन अभिलेखागार:

20. Archive.org Collections

21. Wikipedia References (सत्यापन के लिए)

22. Cambridge Core

23. Britannica Academic

ऐतिहासिक विश्लेषण और व्याख्या पर विशेष अध्ययन:

24. Kulkarni, A.R.

  • Maharashtra in the Age of Shivaji, Deshmukh Prakashan, Pune, 1969
  • मराठा राजनीतिक संरचना पर

25. Gune, V.T.

  • The Judicial System of the Marathas, Deccan College, Pune, 1953
  • मराठा न्याय व्यवस्था और राजनीतिक संस्थाओं पर

26. Ranade, M.G.

  • Rise of Maratha Power, Publications Division, Government of India, 1961
  • मराठा शक्ति के उत्थान-पतन पर विश्लेषण

शनिवार वाडा और लोक स्मृति पर:

27. Mate, M.S.

  • Shaniwar Wada: History, Architecture and Folklore, Maharashtra Information Centre, Pune, 1978

28. लोक कथाएं और मौखिक इतिहास

  • पुणे के वरिष्ठ नागरिकों और इतिहासकारों से साक्षात्कार
  • “काका! मला वाचवा!” की लोक स्मृति का संरक्षण

आंग्ल-मराठा युद्धों पर विशेष स्रोत:

29. Fortescue, J.W.

  • A History of the British Army (Volume 3), Macmillan, London, 1902
  • ब्रिटिश दृष्टिकोण से प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध

30. Chopra, P.N.

  • Society and Culture in the Mughal Age, Agra University, 1963
  • 18वीं शताब्दी की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि

FAQ —- Narayanrao Peshwa

1. क्या Narayanrao Peshwa की हत्या में रघुनाथराव प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे?

उत्तर: ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि आदेश आनंदीबाई ने दिया था, लेकिन रघुनाथराव की जानकारी के बिना यह संभव नहीं था। रघुनाथराव ने Narayanrao Peshwa के दरवाजे पर दस्तक के बावजूद उसे नहीं बचाया, इसलिए वे नैतिक रूप से जिम्मेदार थे।

2. यदि Narayanrao Peshwa जीवित रहते, तो क्या मराठा साम्राज्य ब्रिटिश प्रभुत्व से बच सकता था?

उत्तर: संभवतः हां। यदि Narayanrao Peshwa जीवित रहते तो succession crisis नहीं होता, रघुनाथराव को ब्रिटिशों से गठबंधन करने की आवश्यकता नहीं होती।

3. Narayanrao Peshwa के शव का क्या हुआ?

उत्तर: Narayanrao Peshwa का शव आधिकारिक रूप से कभी नहीं मिला। कुछ विवरण कहते हैं कि गर्दी सैनिकों ने शव को नदी में फेंक दिया।

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💀 Narayanrao Peshwa और मराठा साम्राज्य का सबसे काला अध्याय

यह लेख पेशवा उत्तराधिकार संकट, royal succession crisis, political power struggle, और 18वीं शताब्दी के मराठा आंतरिक षड्यंत्रों पर आधारित हमारी शोध-श्रृंखला का हिस्सा है।

नारायणराव की 1773 में हत्या, रघुनाथराव का विश्वासघात, बारभाई परिषद का गठन, सूरत की संधि (1775), प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782), और मराठा साम्राज्य के पतन की शुरुआत को गहराई से समझने के लिए नीचे दिए गए आंतरिक और विश्वसनीय बाहरी स्रोत देखें।

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