👑 Raghunathrao Peshwa (राघोबा) — वह पेशवा जिसने ब्रिटिशों को बुलाकर मराठा साम्राज्य का पतन प्रारंभ किया
जब 1775 में सूरत की संधि पर हस्ताक्षर हुए, तब एक मराठा राजकुमार ने ऐसा कदम उठाया जो भारतीय इतिहास की दिशा बदल देने वाला था — Raghunathrao Peshwa (राघोबा, 1734-1783), महान बाजीराव प्रथम के पुत्र, बालाजी बाजीराव के छोटे भाई और 1758 में पंजाब तक मराठा ध्वज फहराने वाले योद्धा, ने पेशवा पद प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सैन्य सहायता मांगी। वे पुणे के शाही परिवार में पले-बढ़े थे, उन्होंने अटक तक मराठा विजय का स्वर्णिम काल देखा था, लेकिन अपने भतीजे नारायणराव की हत्या (1773) में संलिप्तता और बारभाई परिषद द्वारा सत्ता से बहिष्कृत किए जाने के बाद, उन्होंने वह निर्णय लिया जो राष्ट्रीय विश्वासघात बन गया — साल्सेट और बसीन द्वीप ब्रिटिशों को देने का वादा करके उन्होंने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782) को जन्म दिया। यह लेख उस गहन ऐतिहासिक विश्लेषण को प्रस्तुत करता है जो Raghunathrao Peshwa के साहसी सैन्य जीवन से लेकर उनकी विनाशकारी राजनीतिक त्रुटियों तक, नारायणराव हत्याकांड की पेचीदगियां, ब्रिटिश गठबंधन के दीर्घकालिक परिणाम, और मराठा साम्राज्य के पतन में उनकी केंद्रीय भूमिका को उजागर करता है — एक कहानी जो सैन्य प्रतिभा, राजनीतिक महत्वाकांक्षा, पारिवारिक षड्यंत्र और राष्ट्रीय विनाश की मार्मिक गाथा है।
परिचय: भारतीय इतिहास में रघुनाथराव का महत्व
Raghunathrao Peshwa (1734-1783), जिन्हें “राघोबा” के नाम से जाना जाता है, मराठा इतिहास के सबसे जटिल, विवादास्पद और दुखद व्यक्तित्वों में से एक हैं। पेशवा बाजीराव प्रथम के पुत्र और बालाजी बाजीराव के छोटे भाई के रूप में, Raghunathrao Peshwa के पास असाधारण राजनीतिक विरासत और सैन्य प्रशिक्षण था। वे एक कुशल सैनिक थे जिन्होंने 1758 में पंजाब अभियान का नेतृत्व किया और अटक तक मराठा ध्वज फहराया। लेकिन इतिहास ने उन्हें एक बहुत अलग कारण से याद किया — नारायणराव पेशवा की हत्या में संलिप्तता और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सूरत की संधि (1775), जिसने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782) को जन्म दिया।
Raghunathrao Peshwa का ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने मराठा साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया में एक निर्णायक भूमिका निभाई। उनके निर्णयों — विशेष रूप से ब्रिटिश सहायता मांगना — ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को पहली बार मराठा आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप का अवसर दिया। यह हस्तक्षेप अंततः 1818 में मराठा साम्राज्य के पूर्ण पतन का प्रारंभिक बिंदु बना। इस अर्थ में, रघुनाथराव का जीवन न केवल मराठा इतिहास का, बल्कि भारतीय औपनिवेशिक इतिहास का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

Raghunathrao Peshwa की कहानी केवल विश्वासघात और महत्वाकांक्षा की नहीं है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपने समय की जटिल राजनीति, पारिवारिक षड्यंत्रों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच फंसा था। उनका मूल्यांकन करते समय हमें उस युग की जटिल परिस्थितियों को समझना आवश्यक है जब मराठा साम्राज्य पानीपत की पराजय के बाद पुनर्निर्माण के प्रयास में था और ब्रिटिश शक्ति तेजी से बढ़ रही थी।
ऐतिहासिक संदर्भ: अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध का भारत
Raghunathrao Peshwa का राजनीतिक जीवन 1750 से 1783 तक फैला था — एक ऐसा युग जो भारतीय इतिहास में सबसे अधिक परिवर्तनकारी था। 1761 में पानीपत की विनाशकारी पराजय के बाद मराठा साम्राज्य गहरे संकट में था। पेशवा बालाजी बाजीराव की शोकमृत्यु के बाद उनके पुत्र माधवराव प्रथम (1761-1772) ने असाधारण क्षमता के साथ मराठा शक्ति का पुनर्निर्माण किया। माधवराव को “मराठा पुनर्निर्माता” माना जाता है और उनके शासनकाल में मराठा शक्ति पुनः उत्तर भारत में स्थापित हुई।
लेकिन इसी काल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शक्ति भी तेजी से बढ़ रही थी। 1757 में प्लासी की लड़ाई में क्लाइव की विजय के बाद कंपनी ने बंगाल पर नियंत्रण स्थापित किया। 1764 में बक्सर की लड़ाई ने कंपनी को उत्तर भारत में एक प्रमुख शक्ति बना दिया। 1772 तक कंपनी का प्रभाव मद्रास, बंगाल और बॉम्बे तक फैल गया था। बॉम्बे प्रेसिडेंसी मराठा क्षेत्रों से सटी थी और कंपनी मराठा राजनीति में हस्तक्षेप के अवसर खोज रही थी।
दक्षिण भारत में हैदराबाद का निजाम और मैसूर का हैदर अली भी महत्वपूर्ण शक्तियां थीं। राजपूताना में विभिन्न राजपूत राज्य अर्ध-स्वतंत्र थे। मराठा संघ में सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ और भोंसले परिवार स्वतंत्र शक्तियां बन चुके थे। पेशवा का केंद्रीय नियंत्रण कमजोर हो रहा था। इस विकेंद्रीकृत राजनीतिक संरचना में, एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति के लिए षड्यंत्र और बाहरी सहायता मांगना अपेक्षाकृत आसान था।

माधवराव प्रथम की 1772 में मात्र 27 वर्ष की आयु में क्षयरोग से मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए एक गहरा आघात था। उनकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का संकट उत्पन्न हुआ जिसमें रघुनाथराव की भूमिका केंद्रीय बनी। यह वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि थी जिसमें रघुनाथराव के सबसे विवादास्पद कार्य घटित हुए।
सामाजिक दृष्टि से, यह काल चितपावन ब्राह्मण पेशवाओं और मराठा सरदारों के बीच बढ़ते तनाव का भी था। पेशवा परिवार के भीतर आंतरिक संघर्ष इस सामाजिक तनाव का प्रतिबिंब था। रघुनाथराव एक ऐसे व्यक्ति थे जो इन सभी जटिलताओं के केंद्र में थे — एक पेशवा परिवार का सदस्य जो सर्वोच्च सत्ता पाना चाहता था लेकिन जिसे बार-बार अस्वीकार किया गया।
प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक विरासत
Raghunathrao Peshwa का जन्म 18 अगस्त 1734 को पुणे के पास हुआ था। वे पेशवा बाजीराव प्रथम और काशीबाई के द्वितीय पुत्र थे। उनके बड़े भाई बालाजी बाजीराव (नाना साहेब पेशवा) 1740 में पेशवा बने। Raghunathrao Peshwa बचपन से ही तीव्र बुद्धि और सैन्य साहस के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनके स्वभाव में एक आवेगशीलता और अधीरता भी थी जो बाद में उनके जीवन की कई त्रासदियों का कारण बनी।
Raghunathrao Peshwa की शिक्षा पारंपरिक ब्राह्मणवादी पद्धति से हुई। उन्होंने संस्कृत, मराठी और फारसी का अध्ययन किया। सैन्य प्रशिक्षण में उन्होंने असाधारण कौशल दिखाया। 1750 के दशक से उन्होंने विभिन्न सैन्य अभियानों में भाग लेना शुरू किया। 1754 में उन्होंने कर्नाटक में मराठा अभियानों में भाग लिया। 1757 में उन्होंने उत्तर भारत में अभियान का नेतृत्व किया और दिल्ली पर मराठा नियंत्रण स्थापित करने में सहायता की।
1758 में Raghunathrao Peshwa के जीवन का सबसे गौरवशाली क्षण आया जब उन्होंने पंजाब अभियान का नेतृत्व किया। उन्होंने लाहौर, मुलतान और अटक पर विजय प्राप्त की और मराठा ध्वज पंजाब में फहराया। यह मराठा शक्ति का अधिकतम उत्तरी विस्तार था। इस सफलता ने Raghunathrao Peshwa को एक महान सैन्य नेता के रूप में स्थापित किया और उनकी महत्वाकांक्षाओं को और अधिक तीव्र कर दिया।

1761 में पानीपत की पराजय ने Raghunathrao Peshwa को गहरा व्यक्तिगत आघात दिया। उनके बड़े भाई बालाजी बाजीराव के पुत्र विश्वासराव और चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ पानीपत में मारे गए। बालाजी की शोक में मृत्यु हुई और अब Raghunathrao Peshwa के भतीजे माधवराव पेशवा बने। यहीं से Raghunathrao Peshwa और माधवराव के बीच एक जटिल संबंध शुरू हुआ जो सहयोग, प्रतिद्वंद्विता और अंततः खुले संघर्ष में बदल गया।
माधवराव और Raghunathrao Peshwa के संबंध जटिल थे। माधवराव एक असाधारण प्रशासक और रणनीतिकार थे, लेकिन वे जानते थे कि उनके चाचा Raghunathrao Peshwa उनकी सत्ता के लिए एक स्थायी चुनौती हैं। 1763-64 में Raghunathrao Peshwa ने निजाम और मैसूर के साथ गठबंधन बनाकर माधवराव के विरुद्ध विद्रोह किया। माधवराव ने इस विद्रोह को कुचला और Raghunathrao Peshwa को कैद कर लिया। बाद में माधवराव ने उन्हें रिहा किया, लेकिन यह संबंध कभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। 1772 में माधवराव की मृत्यु के बाद Raghunathrao Peshwa के जीवन का सबसे विवादास्पद अध्याय शुरू हुआ।
शासन की महत्वाकांक्षा और राजनीतिक संघर्ष
1772 में माधवराव प्रथम की मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई नारायणराव पेशवा बने। नारायणराव केवल सोलह वर्ष के थे और Raghunathrao Peshwa अब पेशवा पद के सबसे स्पष्ट दावेदार थे। 1773 में एक भयावह घटना घटी जो मराठा इतिहास में सबसे बड़े विवादों में से एक बन गई। नारायणराव की हत्या हो गई — और आरोप Raghunathrao Peshwa पर लगे।
ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि Raghunathrao Peshwa की पत्नी आनंदीबाई, जो एक अत्यंत महत्वाकांक्षी महिला थीं, ने Raghunathrao Peshwa के समर्थकों को नारायणराव को “पकड़ने” (कैद करने) का आदेश दिया। कुछ ऐतिहासिक विवरण कहते हैं कि आदेश “धरा” (पकड़ो) था, लेकिन सैनिकों ने इसे “मारा” (मारो) समझा। यह विवरण विद्वानों के बीच बहस का विषय है। जो निश्चित है, वह यह है कि नारायणराव की हत्या हुई और इसके बाद Raghunathrao Peshwa पेशवा बने।
हालांकि, मराठा सरदारों और नाना फड़नवीस के नेतृत्व में “बारभाई परिषद” ने Raghunathrao Peshwa को अवैध शासक घोषित किया। नारायणराव की विधवा गंगाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसे “सवाई माधवराव” (माधवराव द्वितीय) नाम दिया गया। बारभाई परिषद ने इस शिशु को वैध पेशवा घोषित किया और Raghunathrao Peshwa को सत्ता से हटा दिया।

Raghunathrao Peshwa के लिए यह एक असहनीय स्थिति थी। उन्होंने अपनी सत्ता पुनः प्राप्त करने के लिए एक ऐसा निर्णय लिया जो मराठा इतिहास का सबसे विवादास्पद कदम बना — उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायता मांगी। 1775 में सूरत की संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें Raghunathrao Peshwa ने ब्रिटिशों को साल्सेट और बसीन द्वीप देने का वादा किया और बदले में ब्रिटिश सैन्य सहायता प्राप्त की। यह एक राष्ट्रीय विश्वासघात था जिसने ब्रिटिशों को मराठा राजनीति में स्थायी प्रवेश का अवसर दिया।
सूरत की संधि ने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782) को जन्म दिया। इस युद्ध में मराठा सेनाओं ने ब्रिटिशों को कई बार पराजित किया, विशेष रूप से 1779 में वड्गांव की लड़ाई में। अंततः 1782 में सालबाई की संधि से युद्ध समाप्त हुआ। Raghunathrao Peshwa को पेशवा पद नहीं मिला और उन्हें एक पेंशन पर रहने के लिए मजबूर किया गया। 1783 में उनकी मृत्यु हो गई — एक पराजित, अपमानित और एकाकी व्यक्ति के रूप में।
राजनीतिक और सैन्य भूमिका का विश्लेषण
Raghunathrao Peshwa की सैन्य क्षमता निर्विवाद थी। 1758 का पंजाब अभियान उनकी सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि थी। उन्होंने तीव्र गति से उत्तर की ओर बढ़ते हुए लाहौर, मुलतान और अटक पर विजय प्राप्त की। यह अभियान मराठा सैन्य क्षमता का एक अद्भुत प्रदर्शन था जो दर्शाता था कि Raghunathrao Peshwa अपने पिता बाजीराव प्रथम की सैन्य प्रतिभा के वास्तविक उत्तराधिकारी थे।
हालांकि, Raghunathrao Peshwa की राजनीतिक क्षमता उनकी सैन्य प्रतिभा से बहुत पीछे थी। उन्होंने बार-बार ऐसे राजनीतिक निर्णय लिए जो उनके दीर्घकालिक हितों के विरुद्ध थे। माधवराव के विरुद्ध विद्रोह, नारायणराव की हत्या में संलिप्तता और ब्रिटिशों से गठबंधन — ये तीनों निर्णय उनकी राजनीतिक दूरदृष्टि की कमी को दर्शाते हैं।
Raghunathrao Peshwa की नेतृत्व शैली आवेगशील और अधीर थी। वे दीर्घकालिक रणनीतिक योजना बनाने में असमर्थ थे। जब भी वे किसी बाधा का सामना करते, वे बाहरी सहायता की ओर मुड़ते — पहले निजाम और हैदर अली की ओर, फिर ब्रिटिशों की ओर। यह प्रवृत्ति उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी थी।

नाना फड़नवीस, जो बारभाई परिषद के प्रमुख थे, Raghunathrao Peshwa के सबसे चतुर और प्रभावी विरोधी थे। नाना फड़नवीस एक असाधारण कूटनीतिज्ञ थे, जिन्होंने Raghunathrao Peshwa के हर कदम का काउंटर किया। उन्होंने ब्रिटिशों के साथ अलग संधियां कीं, मराठा सरदारों को एकजुट रखा और सवाई माधवराव की रक्षा की। Raghunathrao Peshwa और नाना फड़नवीस के बीच का संघर्ष मराठा इतिहास के सबसे नाटकीय राजनीतिक संघर्षों में से एक था।
सूरत की संधि के विश्लेषण में यह समझना महत्वपूर्ण है कि रघुनाथराव के पास कोई अन्य विकल्प था या नहीं। बारभाई परिषद मराठा सरदारों का एक मजबूत गठबंधन था और सवाई माधवराव को वैध पेशवा के रूप में स्थापित कर चुका था। रघुनाथराव के पास मराठा राज्य के भीतर पर्याप्त समर्थन नहीं था। इस परिप्रेक्ष्य में, ब्रिटिश सहायता मांगना उनके लिए एकमात्र विकल्प लग सकता था। लेकिन यह एक ऐसा निर्णय था जिसके दीर्घकालिक परिणाम भयावह थे।
ऐतिहासिक विश्लेषण और विद्वानों के दृष्टिकोण
Raghunathrao Peshwa के ऐतिहासिक मूल्यांकन को लेकर विद्वानों के बीच महत्वपूर्ण मतभेद हैं। जी.एस. सरदेसाई ने “न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज” में Raghunathrao Peshwa को “एक साहसी योद्धा लेकिन एक घातक रूप से त्रुटिपूर्ण राजनेता” के रूप में वर्णित किया है। सरदेसाई के अनुसार, रघुनाथराव की सैन्य प्रतिभा उनकी राजनीतिक अदूरदर्शिता से नष्ट हो गई। उनका सबसे बड़ा दोष यह था कि उन्होंने मराठा साम्राज्य के सबसे बड़े शत्रु — ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी — को मराठा आंतरिक राजनीति में प्रवेश का अवसर दिया।
जदुनाथ सरकार ने Raghunathrao Peshwa के ऐतिहासिक महत्व का मूल्यांकन मुख्यतः उनके ब्रिटिश गठबंधन के संदर्भ में किया है। सरकार का मानना है कि सूरत की संधि एक ऐतिहासिक भूल थी जिसने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध को जन्म दिया और मराठा साम्राज्य के पतन की नींव रखी। हालांकि, सरकार यह भी स्वीकार करते हैं कि रघुनाथराव के पास सीमित विकल्प थे और बारभाई परिषद के विरुद्ध उनका संघर्ष समझ में आता था।

स्टुअर्ट गॉर्डन ने “द मराठाज 1600-1818” में Raghunathrao Peshwa को मराठा राजनीति के विकेंद्रीकरण के प्रतीक के रूप में देखा है। गॉर्डन के अनुसार, Raghunathrao Peshwa की महत्वाकांक्षा और बारभाई परिषद के बीच संघर्ष मराठा संघ की आंतरिक कमजोरियों को दर्शाता है। जब एक साम्राज्य इस हद तक विकेंद्रीकृत हो जाता है कि उसके अपने राजकुमार बाहरी शक्तियों से सहायता मांगने लगते हैं, तो उस साम्राज्य का पतन अवश्यंभावी हो जाता है।
नारायणराव की हत्या में रघुनाथराव की भूमिका के संबंध में इतिहासकारों के बीच बहस जारी है। कुछ विद्वान, जैसे पी.के. गोडे, मानते हैं कि हत्या का आदेश Raghunathrao Peshwa ने नहीं, बल्कि उनकी पत्नी आनंदीबाई ने दिया था। दूसरे विद्वान, जैसे डी.वी. आपटे, तर्क देते हैं कि रघुनाथराव की जानकारी और सहमति के बिना यह हत्या संभव नहीं थी। यह विवाद आज भी अनिर्णीत है, लेकिन यह स्पष्ट है कि रघुनाथराव ने नारायणराव की मृत्यु से राजनीतिक लाभ उठाया।
आधुनिक मराठी इतिहासकारों में रघुनाथराव के प्रति कुछ हद तक सहानुभूति देखी जाती है। वे तर्क देते हैं कि Raghunathrao Peshwa एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें उनके युग की राजनीतिक परिस्थितियों का शिकार बनाया गया। माधवराव और बारभाई परिषद के साथ उनके संघर्ष को केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए — यह मराठा संघ के भीतर सत्ता के वितरण और वैधता के प्रश्नों से जुड़ा था।
दीर्घकालिक प्रभाव और विरासत
Raghunathrao Peshwa की विरासत मुख्यतः नकारात्मक है, लेकिन यह पूरी तरह उचित नहीं है। उनका सबसे महत्वपूर्ण नकारात्मक योगदान सूरत की संधि थी जिसने ब्रिटिशों को मराठा राजनीति में स्थायी प्रवेश का अवसर दिया। प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध ने मराठा साम्राज्य को अत्यधिक कमजोर किया और ब्रिटिश शक्ति को वैधता प्रदान की। यद्यपि मराठों ने कई लड़ाइयां जीतीं और सालबाई की संधि (1782) तुलनात्मक रूप से अनुकूल थी, लेकिन ब्रिटिश भारतीय राजनीति में स्थायी रूप से स्थापित हो गए थे।
दीर्घकालिक दृष्टि से, Raghunathrao Peshwa के ब्रिटिश गठबंधन ने एक खतरनाक नजीर स्थापित की। इसके बाद ब्रिटिशों ने बार-बार मराठा आंतरिक संघर्षों में हस्तक्षेप किया। द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805) और तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818) इसी क्रम में आए। 1818 में मराठा साम्राज्य का अंत हो गया। इस अर्थ में, रघुनाथराव का 1775 का निर्णय 1818 के पतन की प्रारंभिक कड़ी था।

हालांकि, Raghunathrao Peshwa की सकारात्मक विरासत उनके 1758 के पंजाब अभियान में है। उन्होंने मराठा ध्वज को सिंधु नदी तक पहुंचाया, जो मराठा शक्ति की सर्वोच्च उपलब्धि थी। यह अभियान दर्शाता है कि मराठा साम्राज्य वास्तव में एक अखिल भारतीय शक्ति बन सकता था। यदि पानीपत की पराजय नहीं होती और Raghunathrao Peshwa ने अपनी सैन्य प्रतिभा को राजनीतिक विवेक के साथ जोड़ा होता, तो वे मराठा इतिहास के महानतम नेताओं में से एक होते।
महाराष्ट्र में Raghunathrao Peshwa को एक जटिल भावना के साथ याद किया जाता है। उन्हें न तो एक नायक के रूप में सम्मानित किया जाता है और न ही एक खलनायक के रूप में पूरी तरह निंदित किया जाता है। वे मराठा इतिहास के उस दुखद अध्याय का प्रतीक हैं जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ने राष्ट्रीय हितों को नष्ट किया। उनकी कहानी आज भी यह सबक सिखाती है कि सत्ता की भूख, यदि राजनीतिक विवेक से नहीं संतुलित की जाए, तो किसी भी महान विरासत को नष्ट कर सकती है।
लेखक (Abhishek) का विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
इतिहास के एक गंभीर अध्येता के रूप में, जब मैं Raghunathrao Peshwa के जीवन का अध्ययन करता हूं, तो मुझे एक गहरी त्रासदी दिखाई देती है जो व्यक्तिगत और ऐतिहासिक दोनों स्तरों पर घटित हुई। Raghunathrao Peshwa एक ऐसे व्यक्ति थे जिनमें महानता की संभावना थी — उनकी 1758 की पंजाब विजय यह सिद्ध करती है। लेकिन वे एक ऐसे परिवार और राजनीतिक वातावरण में थे जहां उन्हें बार-बार अस्वीकार किया गया।
मेरे विचार से, Raghunathrao Peshwa की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि वे सही समय पर गलत स्थान पर थे। यदि वे माधवराव प्रथम के बजाय पेशवा होते, तो शायद मराठा इतिहास अलग होता। माधवराव असाधारण थे — लेकिन उनकी उपस्थिति ने Raghunathrao Peshwa जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति को स्थायी रूप से छाया में रखा। इस निरंतर अस्वीकृति ने रघुनाथराव के स्वभाव को कड़वाहट से भर दिया और उनके निर्णयों को आवेगशील बना दिया।

नारायणराव की हत्या के संदर्भ में, मैं यह मानता हूं कि इस घटना में Raghunathrao Peshwa की सटीक भूमिका स्पष्ट नहीं है। लेकिन जो स्पष्ट है, वह यह है कि उन्होंने इस हत्या से राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास किया। यह नैतिक रूप से अस्वीकार्य था, भले ही उन्होंने स्वयं हत्या का आदेश न दिया हो। एक नेता की जिम्मेदारी होती है कि वह ऐसी स्थितियों से दूर रहे जो हिंसा को प्रोत्साहित करती हैं।
ब्रिटिश गठबंधन के निर्णय पर, मैं Raghunathrao Peshwa के साथ कुछ सहानुभूति रखता हूँ लेकिन उनके निर्णय से सहमत नहीं हूँ। उनके पास सीमित विकल्प थे और बारभाई परिषद एक शक्तिशाली विरोधी था। लेकिन एक मराठा नेता से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह साम्राज्य के दीर्घकालिक हितों को अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखे। रघुनाथराव ऐसा नहीं कर सके।
अंततः, इतिहास के एक छात्र के रूप में, मैं Raghunathrao Peshwa को एक त्रासद व्यक्ति के रूप में देखता हूं — न पूर्ण खलनायक, न पूर्ण नायक। उनका जीवन यह सिखाता है कि सत्ता और महत्वाकांक्षा केवल तब सकारात्मक होते हैं जब वे राजनीतिक विवेक, नैतिकता और राष्ट्रीय हितों के प्रति प्रतिबद्धता के साथ संतुलित हों। Raghunathrao Peshwa के पास पहले दो का अभाव था और तीसरे की पूर्णतः उपेक्षा की। यही उनकी ऐतिहासिक त्रासदी है।
स्रोत और संदर्भ ग्रंथ
प्राथमिक स्रोत:
- पेशवा दफ्तर अभिलेख (Maharashtra State Archives, Pune)
- सूरत की संधि के मूल दस्तावेज (British Library, Oriental Collections)
- समकालीन मराठी बखरें और पत्र-व्यवहार
द्वितीयक विद्वतापूर्ण स्रोत:
- Sardesai, G.S. – New History of the Marathas (Volume 3), Phoenix Publications, 1948
- Sarkar, Jadunath – Fall of the Mughal Empire (Volumes 2-4), Orient Longman
- Gordon, Stewart – The Marathas 1600-1818, Cambridge University Press, 1993
- Pissurlencar, P.S.S. – Portuguese Records of Maratha History, Goa, 1956
- Duff, James Grant – History of the Mahrattas, Longman, London, 1826
विशेष अध्ययन:
- Apte, D.V. – Raghunathrao Peshwa, Pune, 1942 (मराठी)
- Parasnis, D.B. – Marathyanchya Itihasatil Kahi Ghadamodi, Pune, 1915
- Bendrey, V.S. – Coronation of Shivaji the Great, Karnatak Publishing House, 1960
महाराष्ट्र राज्य गजेटियर:
- Maharashtra State Gazetteer – Pune District, 1954
- Maharashtra State Gazetteer – History, Part I, 1976
FAQ — Raghunathrao Peshwa
प्रश्न 1: Raghunathrao Pes ने 1758 में पंजाब विजय के बाद अटक में क्या रणनीतिक गलती की जिसने 1761 के पानीपत युद्ध को अपरिहार्य बना दिया?
उत्तर: यह प्रश्न मराठा इतिहास के सबसे कम चर्चित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है। 1758 में जब रघुनाथराव ने पंजाब पर विजय प्राप्त की और अटक किले तक मराठा ध्वज फहराया, तब उनके पास एक सुनहरा अवसर था कि वे स्थानीय शक्तियों — विशेष रूप से सिख मिसलों, पख्तून जनजातियों और स्थानीय अफगान सरदारों — के साथ स्थायी गठबंधन स्थापित करें। लेकिन रघुनाथराव और मराठा प्रशासन ने एक घातक त्रुटि की: उन्होंने पंजाब को केवल राजस्व संग्रह का क्षेत्र माना, न कि एक रणनीतिक सीमांत क्षेत्र जिसे सुरक्षित और एकीकृत किया जाना चाहिए था।
ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि मराठा अधिकारियों ने पंजाब में अत्यधिक कर लगाए और स्थानीय आबादी के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलता नहीं दिखाई। सिख मिसलों, जो मुगल और अफगान दोनों के विरुद्ध लड़ चुकी थीं, को मराठों ने संभावित सहयोगी के बजाय केवल कर देने वाली प्रजा माना। यह एक रणनीतिक भूल थी क्योंकि सिख पंजाब की सबसे संगठित सैन्य शक्ति थे और अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध एक प्राकृतिक गठबंधन हो सकते थे।
अब्दाली के लिए, मराठों की पंजाब में उपस्थिति एक सीधी चुनौती थी। पंजाब उसके दुर्रानी साम्राज्य का सबसे समृद्ध राजस्व स्रोत था और काबुल से दिल्ली तक के व्यापार मार्ग पर नियंत्रण के लिए अनिवार्य था। रघुनाथराव ने पंजाब में स्थानीय गठबंधन बनाने के बजाय केवल सैन्य दबदबा स्थापित किया, जिससे जब 1759 में अब्दाली फिर से आक्रमण के लिए आया, तो मराठों को पंजाब में स्थानीय समर्थन नहीं मिला।
यदि रघुनाथराव ने 1758-59 में सिख मिसलों के साथ एक औपचारिक सैन्य और राजनीतिक गठबंधन बनाया होता, तो पानीपत का युद्ध बहुत अलग परिणाम वाला हो सकता था। सिख योद्धा, जो अफगान सेनाओं से लड़ने में अनुभवी थे, मराठा सेना को स्थानीय भूगोल की जानकारी, आपूर्ति लाइनें और गुरिल्ला युद्ध में सहायता प्रदान कर सकते थे। लेकिन रघुनाथराव की दृष्टि विजय तक सीमित थी, स्थायी एकीकरण तक नहीं। यह उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी जिसके परिणाम 1761 में दिखाई दिए।
प्रश्न 2: क्या नारायणराव की हत्या (1773) वास्तव में रघुनाथराव का षड्यंत्र था, या यह एक दुर्घटनावश हुई घटना थी जिसका बाद में राजनीतिक लाभ उठाया गया? ऐतिहासिक साक्ष्य क्या कहते हैं?
उत्तर: नारायणराव पेशवा की हत्या (30 अगस्त 1773) मराठा इतिहास का सबसे विवादास्पद और अनसुलझा रहस्य है। इंटरनेट पर अधिकांश सामग्री केवल सतही विवरण देती है, लेकिन प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों का गहन अध्ययन एक बहुत अधिक जटिल चित्र प्रस्तुत करता है।
पेशवा दफ्तर के अभिलेखों (Maharashtra State Archives) और समकालीन पत्र-व्यवहार के अनुसार, उस रात तीन महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं: (1) रघुनाथराव की पत्नी आनंदीबाई ने गर्दी (मराठा सैनिकों का एक समूह) को बुलाया, (2) एक संदेश दिया गया जिसमें मराठी शब्द “धरा” (पकड़ो) या “मारा” (मारो) था, और (3) गर्दी ने नारायणराव को हत्या कर दी।
विवाद इस बात पर है कि मूल आदेश क्या था। कुछ ऐतिहासिक विवरण, विशेष रूप से “भौसलेयांची बखर” (Bhauslyanchi Bakhar), दावा करते हैं कि आनंदीबाई ने “नारायणराव ला धरा” (नारायणराव को पकड़ो) कहा था, लेकिन एक सैनिक ने जानबूझकर या गलती से इसे “नारायणराव ला मारा” (नारायणराव को मारो) समझा या बदल दिया। दूसरे विवरण, जैसे नाना फड़नवीस की चिट्ठियां, स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हत्या पूर्व-नियोजित थी।
तीसरा और सबसे विश्वसनीय दृष्टिकोण — जो ब्रिटिश रेजीडेंट के समकालीन पत्रों में मिलता है — यह है कि आनंदीबाई ने वास्तव में नारायणराव को “बंदी बनाने” का आदेश दिया था ताकि रघुनाथराव को पेशवा घोषित किया जा सके। लेकिन गर्दी के सैनिक, जो मुख्यतः उत्तरी भारत के भाड़े के सैनिक थे और मराठी भाषा से पूरी तरह परिचित नहीं थे, ने “धरा” और “मारा” के बीच भ्रम के कारण या जानबूझकर हत्या कर दी।
रघुनाथराव की भूमिका अत्यंत विवादास्पद है। कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है कि उन्होंने हत्या का आदेश दिया। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि: (1) हत्या उनकी पत्नी के आदेश से हुई, (2) घटना उनके घर में हुई, और (3) हत्या के तुरंत बाद रघुनाथराव ने पेशवा पद लेने का प्रयास किया। यदि यह वास्तव में एक दुर्घटना थी, तो रघुनाथराव को तुरंत जांच कराने और दोषियों को दंडित करने की नैतिक जिम्मेदारी थी — लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
निष्कर्ष: संभवतः आनंदीबाई और रघुनाथराव की योजना नारायणराव को बंदी बनाने की थी, लेकिन परिस्थितियों और संचार विफलता ने इसे हत्या में बदल दिया। रघुनाथराव ने प्रत्यक्ष रूप से हत्या का आदेश नहीं दिया, लेकिन वे उस षड्यंत्र का हिस्सा थे जिसने हत्या को संभव बनाया। यह नैतिक रूप से उन्हें उतना ही दोषी बनाता है।
प्रश्न 3: यदि Raghunathrao Peshwa ने 1775 में ब्रिटिशों के बजाय फ्रांसीसियों या मराठा सरदारों से सहायता मांगी होती, तो क्या उनके सफल होने की संभावना अधिक होती? उस समय की भू-राजनीति इस प्रश्न का उत्तर कैसे देती है?
उत्तर: यह एक अत्यंत दिलचस्प “वैकल्पिक इतिहास” प्रश्न है जो इंटरनेट पर कहीं विस्तार से नहीं मिलता, लेकिन यह 1770 के दशक की भारतीय भू-राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
विकल्प 1: फ्रांसीसियों से सहायता 1770 के दशक में फ्रांसीसी भारत में एक पराजित शक्ति थे। 1760-61 के तृतीय कर्नाटक युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को निर्णायक रूप से पराजित किया था। पांडिचेरी पर ब्रिटिश नियंत्रण था और फ्रांसीसी उपस्थिति केवल कुछ छोटे व्यापारिक केंद्रों तक सीमित थी। इसके अलावा, फ्रांस यूरोप में अपनी समस्याओं — विशेष रूप से सात वर्षीय युद्ध (1756-63) के बाद की आर्थिक कठिनाइयों — से जूझ रहा था। फ्रांसीसी सरकार के पास न तो भारत में बड़ी सेना भेजने की क्षमता थी और न ही इच्छा।
यदि रघुनाथराव ने फ्रांसीसियों से संपर्क किया होता, तो संभवतः वे सीमित सैन्य सलाहकार और कुछ तोपखाना प्रदान कर सकते थे, लेकिन ब्रिटिशों जैसी विशाल सेना नहीं। इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश इस गठबंधन को तुरंत चुनौती देते और फ्रांसीसियों को भारत से पूरी तरह बाहर करने का प्रयास करते। यह रघुनाथराव के लिए और अधिक जटिल स्थिति होती।
विकल्प 2: मराठा सरदारों से सहायता रघुनाथराव के पास होल्कर, सिंधिया, गायकवाड़ या भोंसले परिवारों से समर्थन मांगने का विकल्प था। होल्कर विशेष रूप से एक संभावित सहयोगी थे क्योंकि उनका बारभाई परिषद से तनाव था। लेकिन यहां समस्या यह थी कि रघुनाथराव को उत्तराधिकार विवाद में “अवैध” माना जा रहा था क्योंकि नारायणराव की हत्या में उनकी संलिप्तता स्पष्ट थी। कोई भी प्रमुख मराठा सरदार खुलेआम एक “हत्यारे” का समर्थन करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था।
इसके अलावा, मराठा सरदार स्वयं विकेंद्रीकृत और प्रतिद्वंद्वी थे। सिंधिया पुणे के पेशवा के प्रति वफादार थे, भोंसले स्वतंत्र थे, और गायकवाड़ गुजरात में अपनी समस्याओं से जूझ रहे थे। एक एकीकृत मराठा गठबंधन रघुनाथराव के पक्ष में बनना लगभग असंभव था।
सबसे व्यावहारिक विकल्प क्या था? ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, रघुनाथराव का सबसे व्यावहारिक विकल्प होता: बारभाई परिषद के साथ समझौता करना और सवाई माधवराव के संरक्षक के रूप में एक सम्मानजनक भूमिका स्वीकार करना। यदि उन्होंने नम्रता दिखाई होती और नाना फड़नवीस के साथ राजनीतिक समझौता किया होता, तो वे पेशवा पद तो नहीं, लेकिन प्रभावशाली सैन्य कमांडर और परामर्शदाता बन सकते थे। लेकिन रघुनाथराव का व्यक्तित्व — अहंकार, अधीरता और समझौते की अक्षमता — ने इस विकल्प को असंभव बना दिया।
निष्कर्ष: ब्रिटिशों के अलावा कोई अन्य विकल्प रघुनाथराव को सफलता नहीं दिला सकता था क्योंकि उनकी मूल समस्या सैन्य शक्ति की कमी नहीं, बल्कि राजनीतिक वैधता की कमी थी। नारायणराव की हत्या ने उन्हें मराठा समाज में अस्वीकार्य बना दिया था। ब्रिटिश गठबंधन भी असफल रहा, लेकिन यह उनका “अंतिम विकल्प” था, न कि सर्वोत्तम विकल्प।
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⚖️ Raghunathrao Peshwa और मराठा इतिहास का सबसे विवादास्पद व्यक्तित्व
यह लेख पेशवा काल, मराठा आंतरिक राजनीति और ब्रिटिश औपनिवेशिक हस्तक्षेप पर
आधारित हमारी शोध-श्रृंखला का हिस्सा है।
Raghunathrao Peshwa (राघोबा) के सैन्य अभियान, नारायणराव हत्याकांड, सूरत की संधि 1775,
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध और मराठा-ब्रिटिश संबंधों की जटिलताओं को गहराई से समझने के लिए
नीचे दिए गए आंतरिक और विश्वसनीय बाहरी स्रोत देखें।
HistoryVerse7 — प्रामाणिक शोध • भूला हुआ इतिहास • सत्य की खोज
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