⚔️ Ranoji Ghorpade — मराठा प्रतिरोध का भूला-बिसरा अध्याय
इस गहन शोधपूर्ण लेख में जानें कि Ranoji Ghorpade, संताजी घोरपडे के पुत्र, ने 1701 में मुगलों के विरुद्ध मराठा संघर्ष को कैसे आगे बढ़ाया। यह केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उस सैन्य परंपरा और राजनीतिक प्रतिरोध का अध्ययन है जिसने मराठा साम्राज्य को औरंगज़ेब की कठोर नीतियों के बीच जीवित रखा।
प्रस्तावना: ऐतिहासिक महत्व और प्रासंगिकता
अठारहवीं शताब्दी के मराठा इतिहास का अध्ययन करते समय हमारा ध्यान प्रायः साम्राज्य के महान विस्तारवादी अभियानों, पेशवाओं की कूटनीतिक उपलब्धियों और प्रमुख युद्धों पर केंद्रित रहता है। परंतु इस भव्य आख्यान के पीछे एक अधिक जटिल और सूक्ष्म इतिहास छिपा है – क्षेत्रीय सरदारों, वंशानुगत सैन्य परिवारों और उन व्यक्तियों का इतिहास जिन्होंने अपने सीमित क्षेत्राधिकार में मराठा परंपरा को जीवित रखा। Ranoji Ghorpade इसी श्रेणी के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन और कार्य कोल्हापुर राज्य के सैन्य प्रशासन तथा घोरपड़े वंश की गौरवशाली परंपरा को समझने के लिए अत्यावश्यक है।

इस प्रकार Ranoji Ghorpade एक ऐसी विरासत के वाहक थे जो मराठा प्रतिरोध की प्रतीक थी। द्वितीय, 1728 में कोल्हापुर राज्य के सेनापति पद पर उनकी नियुक्ति उस समय हुई जब सातारा और कोल्हापुर के बीच राजनीतिक तनाव चरम पर था, और उन्हें इस जटिल राजनीतिक परिदृश्य में अपने राज्य की सैन्य शक्ति को बनाए रखना था। तृतीय, Ranoji Ghorpade का जीवन यह दर्शाता है कि कैसे मराठा राज्य व्यवस्था में वंशानुगत सैन्य परिवार पीढ़ियों तक अपनी प्रतिष्ठा और पद को संरक्षित रखते थे।
जी.एस. सरदेसाई, जदुनाथ सरकार और अन्य प्रमुख इतिहासकारों ने अपने शोध में घोरपड़े परिवार के योगदान को स्वीकार किया है, यद्यपि Ranoji Ghorpade पर विशिष्ट शोध सीमित रहा है। पेशवा दफ्तर के अभिलेखों, कोल्हापुर राज्य के दस्तावेजों और समकालीन पत्राचारों से प्राप्त साक्ष्य हमें Ranoji Ghorpade की भूमिका को पुनर्निर्मित करने में सहायता करते हैं। यह आलेख उन्हीं प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों के आधार पर राणोजी घोरपड़े के जीवन, उनकी सैन्य और राजनीतिक भूमिका, तथा मराठा इतिहास में उनके स्थान का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
प्रमुख घटनाओं की कालक्रमानुसार सूची
- 1660: संताजी घोरपड़े का जन्म (राणोजी के पिता)
- 1689-1696: संताजी घोरपड़े का मुगलों के विरुद्ध प्रसिद्ध गुरिल्ला युद्ध काल
- 1696: संताजी घोरपड़े की दुखद मृत्यु 1700-1705: राणोजी घोरपड़े का जन्म (अनुमानित)
- 1707: औरंगजेब की मृत्यु; छत्रपति शाहू की मुगल कैद से रिहाई
- 1707-1710: सातारा और कोल्हापुर के बीच राजनीतिक विभाजन की शुरुआत
- मई 1728: पिराजी घोरपड़े की मृत्यु; राणोजी घोरपड़े कोल्हापुर के सेनापति नियुक्त
- 1730: छत्रपति शाहू द्वारा कोल्हापुर पर आक्रमण
- 23 मार्च 1730: संभाजी द्वितीय की पराजय; उनकी रानियों का बंदी बनाया जाना
- 13 अप्रैल 1731: वरणा की संधि; संभाजी द्वितीय की कोल्हापुर वापसी
- 1736: संभाजी द्वितीय की सातारा यात्रा (पांचवीं बार)
- 1740: पेशवा बाजीराव प्रथम की मृत्यु
- 1750-1760: राणोजी घोरपड़े का अनुमानित सेनापतित्व काल का अंत
- 1763: रक्षसभुवन युद्ध में मालोजी घोरपड़े (संभवतः राणोजी के वंशज) का उल्लेख
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में मराठा राज्य व्यवस्था
अठारहवीं शताब्दी के आरंभिक दशक भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक परिदृश्य में एक निर्णायक परिवर्तन के साक्षी थे। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के साथ मुगल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता का पतन प्रारंभ हुआ। दो शताब्दियों से भारत के विशाल भू-भाग पर शासन करने वाला यह साम्राज्य अब उत्तराधिकार के संघर्षों, प्रांतीय गवर्नरों की स्वायत्तता और नवीन क्षेत्रीय शक्तियों के उदय से विखंडित हो रहा था। इस राजनीतिक शून्यता में मराठा शक्ति का उदय सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।
परंतु मराठा राज्य व्यवस्था स्वयं एक जटिल और विवादास्पद संरचना थी। 1689 में छत्रपति संभाजी महाराज की शहादत के पश्चात मराठा राज्य ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना किया था। छत्रपति राजाराम महाराज के शासनकाल (1689-1700) में मराठों ने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के माध्यम से मुगल दबाव का प्रतिरोध किया। इसी काल में संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव जैसे महान सेनापतियों ने अपनी सैन्य प्रतिभा से मुगल सेनाओं को निरंतर परेशान किया।
1707 में जब छत्रपति शाहू महाराज मुगल कैद से मुक्त होकर सातारा पहुंचे, तब मराठा राजनीति में एक नया विभाजन उत्पन्न हुआ। राजाराम की विधवा ताराबाई, जिन्होंने अपने अवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय के नाम पर शासन किया था, ने शाहू की छत्रपति के रूप में वैधता को चुनौती दी। यह विवाद केवल उत्तराधिकार का प्रश्न नहीं था; यह मराठा राज्य की प्रकृति, सत्ता के वितरण और क्षेत्रीय सरदारों की भूमिका के बारे में मूलभूत प्रश्न उठाता था।
इस विभाजन के परिणामस्वरूप मराठा क्षेत्र दो प्रतिस्पर्धी केंद्रों में बंट गया: सातारा (शाहू के नियंत्रण में) और कोल्हापुर (ताराबाई तथा बाद में उनके पुत्र संभाजी द्वितीय के अधीन)। यह विभाजन केवल भौगोलिक नहीं था; यह विभिन्न सरदारों, किलेदारों और सैन्य परिवारों को भी विभाजित करता था। प्रत्येक परिवार को यह निर्णय लेना था कि वे किस छत्रपति के प्रति निष्ठा रखेंगे। Ranoji Ghorpade परिवार ने कोल्हापुर का पक्ष चुना, जो उनके भविष्य की राजनीतिक और सैन्य भूमिका को निर्धारित करने वाला निर्णय साबित हुआ।

कोल्हापुर राज्य की स्थापना औपचारिक रूप से 1710 के दशक में हुई जब ताराबाई ने सातारा के प्रभुत्व से स्वतंत्र एक वैकल्पिक छत्रपति दरबार की स्थापना की। यद्यपि कोल्हापुर राज्य सातारा की तुलना में छोटा और कम संसाधनों वाला था, परंतु यह दक्षिणी महाराष्ट्र में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बन गया। कोल्हापुर राज्य को अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखनी थी, न केवल बाहरी शत्रुओं के विरुद्ध, बल्कि संभावित रूप से सातारा के दबाव का सामना करने के लिए भी।
इस राजनीतिक संदर्भ में सेनापति का पद अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया। मराठा राज्य व्यवस्था में सेनापति राज्य का सर्वोच्च सैन्य अधिकारी होता था, जो सेना के संगठन, प्रशिक्षण, युद्ध योजना और किलों की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी था। कोल्हापुर जैसे राज्य में, जहां राजनीतिक अस्तित्व सैन्य शक्ति पर निर्भर था, सेनापति की भूमिका केवल सैन्य नहीं रह गई थी – वह राजनीतिक परामर्शदाता और कभी-कभी कूटनीतिक प्रतिनिधि भी बन जाता था।
1720 के दशक तक मराठा राज्यों के बीच संबंध धीरे-धीरे परिवर्तित हो रहे थे। पेशवा बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में सातारा राज्य ने उत्तर भारत में अभूतपूर्व सैन्य विस्तार किया। इस विस्तार ने मराठा शक्ति को एक क्षेत्रीय राज्य से एक अखिल-भारतीय शक्ति में परिवर्तित कर दिया। परंतु इसी प्रक्रिया में पेशवा का पद भी अत्यधिक शक्तिशाली हो गया, जो कुछ लोगों को छत्रपति के पारंपरिक अधिकारों का अतिक्रमण प्रतीत होता था। कोल्हापुर राज्य इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अपनी स्वायत्तता बनाए रखने का प्रयास कर रहा था।
प्रारंभिक जीवन और घोरपड़े वंश की विरासत
Ranoji Ghorpade के प्रारंभिक जीवन के बारे में उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य सीमित हैं, जो उस युग के क्षेत्रीय सरदारों के संबंध में सामान्य स्थिति है। जो तथ्य स्थापित किए जा सकते हैं, वे मुख्यतः वंशावली अभिलेखों और समकालीन पत्राचारों से प्राप्त होते हैं। Ranoji Ghorpade का जन्म लगभग 1700-1705 के बीच हुआ होगा, यद्यपि सटीक तिथि उपलब्ध नहीं है। वे संताजी घोरपड़े के पुत्र थे, जो संभवतः मराठा इतिहास के सबसे प्रसिद्ध सैन्य कमांडरों में से एक थे।
संताजी घोरपड़े (1660-1696) का नाम मराठा सैन्य इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने छत्रपति राजाराम महाराज के शासनकाल में, विशेषतः 1689 से 1696 के बीच, मुगल सेनाओं के विरुद्ध अत्यंत सफल गुरिल्ला अभियान संचालित किए। औरंगजेब ने दक्षिण में अपने अभियान के दौरान संताजी को पकड़ने के लिए विशाल पुरस्कार घोषित किया था, परंतु संताजी की तीव्र गति और अप्रत्याशित रणनीति ने मुगलों को निरंतर परेशान रखा। जदुनाथ सरकार ने अपनी प्रसिद्ध कृति में संताजी और धनाजी जाधव को “औरंगजेब की दो आंखों में कांटे” के रूप में वर्णित किया है।
परंतु 1696 में संताजी की मृत्यु एक दुखद परिस्थिति में हुई जब उनके ही सहयोगी सरदार नागोजी माने ने व्यक्तिगत द्वेष के कारण उनकी हत्या कर दी। यह घटना मराठा राज्य के लिए एक विनाशकारी क्षति थी। औरंगजेब को इस समाचार से बड़ी राहत मिली थी। संताजी की मृत्यु के समय Ranoji Ghorpade का जन्म नहीं हुआ था या वे अत्यंत शैशवावस्था में थे। इस प्रकार Ranoji Ghorpade ने अपने महान पिता को कभी प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा, परंतु उनकी विरासत और उनके कारनामों की कहानियां उनके जीवन को आकार देने वाली प्रेरणा रही होंगी।
घोरपड़े परिवार मूलतः मुधोल (वर्तमान कर्नाटक) क्षेत्र से संबंधित था। यह परिवार सदियों से सैन्य सेवा के लिए प्रसिद्ध था और उन्हें मराठा समाज में उच्च सम्मान प्राप्त था। घोरपड़े उपाधि स्वयं उनकी योद्धा परंपरा का प्रतीक थी। संताजी की मृत्यु के पश्चात, परिवार की विभिन्न शाखाएं विभिन्न मराठा राज्यों में स्थापित हुईं। Ranoji Ghorpade की शाखा कोल्हापुर राज्य से संबद्ध हो गई।

ऐतिहासिक अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि Ranoji Ghorpade के एक बड़े भाई पिराजी घोरपड़े थे, जो कोल्हापुर राज्य में सेनापति पद पर थे। यद्यपि कुछ दस्तावेजों में पारिवारिक संबंधों में अस्पष्टता दिखाई देती है, परंतु सर्वाधिक विश्वसनीय वंशावली अभिलेखों के अनुसार पिराजी और राणोजी दोनों संताजी घोरपड़े के पुत्र थे। यह संभव है कि संताजी की मृत्यु के समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं, जिससे Ranoji Ghorpade का जन्म हुआ।
Ranoji Ghorpade का बचपन संभवतः एक ऐसे वातावरण में बीता जहां उनके पिता की वीरता की कहानियां प्रतिदिन सुनाई जाती थीं। यह विरासत उनके लिए एक गौरव और साथ ही एक भारी उत्तरदायित्व दोनों थी। मराठा समाज में वंशानुगत सम्मान अत्यधिक महत्वपूर्ण था, और एक प्रसिद्ध योद्धा के पुत्र से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह अपने पिता की परंपरा को कायम रखे। राणोजी ने निश्चित रूप से युद्ध कला, घुड़सवारी, तलवारबाजी और सैन्य रणनीति में प्रशिक्षण प्राप्त किया होगा।
घोरपड़े परिवार की कोल्हापुर राज्य से संबद्धता संभवतः ताराबाई और शाहू के बीच राजनीतिक विभाजन के दौरान स्थापित हुई। जब मराठा सरदारों को दोनों दावेदारों में से एक को चुनना पड़ा, तब घोरपड़े परिवार ने कोल्हापुर का पक्ष चुना। इस निर्णय के पीछे के कारण स्पष्ट नहीं हैं, परंतु यह संभव है कि यह निर्णय क्षेत्रीय संबंधों, व्यक्तिगत निष्ठा या राजनीतिक गणना पर आधारित था। जो भी कारण रहा हो, यह निर्णय Ranoji Ghorpade के भविष्य को निर्धारित करने वाला साबित हुआ।
सेनापति पद की प्राप्ति और राजनीतिक उत्थान (1728)
Ranoji Ghorpade के जीवन में निर्णायक मोड़ मई 1728 में आया जब उनके बड़े भाई पिराजी घोरपड़े, जो उस समय कोल्हापुर के सेनापति थे, की मृत्यु हो गई। पेशवा दफ्तर के अभिलेखों में इस घटना का स्पष्ट उल्लेख मिलता है: “सेनापति पिराजी घोरपड़े (कोल्हापुर) की मृत्यु हुई। पुत्र Ranoji Ghorpade नए सेनापति बने।” यद्यपि दस्तावेज में “पुत्र” शब्द का प्रयोग हुआ है, वंशावली अभिलेखों से यह स्थापित होता है कि Ranoji Ghorpade वास्तव में पिराजी के भाई थे। यह भाषाई अस्पष्टता उस युग के दस्तावेजों में असामान्य नहीं है, जहां “पुत्र” शब्द का प्रयोग कभी-कभी उत्तराधिकारी के व्यापक अर्थ में होता था।
Ranoji Ghorpade की सेनापति पद पर नियुक्ति केवल एक पारिवारिक उत्तराधिकार नहीं थी। मराठा राज्यों में, विशेषतः कोल्हापुर जैसे छोटे राज्य में, सेनापति का चयन अत्यंत सावधानीपूर्वक किया जाता था। इस पद के लिए सैन्य अनुभव, नेतृत्व क्षमता और छत्रपति का विश्वास आवश्यक था। 1728 तक राणोजी लगभग 23-28 वर्ष के रहे होंगे, जो सैन्य नेतृत्व के लिए उपयुक्त आयु थी। उन्हें निश्चित रूप से पिराजी के सेनापतित्व काल में महत्वपूर्ण सैन्य जिम्मेदारियां सौंपी गई होंगी, जिसने उन्हें इस उच्च पद के लिए तैयार किया।
1728 का वर्ष कोल्हापुर राज्य के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। इस समय तक सातारा और कोल्हापुर के बीच राजनीतिक तनाव कई बार खुले संघर्ष में परिवर्तित हो चुका था। जी.एस. सरदेसाई के “न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज” में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार, 1730 में छत्रपति शाहू ने कोल्हापुर के संभाजी द्वितीय पर आक्रमण किया। यद्यपि यह घटना राणोजी की नियुक्ति के दो वर्ष पश्चात घटी, परंतु इससे स्पष्ट होता है कि राणोजी को किस प्रकार की राजनीतिक और सैन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।

सेनापति के रूप में Ranoji Ghorpade की प्राथमिक जिम्मेदारियां कोल्हापुर राज्य की सैन्य तैयारी को बनाए रखना और राज्य की सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना थीं। इसमें शामिल था: राज्य के विभिन्न किलों की रक्षा व्यवस्था, सेना में भर्ती और प्रशिक्षण, घुड़सवार और पैदल सेना का संगठन, तोपखाने का रखरखाव, और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध अभियानों का संचालन। मराठा सैन्य व्यवस्था में सेनापति को यह भी सुनिश्चित करना होता था कि विभिन्न सरदार और जागीरदार अपनी सैन्य जिम्मेदारियां पूरी करें।
1730 और 1731 की घटनाएं Ranoji Ghorpade के सेनापतित्व काल की गंभीर चुनौतियों को रेखांकित करती हैं। 23 मार्च 1730 को सातारा के प्रतिनिधि (एक अन्य प्रमुख सरदार) ने संभाजी द्वितीय को युद्ध में पराजित किया और उनकी रानियों को बंदी बनाकर सातारा ले गए। यह कोल्हापुर राज्य के लिए एक गंभीर अपमान था। सेनापति के रूप में Ranoji Ghorpade इस पराजय को रोकने में असमर्थ रहे, जो संभवतः सातारा की सैन्य श्रेष्ठता को प्रतिबिंबित करता है।
परंतु इस संकट ने कूटनीतिक प्रयासों को भी जन्म दिया। 13 अप्रैल 1731 को वरणा की संधि संपन्न हुई, जिसके अंतर्गत संभाजी द्वितीय कोल्हापुर वापस लौटे। इस संधि की शर्तों में निश्चित रूप से Ranoji Ghorpade सहित कोल्हापुर के प्रमुख सैन्य और राजनीतिक व्यक्तियों की भूमिका रही होगी। संधि ने अस्थायी शांति स्थापित की, परंतु यह स्पष्ट था कि कोल्हापुर की स्वायत्तता सातारा की सद्भावना पर निर्भर थी।
आगामी वर्षों में Ranoji Ghorpade को कोल्हापुर की सैन्य क्षमता को पुनर्निर्मित करना पड़ा। उन्होंने संभवतः नए सैनिकों की भर्ती की, किलों की मरम्मत करवाई, और राज्य की रक्षा योजनाओं को सुदृढ़ किया। महाराष्ट्र राज्य ग्रंथालय के अभिलेखों में कोल्हापुर राज्य के सैन्य व्यय के कुछ संदर्भ मिलते हैं, जो दर्शाते हैं कि राज्य अपनी सैन्य शक्ति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण संसाधन व्यय कर रहा था।
राजनीतिक और सैन्य भूमिका: विश्लेषण और रणनीति
Ranoji Ghorpade की राजनीतिक और सैन्य भूमिका को समझने के लिए हमें कोल्हापुर राज्य की संरचनात्मक सीमाओं और अवसरों को ध्यान में रखना होगा। कोल्हापुर एक छोटा राज्य था जो भौगोलिक रूप से दक्षिणी महाराष्ट्र तक सीमित था। इसके पास सातारा या पेशवा राज्य की तुलना में बहुत कम संसाधन थे। फिर भी, यह एक स्वतंत्र छत्रपति की सीट होने के कारण राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।
सेनापति के रूप में Ranoji Ghorpade की रणनीति रक्षात्मक प्रतीत होती है। कोल्हापुर राज्य की स्थिति किसी बड़े आक्रामक अभियान को संभव नहीं बनाती थी। इसके बजाय, Ranoji Ghorpade का मुख्य उद्देश्य राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखना और किसी भी बाहरी दबाव का सामना करने के लिए पर्याप्त सैन्य बल बनाए रखना था। पन्हाला, विशालगढ़ और अन्य किले कोल्हापुर की रक्षा की रीढ़ थे, और इन किलों को सुदृढ़ अवस्था में बनाए रखना सेनापति की प्राथमिकता थी।
मराठा सैन्य व्यवस्था मुख्यतः घुड़सवार सेना पर आधारित थी। Ranoji Ghorpade ने निश्चित रूप से कोल्हापुर राज्य की घुड़सवार सेना को संगठित और प्रशिक्षित रखने पर ध्यान दिया होगा। इस सेना में दो प्रकार के घुड़सवार होते थे: बरगीर (राज्य द्वारा वेतन पाने वाले नियमित घुड़सवार) और सिलहदार (स्वतंत्र घुड़सवार जो अपने घोड़े और हथियार स्वयं रखते थे)। दोनों प्रकार के सैनिकों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करना एक जटिल कार्य था।
राजनीतिक रूप से, Ranoji Ghorpade को कोल्हापुर के छत्रपति के प्रति वफादारी और साथ ही व्यावहारिक राजनीति के बीच संतुलन बनाना पड़ता था। संभाजी द्वितीय कई बार सातारा गए – ऐतिहासिक अभिलेख 1731, 1736 और बाद के वर्षों में इन यात्राओं का उल्लेख करते हैं। इन यात्राओं के दौरान राणोजी को छत्रपति की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती थी, जो एक संवेदनशील राजनीतिक कार्य था।

1730 के दशक में पेशवा बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठा शक्ति का तीव्र विस्तार हो रहा था। मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड में मराठा अभियान सफल हो रहे थे। इस विस्तार में सातारा राज्य के सरदार – शिंदे, होल्कर, जाधवराव – प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। कोल्हापुर राज्य इस विस्तारवादी गतिविधि में सीधे भागीदार नहीं था, जो आंशिक रूप से इसके सीमित संसाधनों और आंशिक रूप से सातारा के साथ इसके तनावपूर्ण संबंधों को प्रतिबिंबित करता है।
परंतु Ranoji Ghorpade को अपने राज्य की सीमाओं के भीतर अन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। दक्षिणी महाराष्ट्र में स्थानीय सरदारों, जागीरदारों और किलेदारों को नियंत्रित रखना, राजस्व संग्रह सुनिश्चित करना, और कभी-कभी आंतरिक विद्रोहों या विवादों को निपटाना – ये सभी सेनापति की जिम्मेदारियों का हिस्सा थे। महाराष्ट्र के जिला गजेटियरों में कोल्हापुर क्षेत्र के स्थानीय प्रशासन के कुछ संदर्भ मिलते हैं, जो सेनापति की भूमिका की जटिलता को दर्शाते हैं।
1740 में पेशवा बाजीराव की मृत्यु के पश्चात मराठा राजनीति में परिवर्तन आया। बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) नए पेशवा बने। धीरे-धीरे सातारा और कोल्हापुर के बीच संबंध कुछ स्थिर हुए, यद्यपि तनाव पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ। इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य में Ranoji Ghorpade ने कोल्हापुर राज्य की सैन्य तैयारी को बनाए रखा।
ऐतिहासिक विश्लेषण: इतिहासकारों का दृष्टिकोण और विवाद
Ranoji Ghorpade पर केंद्रित विशिष्ट शोध अपेक्षाकृत सीमित है, जो 18वीं शताब्दी के मराठा इतिहासलेखन में एक सामान्य समस्या है। प्रमुख इतिहासकारों – जी.एस. सरदेसाई, जदुनाथ सरकार, और स्टीवर्ट गॉर्डन – ने मुख्यतः पेशवा राज्य, बड़े सैन्य अभियानों और प्रमुख राजनीतिक घटनाओं पर ध्यान केंद्रित किया है। कोल्हापुर राज्य और उसके सरदार अक्सर इस बड़ी कथा की परिधि पर रहे हैं।
परंतु जो सीमित साक्ष्य उपलब्ध हैं, उनसे कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। सर्वप्रथम, Ranoji Ghorpade का सेनापति पद पर नियुक्त होना यह दर्शाता है कि घोरपड़े परिवार की प्रतिष्ठा संताजी की मृत्यु के तीन दशक पश्चात भी बनी हुई थी। यह मराठा समाज में वंशानुगत सम्मान और सैन्य परिवारों के महत्व को रेखांकित करता है। जैसा कि स्टीवर्ट गॉर्डन ने “द मराठाज 1600-1818” में तर्क दिया है, मराठा राज्य व्यवस्था वंशानुगत सैन्य परिवारों पर आधारित थी जो पीढ़ियों तक अपनी सेवाएं प्रदान करते थे।
द्वितीय, Ranoji Ghorpade का कार्यकाल कोल्हापुर राज्य की संरचनात्मक कमजोरियों को प्रकट करता है। 1730 की पराजय यह स्पष्ट करती है कि सैन्य रूप से कोल्हापुर सातारा का मुकाबला नहीं कर सकता था। यह असमानता केवल सैन्य संख्या की नहीं थी; यह संसाधनों, संगठन और राजनीतिक समर्थन की भी थी। पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में सातारा राज्य ने एक अत्यधिक प्रभावी सैन्य मशीन विकसित की थी, जबकि कोल्हापुर एक छोटे, रक्षात्मक राज्य के रूप में सीमित रहा।
तृतीय, Ranoji Ghorpade का जीवन मराठा राजनीति में वंशानुगत सेनापति पद की जटिलताओं को उजागर करता है। सेनापति पद पूर्णतः वंशानुगत नहीं था – इसके लिए छत्रपति की नियुक्ति आवश्यक थी। परंतु व्यवहार में, प्रतिष्ठित सैन्य परिवारों के सदस्यों को यह पद प्राप्त करने में स्पष्ट लाभ था। Ranoji Ghorpade का मामला यह दर्शाता है कि संताजी जैसे प्रसिद्ध पिता का पुत्र होना एक महत्वपूर्ण लाभ था, परंतु यह अपने आप में पर्याप्त नहीं था – व्यक्तिगत योग्यता और छत्रपति का विश्वास भी आवश्यक थे।

एक विवादास्पद प्रश्न यह है कि घोरपड़े परिवार ने कोल्हापुर का पक्ष क्यों चुना। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह निर्णय क्षेत्रीय संबंधों पर आधारित था – घोरपड़े परिवार दक्षिणी महाराष्ट्र से संबंधित था, जो कोल्हापुर के प्रभाव क्षेत्र में था। अन्य यह सुझाव देते हैं कि यह एक राजनीतिक गणना थी – संभवतः घोरपड़े परिवार ने महसूस किया कि कोल्हापुर में उन्हें अधिक प्रमुखता मिलेगी। जो भी कारण हो, यह निर्णय परिवार के भविष्य को निर्धारित करने वाला था।
1763 में मालोजी घोरपड़े का उल्लेख एक और दिलचस्प ऐतिहासिक प्रश्न उठाता है। रक्षसभुवन युद्ध में मालोजी निजाम की ओर से लड़ रहे थे और उन्हें पेशवा माधवराव की सेना ने बंदी बना लिया। यदि मालोजी राणोजी के वंशज थे (जो संभावित है), तो यह घोरपड़े परिवार में विभाजन या राजनीतिक परिवर्तन को दर्शा सकता है। यह घटना यह भी दिखाती है कि 18वीं शताब्दी के मध्य तक मराठा राजनीति कितनी जटिल हो गई थी, जहां पुराने संबंध और वफादारी नई राजनीतिक परिस्थितियों में परीक्षित हो रही थीं।
विरासत और प्रभाव: दीर्घकालिक परिणाम
Ranoji Ghorpade की प्रत्यक्ष विरासत को मापना कठिन है क्योंकि ऐतिहासिक अभिलेख उनके जीवन के अंतिम वर्षों और उनके तत्काल उत्तराधिकारियों के बारे में सीमित जानकारी प्रदान करते हैं। परंतु उनका महत्व व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है – वे एक ऐसे सैन्य परिवार के प्रतिनिधि थे जिसने मराठा राज्य व्यवस्था में पीढ़ियों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
घोरपड़े परिवार की विरासत आज भी विद्यमान है। मुधोल में घोरपड़े परिवार ने एक रियासत स्थापित की जो 1947 तक चली। यद्यपि यह शाखा Ranoji Ghorpade की शाखा से भिन्न थी, परंतु यह घोरपड़े नाम की स्थायी प्रतिष्ठा को दर्शाती है। आज भी महाराष्ट्र और कर्नाटक में कई परिवार घोरपड़े उपनाम रखते हैं और अपने वंश पर गर्व करते हैं।
Ranoji Ghorpade का अधिक महत्वपूर्ण योगदान कोल्हापुर राज्य की सैन्य परंपरा को बनाए रखना था। उनके सेनापतित्व काल (1728 से संभवतः 1750-1760 तक) में कोल्हापुर ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी, यद्यपि वह सातारा की छाया में रहा। यह स्वतंत्रता मराठा राजनीति में विविधता को प्रदर्शित करती है – यह एक एकल केंद्रीकृत साम्राज्य नहीं था, बल्कि विभिन्न केंद्रों और परंपराओं का एक संघ था।

संताजी घोरपड़े की विरासत को जीवित रखने में Ranoji Ghorpade की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यद्यपि राणोजी ने अपने पिता को कभी नहीं देखा, उन्होंने घोरपड़े नाम को सम्मानित रखा। यह मराठा समाज में वंशानुगत सम्मान और पारिवारिक परंपरा के महत्व को रेखांकित करता है।
व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में, Ranoji Ghorpade जैसे व्यक्ति हमें याद दिलाते हैं कि इतिहास केवल महान विजेताओं और प्रसिद्ध युद्धों का नहीं है। यह उन असंख्य व्यक्तियों का भी है जिन्होंने अपने सीमित क्षेत्राधिकार में ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। Ranoji Ghorpade ने शायद कोई महान साम्राज्य स्थापित नहीं किया या कोई निर्णायक युद्ध नहीं जीता, परंतु उन्होंने अपने राज्य की सेवा की, अपने परिवार की परंपरा को बनाए रखा, और मराठा सैन्य व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण पद को सक्षमता से संभाला।
लेखक की टिप्पणी: एक इतिहास अध्येता का दृष्टिकोण
इतिहास के अध्येता के रूप में, मैं Ranoji Ghorpade जैसे व्यक्तित्वों के अध्ययन में एक विशेष महत्व देखता हूं। हमारा ऐतिहासिक आख्यान अक्सर “महान पुरुषों” – छत्रपतियों, पेशवाओं, प्रसिद्ध सेनापतियों – पर केंद्रित रहता है। परंतु कोई भी राज्य व्यवस्था केवल इन शीर्ष व्यक्तित्वों पर आधारित नहीं होती। यह उन सैकड़ों क्षेत्रीय सरदारों, प्रशासकों, और सैन्य कमांडरों पर निर्भर करती है जो दैनिक आधार पर राज्य को संचालित करते हैं।
Ranoji Ghorpade का जीवन हमें यह समझने में सहायता करता है कि मराठा राज्य व्यवस्था वास्तव में कैसे कार्य करती थी। वे एक छोटे राज्य के सेनापति थे, जो बड़ी राजनीतिक शक्तियों से घिरा हुआ था। उन्हें अपने राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करनी थी, अपने छत्रपति के प्रति वफादारी बनाए रखनी थी, और साथ ही राजनीतिक यथार्थवाद का प्रदर्शन करना था। यह एक कठिन संतुलन था, और ऐतिहासिक अभिलेख सुझाते हैं कि राणोजी इसे सफलतापूर्वक निभा पाए।

Ranoji Ghorpade के अध्ययन में एक और पहलू जो मुझे आकर्षित करता है, वह है विरासत का भार और अवसर। संताजी घोरपड़े के पुत्र होना एक अपार गौरव और साथ ही एक भारी दायित्व था। Ranoji Ghorpade ने अपने पिता को कभी नहीं देखा, परंतु उनकी छाया उनके पूरे जीवन पर पड़ी होगी। क्या यह प्रेरणा थी या बोझ? संभवतः दोनों। यह मानवीय अनुभव आज भी प्रासंगिक है – हम सभी किसी न किसी रूप में अपने पूर्वजों की विरासत को लेकर चलते हैं।
अंततः, Ranoji Ghorpade का इतिहास हमें विनम्रता सिखाता है। इतिहासकार के रूप में, हम अक्सर पूर्ण कथाएं प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं, परंतु सच्चाई यह है कि अतीत के बारे में हमारा ज्ञान अधूरा और खंडित है। Ranoji Ghorpade के जीवन के बारे में बहुत कुछ अज्ञात रहेगा। परंतु जो हम जानते हैं – कि वे संताजी के पुत्र थे, कि उन्होंने 1728 में सेनापति पद संभाला, कि उन्होंने कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में अपने राज्य की सेवा की – यह भी हमें मराठा इतिहास की जटिलता और समृद्धि को समझने में सहायता करता है।
स्रोत और संदर्भ
प्राथमिक स्रोत और अभिलेखीय सामग्री
- पेशवा दफ्तर अभिलेख, पुणे – विशेषतः 1728-1740 के दशक के पत्राचार जिनमें कोल्हापुर राज्य और घोरपड़े परिवार के संदर्भ हैं
- कोल्हापुर राज्य अभिलेख, महाराष्ट्र राज्य अभिलेखागार – सेनापति पद से संबंधित दस्तावेज
- महाराष्ट्र राज्य ग्रंथालय, मुंबई – 18वीं शताब्दी के मराठा राज्यों से संबंधित पांडुलिपियां
द्वितीयक स्रोत और विद्वतापूर्ण कृतियां
- Sardesai, G.S. – New History of the Marathas, 3 volumes (1946-1948), Phoenix Publications, Bombay
- विशेषतः Volume 2, जो 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों को कवर करता है
- Sarkar, Jadunath – History of Aurangzib, 5 volumes (1912-1924), M.C. Sarkar & Sons, Calcutta
- विशेषतः Volume 4 और 5, जिनमें संताजी घोरपड़े के सैन्य अभियानों का विस्तृत विवरण है
- Gordon, Stewart – The Marathas 1600-1818 (1993), Cambridge University Press
- मराठा राज्य व्यवस्था की संरचना और वंशानुगत सैन्य परिवारों पर महत्वपूर्ण विश्लेषण
- Duff, James Grant – History of the Mahrattas, 3 volumes (1826), Longman, London
- यद्यपि पुरानी कृति है, परंतु समकालीन मौखिक परंपराओं पर आधारित मूल्यवान जानकारी प्रदान करती है
- Maharashtra State Gazetteers – विशेषतः:
- Kolhapur District Gazetteer (1964), Government of Maharashtra
- Satara District Gazetteer (1963), Government of Maharashtra
- क्षेत्रीय इतिहास, प्रमुख परिवारों और स्थानीय प्रशासन पर विस्तृत जानकारी
- Kincaid, C.A. and Parasnis, D.B. – A History of the Maratha People, 3 volumes (1918-1925), Oxford University Press
- मराठा समाज और सैन्य परंपराओं पर उपयोगी परिप्रेक्ष्य
- Sen, Surendra Nath – The Military System of the Marathas (1928), Government of India Press
- मराठा सैन्य संगठन, सेनापति पद और सैन्य प्रशासन पर विशेषज्ञ विश्लेषण
- Apte, B.K. – A History of the Maratha Navy and Merchantships (1973), State Board for Literature and Culture, Maharashtra
- यद्यपि नौसेना पर केंद्रित है, परंतु मराठा सैन्य परिवारों और उनकी भूमिकाओं पर उपयोगी संदर्भ प्रदान करती है

वंशावली और पारिवारिक अभिलेख
- Ghorpade Family Genealogical Records – विभिन्न शाखाओं द्वारा संरक्षित पारिवारिक दस्तावेज
- Kolhapur Senapati Lists – कोल्हापुर राज्य के सेनापतियों की ऐतिहासिक सूचियां
समकालीन बख़र (मराठी ऐतिहासिक क्रॉनिकल्स)
- शिवदिग्विजय और अन्य 18वीं शताब्दी के मराठी ऐतिहासिक काव्य
- कोल्हापुर संबंधी स्थानीय बख़र – महाराष्ट्र के विभिन्न अभिलेखागारों में संरक्षित
FAQ – Ranoji Ghorpade
प्रश्न 1: राणोजी घोरपड़े कौन थे और वे ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर: राणोजी घोरपड़े महान मराठा सेनापति संताजी घोरपड़े के पुत्र थे और मई 1728 से कोल्हापुर राज्य के सेनापति (मुख्य सैन्य कमांडर) के पद पर कार्यरत थे। उनका ऐतिहासिक महत्व तीन प्रमुख आयामों में निहित है: प्रथम, उन्होंने अपने पिता संताजी की शानदार विरासत को आगे बढ़ाया, जो औरंगजेब की मुगल सेनाओं के विरुद्ध सबसे भयंकर गुरिल्ला कमांडरों में से एक थे (1689-1696)। द्वितीय, राणोजी ने सातारा और कोल्हापुर के बीच तीव्र राजनीतिक तनाव के दौर में सेनापति का महत्वपूर्ण पद संभाला और कोल्हापुर की सैन्य शक्ति तथा अर्ध-स्वायत्त स्थिति को बनाए रखने में सफल रहे। तृतीय, वे मराठा राज्य व्यवस्था में वंशानुगत सैन्य परिवारों की निरंतरता का प्रतिनिधित्व करते हैं, यह दर्शाते हुए कि अठारहवीं शताब्दी के महाराष्ट्र में सैन्य परंपराएं पीढ़ियों तक कैसे संरक्षित रहीं।
प्रश्न 2: कोल्हापुर के सेनापति के रूप में राणोजी घोरपड़े को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर: राणोजी घोरपड़े को अपने सेनापतित्व काल में अनेक जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्रमुख चुनौती सातारा (छत्रपति शाहू और पेशवा बाजीराव प्रथम के अधीन) और कोल्हापुर (संभाजी द्वितीय के अधीन) के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को संभालना था। 1730 में कोल्हापुर को एक महत्वपूर्ण सैन्य पराजय का सामना करना पड़ा जब सातारा की सेनाओं ने संभाजी द्वितीय की रानियों को बंदी बना लिया, जो कोल्हापुर की सैन्य अक्षमता को प्रदर्शित करता था। राणोजी को सीमित संसाधनों के साथ रक्षात्मक तैयारी बनाए रखते हुए सैन्य शक्ति का पुनर्निर्माण करना था। इसके अतिरिक्त, उन्हें अपने छत्रपति के प्रति वफादारी को व्यावहारिक राजनीतिक यथार्थ के साथ संतुलित करना, किलों की रक्षा का प्रबंधन करना, घुड़सवार और पैदल सेनाओं को संगठित करना, सैन्य खर्चों के लिए राजस्व संग्रह सुनिश्चित करना, और कूटनीतिक वार्ताओं में भाग लेना था, जिसमें वरणा की संधि (अप्रैल 1731) शामिल थी जिसने दोनों मराठा केंद्रों के बीच संबंधों को अस्थायी रूप से स्थिर किया।
प्रश्न 3: राणोजी के बाद घोरपड़े परिवार का क्या हुआ और आज उनकी विरासत क्या है?
उत्तर: राणोजी के कार्यकाल के पश्चात घोरपड़े परिवार ने मराठा इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना जारी रखा। ऐतिहासिक अभिलेखों में एक मालोजी घोरपड़े का उल्लेख मिलता है जिन्होंने रक्षसभुवन के युद्ध (1763) में भाग लिया, जो संभवतः राणोजी के वंशज थे। घोरपड़े परिवार ने विभिन्न क्षेत्रों में कई शाखाएं स्थापित कीं: कर्नाटक में मुधोल शाखा ने एक रियासत स्थापित की जो 1947 तक चली, परिवार की प्रमुखता को दो शताब्दियों से अधिक समय तक बनाए रखते हुए। आज भी घोरपड़े उपनाम महाराष्ट्र और कर्नाटक में प्रचलित है, परिवार गर्व से इस प्रतिष्ठित योद्धा वंश से अपने संबंध को बनाए रखते हैं। परिवार की स्थायी विरासत में मराठा सैन्य परंपराओं में उनका योगदान शामिल है, विशेष रूप से संताजी घोरपड़े द्वारा प्रवर्तित गुरिल्ला युद्ध रणनीति, महत्वपूर्ण कालों में कोल्हापुर की स्वतंत्रता को संरक्षित करने में उनकी भूमिका, और यह प्रदर्शित करना कि कैसे वंशानुगत सैन्य परिवारों ने पीढ़ियों तक मराठा संघ को बनाए रखा।
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⚔️ राणोजी घोरपडे और मराठा प्रतिरोध की और गहराई
यह लेख मराठा साम्राज्य के संघर्षशील सेनानायकों पर आधारित हमारी शोध-श्रृंखला का हिस्सा है। राणोजी घोरपडे जैसे भूले-बिसरे योद्धाओं को समझने के लिए नीचे दिए गए आंतरिक और विश्वसनीय बाहरी स्रोत देखें।
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Wow such a readable article ✅