👑⚔️ Pilaji Jadhavrao — मराठा साम्राज्य के अमर सुभेदार और विजय के स्तंभ
मराठा साम्राज्य की गौरवगाथा में Pilaji Jadhavrao का नाम पालखेड़ युद्ध के विजेता, लुसो–मराठा संघर्ष के योद्धा और वासई विजय के योगदानकर्ता के रूप में दर्ज है। वे वह रणनीतिक सेनापति थे जिन्होंने निज़ाम, मुग़ल और पुर्तग़ालियों को पराजित कर मराठा शक्ति को पश्चिमी तट और उत्तरी भारत में स्थापित किया। उनकी पहचान केवल एक योद्धा तक सीमित नहीं—वे प्रशासन, दूरदर्शिता और संगठन के प्रतीक भी थे जिनकी विरासत आज भी वाघोली और मराठा इतिहास में जीवित है। मराठा साम्राज्य के विस्तार और जाधव वंश की इस गाथा में उनका नाम अमर, भूमिका निर्णायक और विरासत प्रेरणादायी है। अगर यह विस्मृत इतिहास आपको गर्व से भरता है, तो इसे शेयर करें—क्योंकि साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, साहस और दूरदर्शिता से टिकती हैं। 👑⚔️
📜 परिचय: पिलाजी जाधवराव – मराठा इतिहास का गुमनाम नायक
पूरा नाम: Pilaji Jadhavrao
जन्म: लगभग 1690, महाराष्ट्र
मृत्यु: लगभग 1751
पद: मराठा सरदार, पेशवा बाजीराव के प्रमुख सहयोगी
प्रमुख क्षेत्र: मालवा, बुंदेलखंड, कोंकण, गुजरात
प्रमुख उपलब्धि: मालवा फरमान में गारंटर (1743), बुंदेलखंड विजय
Pilaji Jadhavrao मराठा इतिहास के उन महान सरदारों में से थे जिनका नाम बाजीराव पेशवा, छत्रपति शाहू महाराज के साथ गर्व से लिया जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से, इतिहास की किताबों में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
Pilaji Jadhavrao केवल एक योद्धा नहीं थे – वे एक रणनीतिकार, कुशल प्रशासक और दूरदर्शी नेता थे। उन्होंने मराठा साम्राज्य के उत्तर की ओर विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब पेशवा बाजीराव उत्तर भारत में मराठा शक्ति स्थापित करने का सपना देख रहे थे, तब पिलाजी जाधवराव उनकी तलवार की धार थे।
1743 का मालवा फरमान इतिहास का वह दस्तावेज है जो पिलाजी के महत्व को रेखांकित करता है। मुगल बादशाह द्वारा जारी इस फरमान में केवल चार मराठा सरदारों को गारंटर बनाया गया था: “राणोजी शिंदे, मल्हारराव होल्कर, उदाजी पवार, और Pilaji Jadhavrao।” यह सूची उस समय के मराठा साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली सरदारों की थी।
जाधव घराने का गौरवशाली इतिहास
Pilaji Jadhavrao जाधव घराने से आते थे, जो महाराष्ट्र का एक प्रतिष्ठित मराठा कुल था। जाधव घराना सदियों से योद्धाओं का घराना रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई भी जाधव घराने से थीं। इस घराने की वीरता और वफादारी की परंपरा पिलाजी में भी स्पष्ट दिखाई देती है।
बाजीराव पेशवा के साथ अटूट बंधन
Pilaji Jadhavrao और पेशवा बाजीराव का संबंध केवल स्वामी-सेवक का नहीं था। यह दो योद्धाओं का गहरा विश्वास और साझा दृष्टिकोण था। जब बाजीराव 1720 में पेशवा बने, तब से लेकर 1740 में उनकी मृत्यु तक, Pilaji Jadhavrao उनके सबसे भरोसेमंद सरदारों में रहे।

ऐतिहासिक दस्तावेजों में Pilaji Jadhavrao का नाम बार-बार बाजीराव के महत्वपूर्ण अभियानों में आता है। चाहे वह 1732-33 का मालवा अभियान हो, 1733-34 का बुंदेलखंड अभियान हो, या 1735-36 का बांकोट अभियान – हर जगह Pilaji Jadhavrao की उपस्थिति दर्ज है।
विशेषताएं और गुण
⚔️ असाधारण युद्ध कौशल: Pilaji Jadhavrao एक कुशल घुड़सवार और तलवारबाज थे। मराठा गुरिल्ला युद्ध कला में वे पारंगत थे। साथ ही, उन्होंने पारंपरिक मुगल युद्ध तकनीक को भी समझा और अपनाया।
🧠 रणनीतिक दूरदर्शिता: Pilaji Jadhavrao केवल युद्ध के मैदान के योद्धा नहीं थे। वे दूरगामी रणनीति बनाने में भी सक्षम थे। मालवा और बुंदेलखंड में उन्होंने स्थानीय शासकों के साथ संबंध बनाए, जो मराठा शक्ति को स्थायी बनाने के लिए आवश्यक थे।
🤝 वफादारी और अनुशासन: ऐतिहासिक अभिलेखों में कहीं भी Pilaji Jadhavrao के विद्रोह या विश्वासघात का उल्लेख नहीं मिलता। यह उनकी दृढ़ वफादारी को दर्शाता है। जब अन्य सरदार कभी-कभी पेशवा के निर्णयों से असहमत होते थे, पिलाजी हमेशा साथ खड़े रहे।
💪 शारीरिक शक्ति और सहनशीलता: उत्तर भारत के कठिन अभियान, जहां मराठा सेनाएं हजारों किलोमीटर की यात्रा करती थीं, Pilaji Jadhavrao के शारीरिक सामर्थ्य का प्रमाण हैं। 1733-34 में बुंदेलखंड अभियान और फिर तुरंत बाद 1735-36 में कोंकण अभियान – यह उनकी असाधारण सहनशक्ति दिखाता है।
समकालीन सरदारों के बीच स्थान
Pilaji Jadhavrao उस पीढ़ी के थे जब मराठा साम्राज्य अपने चरम पर पहुंच रहा था। उनके समकालीन थे – राणोजी शिंदे (ग्वालियर राज्य के संस्थापक), मल्हारराव होल्कर (इंदौर राज्य के संस्थापक), उदाजी पवार, बाजी भीवराव, चिमाजी अप्पा। इन सभी महान सरदारों के बीच पिलाजी का स्थान सम्मानजनक था।
यह ध्यान देने योग्य है कि बाद में शिंदे और होल्कर घरानों ने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए, लेकिन Pilaji Jadhavrao हमेशा पेशवा के प्रति वफादार रहे। उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर मराठा साम्राज्य के हित को रखा।
📚 संदर्भ: Peshwa Daftar Archives, “Chronology – Bajirao”, “Malwa Firman” documents, Maratha historical chronicles
🌅 प्रारंभिक जीवन और मराठा सेवा में प्रवेश (1690-1720)
Pilaji Jadhavrao का जन्म लगभग 1690 के आसपास महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित जाधव परिवार में हुआ। यह वह समय था जब मराठा साम्राज्य छत्रपति राजाराम महाराज और बाद में ताराबाई के नेतृत्व में मुगल साम्राज्य से संघर्षरत था।
जाधव कुल की परंपरा
जाधव घराना महाराष्ट्र का एक क्षत्रिय मराठा कुल था जिसकी वीरता की परंपरा सदियों पुरानी थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई जाधव घराने से थीं। उनके पिता लखुजीराव जाधव सिंदखेड़ के शासक थे और एक प्रतापी योद्धा थे।
इस गौरवशाली परंपरा में Pilaji Jadhavrao का जन्म हुआ। बचपन से ही उन्हें युद्ध कला, घुड़सवारी, तलवारबाजी और मराठा संस्कृति की शिक्षा दी गई। जाधव परिवार छत्रपति के प्रति गहरी वफादारी रखता था, और यह वफादारी पिलाजी में भी कूट-कूट कर भरी हुई थी।
छत्रपति शाहू महाराज का काल
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मराठा इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ। छत्रपति शाहू महाराज, जो 1689 से मुगलों की कैद में थे, 1707 में रिहा हुए और सातारा पहुंचे। शुरुआत में ताराबाई (कोल्हापुर) और शाहू के बीच सत्ता संघर्ष चला। इस अराजकता में कई मराठा सरदार विभाजित हो गए।
Pilaji Jadhavrao ने छत्रपति शाहू महाराज का पक्ष चुना। यह निर्णय उनके पूरे जीवन की दिशा तय करने वाला था। शाहू महाराज ने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा नियुक्त किया, और धीरे-धीरे मराठा साम्राज्य में स्थिरता आने लगी।
बालाजी विश्वनाथ और बाजीराव के साथ प्रारंभिक संबंध
1713 में बालाजी विश्वनाथ पेशवा बने। Pilaji Jadhavrao उस समय युवा योद्धा थे (लगभग 23 वर्ष)। उन्होंने पेशवा के अधीन छोटे-छोटे सैन्य अभियानों में भाग लेना शुरू किया।
1720 में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो गई और उनके पुत्र बाजीराव (केवल 20 वर्ष के) पेशवा बने। यह मराठा इतिहास का स्वर्णिम मोड़ था। बाजीराव एक असाधारण प्रतिभा के धनी थे – युवा, महत्वाकांक्षी, और दूरदर्शी। उन्होंने तय किया कि मराठा साम्राज्य को केवल दक्षिण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उत्तर भारत में भी विस्तार करना चाहिए।
प्रारंभिक सैन्य प्रशिक्षण और अनुभव
1720 के दशक में Pilaji Jadhavrao ने बाजीराव के कई अभियानों में भाग लिया। यह उनके लिए प्रशिक्षण का समय था। उन्होंने सीखा:
मराठा गुरिल्ला युद्ध: तीव्र गति से हमला करना और वापस लौट जाना। दुश्मन की रसद आपूर्ति लाइनों को काटना। पहाड़ी इलाकों में युद्ध करना।

पारंपरिक युद्ध: जब आवश्यक हो, तो खुले मैदान में बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध करना। तोपखाने का उपयोग। घेराबंदी की तकनीक।
रणनीतिक सोच: केवल युद्ध जीतना काफी नहीं – क्षेत्र को कैसे नियंत्रित रखा जाए, स्थानीय शासकों से कैसे संबंध बनाए जाएं, राजस्व कैसे एकत्र किया जाए।
पहले बड़े अभियान
1720 के दशक के अंत में Pilaji Jadhavrao को छोटी सेनाओं की कमान सौंपी जाने लगी। वे बाजीराव के विशाल सैन्य अभियानों में एक प्रमुख कमांडर के रूप में उभर रहे थे।
1728-1729: इस दौरान बाजीराव ने निजाम को पालखेड़ में हराया। हालांकि इस विशिष्ट युद्ध में Pilaji Jadhavrao की भूमिका का सीधा उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन वे इस अभियान का हिस्सा थे। पालखेड़ युद्ध ने दिखाया कि बाजीराव की रणनीति अपराजेय थी – दुश्मन को पानी के स्रोतों से काटना और बिना बड़े युद्ध के आत्मसमर्पण करवाना।
1729 – पवार-होल्कर के साथ: दिसंबर 1729 में ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं, “पवार-होल्कर ने मंडावगड़ को जीता।” यह अभियान मालवा क्षेत्र में था। Pilaji Jadhavrao भी इस क्षेत्र में सक्रिय थे, हालांकि इस विशिष्ट घटना में उनका नाम नहीं है।
1730 के दशक की तैयारी
1730 का दशक मराठा विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण समय था। बाजीराव ने मालवा और बुंदेलखंड में मराठा शक्ति स्थापित करने की योजना बनाई। इसके लिए उन्हें विश्वसनीय और कुशल सरदारों की आवश्यकता थी।
Pilaji Jadhavrao इस समय तक एक अनुभवी योद्धा बन चुके थे (लगभग 40 वर्ष के)। उन्होंने साबित कर दिया था कि वे बाजीराव के विश्वास के योग्य हैं। अब उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी जाने वाली थीं।
📚 संदर्भ: “Chronology – Bajirao”, Maratha family histories, Peshwa court records
🏰 मालवा अभियान और उत्तर विजय (1732-1737)
1730 के दशक में पेशवा बाजीराव का मुख्य लक्ष्य मालवा (आधुनिक मध्य प्रदेश) पर मराठा नियंत्रण स्थापित करना था। यह क्षेत्र रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। Pilaji Jadhavrao इस महत्वाकांक्षी योजना के प्रमुख स्तंभों में से एक थे।
मालवा का महत्व और चुनौतियां
मालवा उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक सेतु था। यहां से नर्मदा नदी बहती थी, जो पारंपरिक रूप से उत्तर और दक्षिण भारत की सीमा मानी जाती थी। मालवा पर नियंत्रण का मतलब था:
- उत्तर भारत में प्रवेश का द्वार
- धनी कृषि क्षेत्र से राजस्व
- रणनीतिक दृष्टि से मुगलों और राजपूतों के बीच स्थिति
लेकिन मालवा आसानी से नहीं मिलने वाला था। यहां मुगल सूबेदार, स्थानीय जमींदार, और कभी-कभी राजपूत शासक भी हस्तक्षेप करते थे।
प्रथम मालवा अभियान (अक्टूबर 1732)
20 अक्टूबर 1732: ऐतिहासिक अभिलेख बताता है, “चिमाजी अप्पा मालवा अभियान पर गए।” यह बाजीराव के छोटे भाई चिमाजी अप्पा का अभियान था। Pilaji Jadhavrao भी इस अभियान में शामिल हुए, हालांकि उनका विशिष्ट उल्लेख बाद में आता है।
दिसंबर 1733: यहां पहली बार स्पष्ट संदर्भ मिलता है – “Pilaji Jadhavrao मालवा अभियान पर।” यह दर्शाता है कि पिलाजी को एक स्वतंत्र सेना की कमान सौंपी गई थी।
मालवा में मराठा रणनीति
बाजीराव की रणनीति सरल लेकिन प्रभावी थी:
- तीव्र गति से आगे बढ़ना – दुश्मन को तैयारी का समय न देना
- स्थानीय गठबंधन – हिंदू जमींदारों और व्यापारियों का समर्थन हासिल करना
- चौथ की व्यवस्था – सीधे राज्य न बनाकर कर वसूली का अधिकार लेना
- विश्वसनीय सरदारों को तैनात करना – शिंदे, होल्कर, पवार, जाधवराव जैसे सरदारों को विभिन्न क्षेत्रों का प्रभारी बनाना

Pilaji Jadhavrao को मालवा के कुछ परगनों (क्षेत्रों) की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्हें यहां से चौथ एकत्र करना था और मराठा नियंत्रण सुनिश्चित करना था।
मुगल और राजपूत विरोध
मालवा में मराठा प्रवेश आसान नहीं था। मुगल सूबेदार और राजपूत शासक इसे रोकने की कोशिश कर रहे थे।
फरवरी 1733: “जयसिंह मांडसौर के पास घिर गए।” सवाई जयसिंह जयपुर के महाराजा थे और मुगल बादशाह के प्रमुख सहयोगी। उन्हें मालवा में मराठों को रोकने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन मराठा सेना ने उन्हें घेर लिया।
इस अभियान में Pilaji Jadhavrao भी सक्रिय थे। मराठा सरदारों ने जयसिंह को इतना दबाव डाला कि अंततः उन्हें मराठों से समझौता करना पड़ा।
शिंदे-होल्कर के साथ समन्वय
मालवा अभियान में तीन प्रमुख सरदार थे – राणोजी शिंदे, मल्हारराव होल्कर, और Pilaji Jadhavrao। तीनों ने मिलकर मालवा को तीन भागों में बांटा और अपने-अपने क्षेत्रों में मराठा शक्ति स्थापित की।
22 अप्रैल 1734: “शिंदे-होल्कर ने बूंदी किला जीता।” यह राजस्थान में एक महत्वपूर्ण किला था। इस विजय से राजपूत शासक भयभीत हो गए।
13 फरवरी 1735: “शिंदे-होल्कर ने रामपुरा के पास मुगलों को हराया।” यह निर्णायक युद्ध था जिसने मालवा में मराठा प्रभुत्व सुनिश्चित किया।
6 जुलाई 1735: “शिंदे-होल्कर को पुणे और सातारा में सम्मानित किया गया।” छत्रपति शाहू और पेशवा बाजीराव दोनों ने इन सरदारों की उपलब्धियों की सराहना की। पिलाजी जाधवराव भी इस सम्मान के हकदार थे।
महाल वितरण (29 जुलाई 1732)
29 जुलाई 1732: एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिया गया – “पेशवा ने मालवा महालों का वितरण किया।”
महाल (Mahal) उस समय प्रशासनिक क्षेत्रों को कहा जाता था। बाजीराव ने मालवा के विभिन्न महालों को अपने विश्वसनीय सरदारों में बांट दिया। प्रत्येक सरदार अपने महाल से चौथ (25% कर) एकत्र करता और पेशवा को एक हिस्सा देता।
Pilaji Jadhavrao को भी कुछ महत्वपूर्ण महाल सौंपे गए। यह उनके प्रभाव और विश्वसनीयता का प्रमाण था।
राजपूतों के साथ संघर्ष
जुलाई 1734: “राजपूत मराठों के खिलाफ एकजुट हुए।” राजपूत शासकों ने देखा कि मराठा शक्ति तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने आपस में गठबंधन बनाया।
लेकिन मराठा सरदार – शिंदे, होल्कर, पवार, जाधवराव – अधिक कुशल और संगठित थे। उन्होंने राजपूत गठबंधन को तोड़ दिया।
24 मार्च 1735: “खान दौरान और जयसिंह ने कोटा में चौथ समझौता पूरा किया।” यह मराठों की बड़ी जीत थी। राजपूत और मुगल दोनों ने मान लिया कि मालवा अब मराठों का क्षेत्र है।
📚 संदर्भ: “Chronology – Bajirao”, “Back to the North”, Malwa campaign records
🏹 बुंदेलखंड विजय – छत्रसाल की मदद (1729-1734)
बुंदेलखंड अभियान Pilaji Jadhavrao के सैन्य जीवन का सबसे गौरवशाली अध्याय था। यह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि मराठा साम्राज्य के उत्तर में विस्तार का निर्णायक क्षण था।
बुंदेलखंड का भौगोलिक और राजनीतिक महत्व
बुंदेलखंड (आधुनिक मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का हिस्सा) एक रणनीतिक क्षेत्र था। यह मालवा और गंगा के मैदानों के बीच स्थित था। यहां के किले – झांसी, ओरछा, दतिया, महोबा – सैन्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
बुंदेलखंड के हिंदू राजा छत्रसाल बुंदेला एक प्रतापी शासक थे। उन्होंने मुगलों के खिलाफ लंबा संघर्ष किया था और अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था। लेकिन 1720 के दशक के अंत में वे वृद्ध हो चुके थे (लगभग 70 वर्ष के)।
संकट और बाजीराव की पुकार (1729)
जून 1728: “मोहम्मद खान बंगश ने छत्रसाल को जैतपुर में हराया।” बंगश अल्लाहाबाद का नवाब था और बेहद शक्तिशाली। उसने छत्रसाल के राज्य पर हमला किया और उन्हें घेर लिया।
छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव को मदद के लिए संदेश भेजा। यह ऐतिहासिक पत्र आज भी प्रसिद्ध है जिसमें छत्रसाल ने लिखा (कविता के रूप में): “जो गति गजेंद्र की आई, सो गति हमरे आई। बाजी जात बुंदेल की राखो, बाजी आपनी राखो।”
(जैसे हाथी की विपत्ति आई थी, वैसी हमारी आई है। बुंदेलों की लाज रखो, अपनी प्रतिष्ठा रखो।)
बाजीराव का तीव्र प्रतिक्रिया
फरवरी 1729: बाजीराव बुंदेलखंड के लिए रवाना हुए। उनके साथ एक शक्तिशाली सेना थी। इस सेना में Pilaji Jadhavrao भी थे।
बाजीराव ने अपनी प्रसिद्ध तीव्र गति की रणनीति अपनाई। मराठा सेना ने इतनी तेजी से बुंदेलखंड की ओर कूच किया कि बंगश को तैयारी का समय ही नहीं मिला।
12 मार्च 1729: “बाजीराव-छत्रसाल महोबा में मिले।” यह ऐतिहासिक मुलाकात थी। वृद्ध छत्रसाल ने युवा बाजीराव को अपने पुत्र की तरह गले लगाया।

बंगश का पराजय
28 अप्रैल 1729: “बाजीराव ने बंगश को हराया। गोविंदपंत बुंदेले को (बुंदेलखंड में) नियुक्त किया गया।”
यह निर्णायक युद्ध था। मराठा सेना ने बंगश की विशाल सेना को बुरी तरह हराया। बंगश भागकर अल्लाहाबाद चला गया। बुंदेलखंड मुक्त हो गया।
इस युद्ध में पिलाजी जाधवराव की भूमिका महत्वपूर्ण थी। हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनका विशिष्ट योगदान विस्तार से नहीं मिलता, लेकिन वे इस अभियान का हिस्सा थे।
छत्रसाल की कृतज्ञता और विरासत
छत्रसाल बाजीराव की मदद से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी वसीयत में बाजीराव को एक बड़ा हिस्सा दिया। 1731 में जब छत्रसाल की मृत्यु हुई, तो उनके राज्य का एक-तिहाई हिस्सा मराठों को मिला।
1730-1731: “छत्रसाल बुंदेला के चरम प्रभाव का काल।” बाजीराव की मदद के बाद छत्रसाल ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में शांति से शासन किया।
Pilaji Jadhavrao की निरंतर उपस्थिति
नवंबर 1734: “Pilaji Jadhavrao बुंदेलखंड अभियान पर।” यह संदर्भ बताता है कि बाजीराव के बाद भी बुंदेलखंड में मराठा उपस्थिति बनाए रखने के लिए पिलाजी को भेजा गया।
बुंदेलखंड में मराठा शक्ति को स्थायी बनाना था। स्थानीय जमींदारों को नियंत्रित करना, चौथ एकत्र करना, और किसी भी विद्रोह को दबाना – ये सब जिम्मेदारियां पिलाजी जैसे अनुभवी सरदारों को सौंपी गईं।
बुंदेलखंड की विरासत
बुंदेलखंड विजय ने मराठों को उत्तर भारत में मजबूत आधार दिया। यहां से:
- दिल्ली तक पहुंचना आसान हो गया
- गंगा-यमुना के मैदानों में प्रवेश मिला
- मुगल और नवाबों पर दबाव बढ़ा
पिलाजी जाधवराव इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के प्रमुख योगदानकर्ताओं में से थे।
📚 संदर्भ: “Chronology – Bajirao”, Bundela chronicles, Maratha expansion records
🌊 कोंकण और जंजीरा अभियान (1735-1736)
मालवा और बुंदेलखंड में अभियानों के बाद, Pilaji Jadhavrao को एक नई चुनौती का सामना करना पड़ा – कोंकण में सिद्दियों के खिलाफ युद्ध। यह भूगोल, रणनीति और दुश्मन – सब दृष्टि से बिल्कुल अलग था।
जंजीरा समस्या और मराठा राष्ट्रीय अभियान
जंजीरा (आधुनिक रत्नागिरी जिला, महाराष्ट्र) का समुद्री किला सिद्दियों (अफ्रीकी मूल के मुस्लिम शासक) के नियंत्रण में था। छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से यह किला मराठों के लिए एक चुनौती रहा था। सिद्दी अपनी नौसैनिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।
1733 में छत्रपति शाहू महाराज ने जंजीरा के खिलाफ एक बड़ा राष्ट्रीय अभियान शुरू किया। इसमें लगभग सभी प्रमुख मराठा सरदारों को लगाया गया – बाजीराव, चिमाजी अप्पा, प्रतिनिधि, आंग्रे नौसेना, और कई अन्य। यह केवल एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव का प्रश्न था।
Pilaji Jadhavrao की नियुक्ति
1735-1736: Pilaji Jadhavrao को भी इस अभियान में शामिल किया गया। उन्होंने मालवा और बुंदेलखंड जैसे सूखे पठारी क्षेत्रों में युद्ध किया था। अब उन्हें कोंकण की नम जलवायु, घने जंगलों और समुद्री युद्ध का अनुभव करना था।
ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि Pilaji Jadhavrao ने इस अभियान में सक्रिय भाग लिया। हालांकि उनकी विशिष्ट उपलब्धियों का विस्तृत विवरण नहीं मिलता, लेकिन वे छत्रपति शाहू के आदेश पर कोंकण में तैनात थे।
चुनौतियां और कठिनाइयां
जंजीरा अभियान अत्यंत कठिन था। सिद्दी का समुद्री किला लगभग अभेद्य था। उनके पास शक्तिशाली नौसेना थी। साथ ही, अंग्रेज और पुर्तगाली गुप्त रूप से सिद्दियों की मदद कर रहे थे।
कोंकण की भौगोलिक चुनौतियां भी बहुत थीं:
- भारी मानसूनी बारिश
- मलेरिया और अन्य बीमारियां
- घने जंगल और पहाड़ी इलाके
- समुद्र तट पर युद्ध की आवश्यकता

एक सरदार ने शाहू को लिखा: “कई कन्नडिगा कोंकण सहन नहीं कर सकते। कई अन्य भी खुश नहीं हैं।” यह दर्शाता है कि यह अभियान कितना कठिन था।
मराठा समन्वय
इस अभियान में विभिन्न मराठा सरदारों को समन्वित करना एक बड़ी चुनौती थी। आंग्रे नौसेना समुद्र से जिम्मेदार थी, जबकि Pilaji Jadhavrao जैसे पठारी सरदार जमीन से लड़ रहे थे।
कभी-कभी समन्वय की कमी से समस्याएं होती थीं। लेकिन छत्रपति शाहू और पेशवा बाजीराव ने सभी को एक लक्ष्य पर केंद्रित रखा – सिद्दी को हराना और मराठा गौरव की रक्षा करना।
अभियान का महत्व
यद्यपि जंजीरा किला पूरी तरह से नहीं जीता गया, लेकिन इस अभियान ने कई महत्वपूर्ण परिणाम दिए:
- सिद्दी शक्ति कमजोर हुई
- रायगढ़, बांकोट जैसे किले मराठों ने जीते
- कोंकण में मराठा नियंत्रण मजबूत हुआ
- पिलाजी जैसे सरदारों को विविध युद्ध अनुभव मिला
ऐतिहासिक विश्लेषण कहता है: “संपूर्ण उद्यम का समग्र प्रभाव यह था कि मराठा नेतृत्व ने विश्वास करना शुरू किया – ‘धन के लिए जीवन का त्याग किया जा सकता है, लेकिन सम्मान के लिए जीवन का त्याग करना पड़ता है।'”
📚 संदर्भ: “Shahu’s Efforts”, “War Continues”, Janjira campaign chronicles
👑 मालवा फरमान और ऐतिहासिक मान्यता (1743)
1743 का मालवा फरमान Pilaji Jadhavrao के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि थी। यह केवल एक दस्तावेज नहीं था – यह मुगल बादशाह द्वारा मराठा शक्ति की आधिकारिक मान्यता थी।
फरमान की पृष्ठभूमि
1740 में पेशवा बाजीराव की मृत्यु हो गई। उनके पुत्र बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) नए पेशवा बने। बाजीराव ने अपने 20 साल के कार्यकाल में मराठा साम्राज्य को अभूतपूर्ण ऊंचाइयों पर पहुंचाया था। अब नानासाहेब को इस विरासत को कानूनी मान्यता दिलानी थी।
मुगल बादशाह मोहम्मद शाह कमजोर हो चुके थे। 1739 में नादिर शाह ने दिल्ली को लूटा था। मुगल साम्राज्य केवल नाममात्र का रह गया था। लेकिन अभी भी कानूनी मान्यता के लिए मुगल फरमान आवश्यक था।
फरमान की शर्तें और महत्व
मालवा फरमान की शुरुआत इस प्रकार होती है: “बादशाह, अपनी कृपा से, नानासाहेब और चिमाजी अप्पा के आवेदन पर विचार करे।” (नोट: यह फरमान चिमाजी अप्पा के जीवित रहते तैयार हुआ था, लेकिन बाद में उनका नाम हटाया गया क्योंकि 1740 में उनकी मृत्यु हो गई थी।)
मुख्य शर्तें:
- मराठों को मालवा का नायब-सूबेदार (सहायक गवर्नर) बनाया गया
- मराठे मालवा के अलावा अन्य प्रांतों में अभियान नहीं करेंगे
- पेशवा बादशाह की सेवा में 500 घुड़सवार रखेंगे
- आवश्यकता पड़ने पर 4,000 मराठा सेना उपलब्ध कराएंगे

चार गारंटर – ऐतिहासिक महत्व
फरमान का सबसे महत्वपूर्ण और अभूतपूर्ण हिस्सा था: “चार मराठा प्रमुख: राणोजी शिंदे, मल्हारराव होल्कर, उदाजी पवार, और Pilaji Jadhavrao ने इन वादों को सम्मानित करने की गारंटी दी।”
यह पहली बार था जब मुगल दरबार ने पेशवा के अधीनस्थ सरदारों से गारंटी मांगी। गारंटी में लिखा था: “यदि पेशवा बादशाह का विरोध करें, तो हम (सरदार) उन्हें ऐसा न करने का अनुरोध करेंगे। यदि वे नहीं सुनते, तो हम उनकी सेवा से इस्तीफा दे देंगे।”
Pilaji Jadhavrao का समावेश – क्या दर्शाता है?
Pilaji Jadhavrao का इस सूची में होना कई बातें साबित करता है:
1. राजनीतिक शक्ति: केवल चार सरदारों को चुना गया था। Pilaji Jadhavrao उनमें थे। यह उनकी राजनीतिक शक्ति और प्रभाव को दर्शाता है।
2. मालवा में प्रभाव: चारों गारंटर – शिंदे, होल्कर, पवार, जाधवराव – मालवा में शक्तिशाली थे। इसका मतलब पिलाजी का मालवा में मजबूत आधार था।
3. पेशवा का विश्वास: नानासाहेब पेशवा ने पिलाजी पर पूरा भरोसा किया। तभी उन्हें गारंटर बनाया गया।
4. शिंदे-होल्कर के बराबर: ध्यान दें कि राणोजी शिंदे और मल्हारराव होल्कर आगे चलकर ग्वालियर और इंदौर के स्वतंत्र राज्य स्थापित करने वाले थे। 1743 में पिलाजी उनके बराबर माने जाते थे।
फरमान के दूरगामी परिणाम
ऐतिहासिक विश्लेषण बताता है: “चूंकि पेशवा के सरदार – शिंदे, होल्कर, पवार और जाधव – ने गारंटी दी थी, इसलिए आम जनता में उनका कद बढ़ गया। इसी तरह, पेशवा पर उनका प्रभाव भी बढ़ा होगा।”
फरमान के बाद:
- मालवा और बुंदेलखंड के शासकों के दिल्ली से संबंध टूट गए
- उनका पुणे के साथ नया संबंध बना
- सरदारों की शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ी
- पेशवा का ध्यान उत्तर में नई प्रशासनिक व्यवस्था पर केंद्रित हुआ
Pilaji Jadhavrao की विरासत
1743 के बाद Pilaji Jadhavrao का उल्लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों में कम होता जाता है। संभवतः वे वृद्ध हो रहे थे (लगभग 53 वर्ष)। लेकिन मालवा फरमान में उनका नाम हमेशा के लिए इतिहास में अंकित हो गया।
📚 संदर्भ: “Malwa Firman” original document, Mughal-Maratha treaties, Peshwa court records
🔍 7 गुमनाम ऐतिहासिक सच्चाइयां
सच्चाई 1: तीन अलग-अलग युद्ध भूमियों पर विजय
Pilaji Jadhavrao ने तीन बिल्कुल अलग भौगोलिक और सैन्य परिस्थितियों में युद्ध किया और सफलता हासिल की। मालवा का सूखा पठार (1732-1735), बुंदेलखंड की पहाड़ियां और किले (1729, 1734), और कोंकण का नम तटीय क्षेत्र (1735-1736)। यह बहुमुखी प्रतिभा दुर्लभ थी। अधिकांश सरदार एक विशेष प्रकार के युद्ध में विशेषज्ञ होते थे। Pilaji Jadhavrao ने साबित किया कि वे हर परिस्थिति में लड़ सकते हैं।
सच्चाई 2: पेशवा के सबसे विश्वसनीय सरदार – कभी विद्रोह नहीं
18वीं सदी में कई मराठा सरदार कभी न कभी पेशवा के खिलाफ विद्रोह कर गए। खांडेराव दाभाड़े (सेनापति) ने विरोध किया और 1731 में मारे गए। उदाजी पवार ने पक्ष बदला। रघुजी भोसले ने स्वतंत्र रास्ता अपनाया। लेकिन Pilaji Jadhavrao के बारे में ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता। वे हमेशा वफादार रहे। यह उनके चरित्र की दृढ़ता दिखाता है।
सच्चाई 3: गायकवाड़ वंश के संस्थापक के पिता
बहुत कम लोग जानते हैं कि Pilaji Jadhavrao (बड़ौदा राज्य के संस्थापक) Pilaji Jadhavrao के पुत्र थे। पिलाजी गायकवाड़ ने गुजरात में अपना राज्य स्थापित किया जो 1947 तक चला। इस प्रकार, पिलाजी जाधवराव एक महान राजवंश के संस्थापक पिता थे। लेकिन इतिहास में उन्हें यह श्रेय कम मिला।
सच्चाई 4: दस वर्षों तक निरंतर सैन्य अभियान (1729-1739)
1729 (बुंदेलखंड) से लेकर 1739 तक, Pilaji Jadhavrao लगभग लगातार सैन्य अभियानों में रहे। यह शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति का अद्भुत उदाहरण है। उस युग में युद्ध का मतलब था – हजारों किलोमीटर घोड़े पर यात्रा, महीनों शिविरों में रहना, बीमारियां, कठोर मौसम। पिलाजी ने यह सब 10 साल तक झेला।

सच्चाई 5: मालवा में चौथ वसूली की कुशलता
Pilaji Jadhavrao केवल योद्धा नहीं, बल्कि कुशल प्रशासक भी थे। मालवा में उन्होंने चौथ (25% कर) वसूली की एक प्रभावी प्रणाली स्थापित की। उन्होंने स्थानीय जमींदारों और व्यापारियों के साथ अच्छे संबंध बनाए। इसके परिणामस्वरूप, उनके क्षेत्र से नियमित रूप से राजस्व पुणे पहुंचता रहा। यह पेशवा के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।
सच्चाई 6: 1751 तक जीवित – बाजीराव के बाद भी सेवा
Pilaji Jadhavrao की मृत्यु की सटीक तारीख ऐतिहासिक दस्तावेजों में स्पष्ट नहीं है। लेकिन अनुमान है कि वे लगभग 1751 तक जीवित रहे। इसका मतलब है कि बाजीराव की मृत्यु (1740) के बाद भी वे 11 साल तक नानासाहेब पेशवा की सेवा करते रहे। यह लंबी और समर्पित सेवा का प्रमाण है।
📚 संदर्भ: Compiled from Peshwa Daftar, Maratha genealogies, Baroda royal records
🎯 निष्कर्ष
Pilaji Jadhavrao मराठा इतिहास के उन गुमनाम नायकों में से थे जिन्होंने बिना शोर-शराबे के अपना कर्तव्य निभाया। वे बाजीराव पेशवा की महत्वाकांक्षी योजनाओं की रीढ़ थे।
मुख्य उपलब्धियां: ✅ मालवा विजय में महत्वपूर्ण भूमिका (1732-1737) ✅ बुंदेलखंड में छत्रसाल की मदद (1729, 1734) ✅ कोंकण-जंजीरा अभियान (1735-1736) ✅ मालवा फरमान में गारंटर (1743) ✅ तीन अलग युद्ध क्षेत्रों में सफलता ✅ 20+ वर्षों की निष्ठावान सेवा ✅ गायकवाड़ राजवंश के संस्थापक पिता

आज की सीख: Pilaji Jadhavrao की कहानी सिखाती है कि सच्ची महानता शोर में नहीं, मौन सेवा में है। उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर मराठा साम्राज्य की सेवा की। उन्होंने साबित किया कि वफादारी और कर्तव्य सबसे बड़े गुण हैं।
🙏 Pilaji Jadhavrao को नमन – एक सच्चे मराठा योद्धा और वफादार सेवक!
❓ FAQ – Pilaji Jadhavrao
प्रश्न 1: पिलाजी जाधवराव कौन थे?
उत्तर: 18वीं सदी के मराठा सरदार, पेशवा बाजीराव के विश्वसनीय सहयोगी, मालवा फरमान (1743) में गारंटर।
प्रश्न 2: उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
उत्तर: मालवा फरमान में शिंदे, होल्कर, पवार के साथ गारंटर बनना। यह मुगल बादशाह द्वारा मराठा शक्ति की आधिकारिक मान्यता थी।
प्रश्न 3: मृत्यु कब हुई?
उत्तर: लगभग 1751 (सटीक तारीख अज्ञात)।
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अगर यह प्रामाणिक, विरासत‑आधारित और ऐतिहासिक गाथा आपको यह समझा पाई कि मराठा साम्राज्य की विजय केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, साहस और दूरदर्शिता से टिकती है — तो इसे शेयर अवश्य करें। Pilaji Jadhavrao वह नाम हैं, जिन्होंने पालखेड़ युद्ध में निज़ाम को पराजित किया, लुसो–मराठा युद्ध में पुर्तग़ालियों को कमजोर किया, और वासई विजय में मराठा साम्राज्य को गौरव दिलाया। उनकी गाथा आज भी प्रेरणा और गौरव का स्रोत है। 👑⚔️
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