👑⚔️ Vithoji Chavan — मराठा स्वराज्य के “हिंमतबहाद्दर” और अदम्य योद्धा
मराठा स्वराज्य की गौरवगाथा में Vithoji Chavan का नाम शिवाजी महाराज के निष्ठावान सेनापति, जंजिरा–सिद्दी संघर्ष के योद्धा और स्वराज्य की सीमाओं के रक्षक के रूप में अमर है। वे वह रणनीतिक योद्धा थे जिन्होंने तलवार, साहस और निष्ठा से मराठा शक्ति को सुदृढ़ किया। उनकी पहचान केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं—वे निष्ठा, संगठन और वीरता के प्रतीक भी थे जिनकी गाथा आज भी कसबे डिग्रज और मराठा इतिहास में जीवित है। मराठा साम्राज्य के विस्तार और चव्हाण घराने की इस गाथा में उनका नाम अमर, भूमिका निर्णायक और विरासत प्रेरणादायी है। अगर यह विस्मृत इतिहास आपको गर्व से भरता है, तो इसे शेयर करें—क्योंकि साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, साहस और निष्ठा से टिकती हैं। 👑⚔️
🔥 शुरुआत में ही जानिए – यह कहानी क्यों खास है?
सत्रहवीं शताब्दी का अंतिम दशक। मराठा साम्राज्य अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। छत्रपति संभाजी महाराज की क्रूर हत्या के बाद मुगल सम्राट औरंगजेब को लग रहा था कि मराठों का मनोबल टूट चुका है। राजधानी रायगड पर मुगलों का कब्जा हो चुका था। किले एक-एक करके गिर रहे थे। ऐसे में जब पूरा साम्राज्य हिल रहा था, तब कुछ वीर योद्धाओं ने ऐसा पराक्रम दिखाया जिसने पूरे मराठा साम्राज्य में नई जान फूंक दी।
उन्हीं वीरों में से एक थे Vithoji Chavan – जिन्हें इतिहास “हिम्मत बहादुर” की उपाधि से जानता है। यह वह योद्धा है जिसने संताजी घोरपड़े के साथ मिलकर औरंगजेब के शिविर पर रात के अंधेरे में हमला बोला और मुगल सम्राट के तंबू की सोने की कलशें उखाड़कर ले गए। यह सिर्फ एक युद्ध नहीं था – यह मराठा शौर्य का प्रतीक था।

लेकिन Vithoji Chavan की कहानी सिर्फ तुलापुर के हमले तक सीमित नहीं है। यह कहानी एक अनाथ बच्चे से लेकर “हिम्मत बहादुर” बनने तक की यात्रा है। यह कहानी है एक पिता की मृत्यु के बाद मालोजी घोरपड़े द्वारा पाले गए बच्चे की, जो आगे चलकर मराठा साम्राज्य के सबसे निडर योद्धाओं में से एक बना।
आज हम आपके सामने लाए हैं Vithoji Chavan की वह पूरी कहानी जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई है। यह ब्लॉग सिर्फ युद्धों की कहानी नहीं है – यह है एक योद्धा के संघर्ष, उसकी वफादारी, उसके साहस और अंततः उसके बलिदान की अमर गाथा।
तो चलिए, शुरू करते हैं यह अद्भुत यात्रा…
📖 विठोजी चव्हाण का प्रारंभिक जीवन – एक अनाथ से योद्धा तक
इतिहास के पन्नों में Vithoji Chavan का जन्म और बचपन रहस्य में लिपटा हुआ है। हालांकि सटीक जन्म तिथि उपलब्ध नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि विठोजी का जन्म लगभग 1660-1665 के बीच हुआ होगा। वह चव्हाण परिवार से थे, जो उस समय के प्रतिष्ठित मराठा कुलों में से एक था।
Vithoji Chavan के पिता का नाम रणोजी चव्हाण था। रणोजी एक वीर योद्धा थे जो मालोजी घोरपड़े की सेवा में थे। मालोजी घोरपड़े उस समय के प्रमुख मराठा सरदारों में से एक थे और भोसले वंश की एक शाखा – घोरपड़े परिवार के प्रमुख थे। रणोजी चव्हाण मालोजी के विश्वसनीय सैनिकों में से एक थे और कई युद्धों में उनके साथ लड़े।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक युद्ध में रणोजी चव्हाण वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी मृत्यु के समय Vithoji Chavan बहुत छोटे थे – शायद 8-10 वर्ष के। अपने पिता की मृत्यु के बाद Vithoji Chavan अनाथ हो गए। उस समय एक अनाथ बच्चे का भविष्य अनिश्चित होता था, लेकिन मालोजी घोरपड़े ने रणोजी की सेवा और बलिदान को याद रखते हुए एक महान निर्णय लिया।
मालोजी घोरपड़े ने युवा Vithoji Chavan को अपनी संरक्षकता में ले लिया। उन्होंने Vithoji Chavan को अपने ही बच्चों की तरह पाला। यह सिर्फ दया का कार्य नहीं था – यह मराठा संस्कृति की उस परंपरा का हिस्सा था जहां योद्धा एक-दूसरे के परिवारों की जिम्मेदारी लेते थे। मालोजी ने विठोजी को घुड़सवारी, तलवारबाजी, युद्ध कौशल और रणनीति सिखाई।

Vithoji Chavan ने मालोजी घोरपड़े के घर में रहते हुए न केवल युद्ध कला सीखी, बल्कि मराठा मूल्यों को भी आत्मसात किया। उन्होंने मालोजी के पुत्रों – संताजी घोरपड़े, बहिरजी घोरपड़े और मालोजी घोरपड़े (मालोजी के पुत्र) के साथ प्रशिक्षण लिया। यह भाईचारा आगे चलकर युद्ध के मैदान में अटूट बंधन साबित हुआ।
मालोजी घोरपड़े की मृत्यु के बाद, Vithoji Chavan ने संताजी घोरपड़े के साथ काम करना जारी रखा। संताजी और Vithoji Chavan का रिश्ता सिर्फ सहयोगी योद्धाओं का नहीं था – वे एक-दूसरे को भाई मानते थे। कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों में विठोजी को संताजी का “भतीजा” भी कहा गया है, हालांकि यह रक्त संबंध से अधिक प्रेम और सम्मान का सूचक था।
Vithoji Chavan का प्रारंभिक जीवन कठिनाइयों से भरा था, लेकिन इन्हीं कठिनाइयों ने उन्हें एक निडर योद्धा बनाया। पिता की मृत्यु ने उन्हें जीवन की कठोर सच्चाइयों से परिचित कराया, और मालोजी घोरपड़े के संरक्षण ने उन्हें मराठा योद्धा की सभी विशेषताएं प्रदान कीं। यह वह आधार था जिसपर विठोजी चव्हाण का शानदार भविष्य बनने वाला था।
जब छत्रपति राजाराम महाराज का शासनकाल शुरू हुआ (1689), तब तक Vithoji Chavan एक अनुभवी योद्धा बन चुके थे। वह संताजी घोरपड़े के सबसे विश्वसनीय साथियों में से एक थे और मराठा सेना में उनकी पहचान बन चुकी थी। अनाथ बच्चे से योद्धा तक की यह यात्रा Vithoji Chavan के दृढ़ संकल्प और साहस का प्रमाण थी।
यह प्रारंभिक जीवन ही था जिसने Vithoji Chavan को उस महान कार्य के लिए तैयार किया जो आगे चलकर इतिहास में दर्ज होने वाला था – तुलापुर का वह साहसिक हमला जिसने पूरे मुगल साम्राज्य को हिला दिया।
⚔️ तुलापुर का ऐतिहासिक हमला – औरंगजेब के शिविर पर धावा (1689)
1689 का वर्ष मराठा इतिहास में सबसे काला वर्ष माना जाता है। 11 मार्च 1689 को छत्रपति संभाजी महाराज को औरंगजेब ने तुलापुर में अमानवीय यातनाओं के बाद मृत्यु दंड दिया। यह वही स्थान था जहां मराठा साम्राज्य के द्वितीय छत्रपति ने अपनी अंतिम सांस ली। संभाजी महाराज की क्रूर हत्या ने पूरे मराठा साम्राज्य को झकझोर दिया था।
औरंगजेब को विश्वास था कि संभाजी की मृत्यु के बाद मराठों का मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा और वे आत्मसमर्पण कर देंगे। मुगल सेनापति जुल्फिकार खान ने रायगड किले को घेर लिया था। किले एक-एक करके मुगलों के हाथ में जा रहे थे। ऐसा लग रहा था कि छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित स्वराज्य का सपना धूमिल हो रहा है।
लेकिन मराठों ने हार नहीं मानी। 12 मार्च 1689 को छत्रपति संभाजी के छोटे भाई राजाराम महाराज को छत्रपति घोषित किया गया। राजाराम महाराज ने प्रण लिया कि वे अपने बड़े भाई की मृत्यु का बदला लेंगे। उन्होंने रामचंद्रपंत अमात्य और शंकराजी नारायण सचिव को मराठा प्रशासन की जिम्मेदारी दी, और सेना की कमान संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव को सौंपी।
जून 1689 में, जब मुगल सेना ने प्रतापगड़ किले पर हमले की योजना बनाई, राजाराम महाराज ने रायगड से निकलकर पन्हाला किले में शरण ली। यह एक रणनीतिक निर्णय था। पन्हाला में रहते हुए, संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव ने कई छोटे-छोटे युद्धों में मुगल सेना को परास्त किया। धनाजी जाधव ने फलटण के आसपास 4-5 युद्धों में मुगल सरदार शियाबुद्दीन खान और रणमस्त खान को हराया और उनकी तोपें छीन लीं।
लेकिन संताजी घोरपड़े के मन में एक साहसिक योजना थी – औरंगजेब के शिविर पर सीधा हमला। यह विचार अत्यंत जोखिम भरा था, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अपार होने वाला था। अगर वे औरंगजेब के शिविर पर हमला करने में सफल हो गए, तो यह मराठों के टूटे हुए मनोबल को फिर से जगा देगा।
संताजी ने अपनी योजना धनाजी जाधव के साथ साझा की। धनाजी ने अपनी सेना से 2000 सैनिक संताजी को उपलब्ध कराए। संताजी ने अपने भाइयों – बहिरजी घोरपड़े और मालोजी घोरपड़े को साथ लिया। और सबसे महत्वपूर्ण, उन्होंने Vithoji Chavan को भी इस मिशन में शामिल किया।
मराठा गुप्तचर प्रणाली अत्यंत विकसित थी। संताजी के गुप्तचरों ने औरंगजेब के शिविर की सूक्ष्म जानकारी एकत्र की:
- औरंगजेब ने तुलापुर और कोरेगांव के बीच अपना शिविर लगाया था
- उसका तंबू चार भागों में विभाजित था, जिसमें “दौलतखाना” औरंगजेब का निजी कक्ष था
- तंबू के चारों ओर गुलाबी रंग की लकड़ी की बाड़ थी
- बाड़ पर लाल-भूरे रंग के झंडे लगे थे
- पहरेदारों के बदलने का समय और संख्या की जानकारी भी उपलब्ध थी
- महत्वपूर्ण बात यह थी कि कोरेगांव में कई मराठा सैनिक मुगलों की सेवा में थे, इसलिए मराठी बोलने वाले सैनिक शिविर में अजीब नहीं लगते
अगस्त 1689 में, श्रावण महीने की एक अंधेरी रात को, संताजी घोरपड़े ने अपनी योजना को अंजाम दिया। पन्हाला से निकलकर, संताजी, बहिरजी, मालोजी और Vithoji Chavan अपने 2000 सैनिकों के साथ तुलापुर की ओर चल पड़े।
रात के मध्य में, मराठा सैनिकों ने कोरेगांव पहुंचकर मुगल शिविर में प्रवेश किया। गुप्तचरों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, उन्होंने पहरेदारों को यह विश्वास दिलाया कि वे मुगल सेवा में कार्यरत मराठा सैनिक हैं। अंधेरे का फायदा उठाकर, वे औरंगजेब के मुख्य तंबू तक पहुंच गए।

और फिर जो हुआ, वह इतिहास बन गया। संताजी, बहिरजी, मालोजी और Vithoji Chavan ने तलवारों से औरंगजेब के तंबू की रस्सियां काट दीं। तंबू की सोने की कलशें (golden pinnacles) उन्होंने उखाड़ लीं। मुगल सम्राट के निजी तंबू में मौजूद सेवकों और रक्षकों को मार डाला गया।
पहले यह अफवाह फैली कि औरंगजेब भी मारा गया है। पूरे मुगल शिविर में हड़कंप मच गया। लेकिन बाद में पता चला कि औरंगजेब उस समय अपनी बेटी जेनत-उन-निस्सा के तंबू में था, इसलिए बच गया।
मुगल सैनिक जब तक समझ पाते, संताजी और Vithoji Chavan अपनी टुकड़ी के साथ औरंगजेब की सोने की कलशें लेकर सिंहगढ़ के जंगलों में पहुंच गए। सिंहगढ़ के किलेदार सिधोजी गुजर (प्रतापराव गुजर के पुत्र) ने उनका स्वागत किया और सुरक्षा प्रदान की।
यहां से संताजी कोंकण में उतरे और जुल्फिकार खान (जिसने रायगड को घेरा था) पर हमला किया। उन्होंने जुल्फिकार के पांच हाथी पकड़े और तेजी से उन्हें राजाराम महाराज के सामने प्रस्तुत किया।
यह हमला उसी स्थान पर हुआ था जहां छत्रपति संभाजी महाराज का सिर काटा गया था। संताजी और Vithoji Chavan ने अपने छत्रपति की मृत्यु का प्रतीकात्मक बदला लिया था।
राजाराम महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने इस साहसिक कार्य के लिए सभी योद्धाओं को उपाधियां प्रदान कीं:
- संताजी घोरपड़े को “मामलकत मदार” (प्रांत या देश का आधार)
- बहिरजी घोरपड़े को “हिंदूराव”
- मालोजी घोरपड़े को “अमीर-उल-उमरा”
- और Vithoji Chavan को “हिम्मत बहादुर” की उपाधि दी गई
इस उपाधि का अर्थ था – “साहस और वीरता का धनी”। यह उपाधि विठोजी के जीवन भर उनके साथ रही।
तुलापुर का यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं था। यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध था। इसने मुगल सैनिकों में भय पैदा किया और मराठों में नया जोश भरा। मुगल इतिहासकार खफी खान (मोहम्मद हाशिम) ने अपने इतिहास ग्रंथ में लिखा है कि संताजी का नाम सुनते ही मुगल सैनिक कांप जाते थे। जो भी मुगल योद्धा संताजी का सामना करता, वह या तो मारा जाता या पकड़ा जाता।
Vithoji Chavan ने इस पूरे अभियान में संताजी का साथ दिया था। उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, और इसी कारण उन्हें “हिम्मत बहादुर” की उपाधि से सम्मानित किया गया। यह उपाधि उनकी वीरता का प्रमाण थी।
🛡️ हिम्मत बहादुर की उपाधि और राजाराम महाराज की सेवा (1689-1696)
तुलापुर के साहसिक हमले के बाद Vithoji Chavan को “हिम्मत बहादुर” की उपाधि प्राप्त हुई। यह उपाधि केवल एक सम्मान नहीं थी – यह विठोजी के साहस, निष्ठा और युद्ध कौशल की पहचान थी। राजाराम महाराज ने इस उपाधि के साथ विठोजी को विशेष जिम्मेदारियां भी सौंपीं।
तुलापुर के हमले के बाद, मराठा साम्राज्य में नई ऊर्जा का संचार हुआ। लेकिन औरंगजेब का दबाव भी बढ़ता जा रहा था। सितंबर 1689 में, संताजी और धनाजी ने मिलकर औरंगजेब के सेनापति शेख निजाम पर हमला किया, जिसने पन्हाला किले को घेर रखा था। निजाम की सेना को बुरी तरह हराया गया और उसके खजाने, घोड़े और हाथी पकड़ लिए गए।
इसके बाद 1689-1690 की अवधि में, संताजी और धनाजी को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई – मुगल सेना को महाराष्ट्र से कर्नाटक में प्रवेश करने से रोकना, जब राजाराम महाराज जिंजी (तमिलनाडु) की ओर पलायन कर रहे थे। संताजी और धनाजी ने इस कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया। उन्होंने मुगल सेना को निरंतर छापामार युद्ध में उलझाए रखा।
25 मई 1690 को, रामचंद्रपंत अमात्य, शंकराजी नारायण सचिव, संताजी और धनाजी ने मिलकर मुगल सरदार सर्जखान (उर्फ रुस्तमखान) को सातारा के पास बुरी तरह हराया और उसे पकड़ लिया। यह औरंगजेब के लिए एक बड़ा झटका था।
दिसंबर 1690 में, संताजी और धनाजी को मराठा साम्राज्य के प्रमुख सेनापतियों के रूप में पदोन्नत किया गया। संताजी को रामचंद्रपंत अमात्य के पर्यवेक्षण में और धनाजी को शंकराजी नारायण सचिव के पर्यवेक्षण में रखा गया।
इस पूरे दौर में, Vithoji Chavan रामचंद्रपंत अमात्य की सेवा में थे। रामचंद्रपंत अमात्य मराठा प्रशासन के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक थे। वे छत्रपति राजाराम महाराज के प्रमुख सलाहकार थे और मराठा साम्राज्य की नीतियां बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
Vithoji Chavan ने रामचंद्रपंत के अधीन कई महत्वपूर्ण अभियानों में भाग लिया। हालांकि इतिहास में प्रत्येक युद्ध का विवरण उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट है कि Vithoji Chavan एक विश्वसनीय और साहसी योद्धा के रूप में पहचाने जाते थे।
1690-1696 की अवधि मराठा साम्राज्य के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी। राजाराम महाराज जिंजी किले में थे, और महाराष्ट्र में रामचंद्रपंत अमात्य और शंकराजी नारायण सचिव प्रशासन संभाल रहे थे। संताजी और धनाजी निरंतर मुगल सेना से लड़ रहे थे। इस पूरे दौर में, Vithoji Chavan जैसे योद्धाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संताजी घोरपड़े का सैन्य कौशल अद्वितीय था। वे तेज गति से हमला करते, मुगल शिविरों को लूटते और गायब हो जाते। इटालियन यात्री मिनुच्ची ने मुगल दरबार में मराठा हमलों का विवरण दिया है। उन्होंने लिखा कि मुगल सैनिकों और शिविर में रहने वाले लोगों में हमेशा मराठा खतरे का भय बना रहता था।

20 नवंबर 1695 को, संताजी ने औरंगजेब के शक्तिशाली सेनापति कासिम खान को चित्रदुर्ग के पास दोडेरी में हराया और मार डाला। फरवरी 1696 में, संताजी ने मुगल सेनापति हिम्मत खान को बसवापत्तन के पास हराया और मार डाला।
लेकिन 1696 में, संताजी और राजाराम महाराज के बीच कुछ मतभेद हो गए। 8 मई 1696 को, जब संताजी जिंजी किले में राजाराम से मिले, तो कुछ मुद्दों पर बहस हुई और संताजी बिना मतभेद मिटाए वहां से चले गए। राजाराम ने धनाजी को आदेश दिया कि वे संताजी पर हमला करें। जून 1696 में, धनाजी ने वृद्धाचलम के पास संताजी पर हमला किया, लेकिन पीछे हटना पड़ा। इसके बाद संताजी को आधिकारिक रूप से पद से हटा दिया गया और उनकी जिम्मेदारियां फिर से धनाजी को दे दी गईं।
यह मराठा इतिहास का एक दुखद अध्याय था। 1697 में, नागोजी माने नामक एक मराठा सरदार, जिसे औरंगजेब ने लुभाया था, ने करखला के जंगल में ध्यान करते हुए संताजी की हत्या कर दी। यह मराठा साम्राज्य के लिए एक बड़ी क्षति थी।
संताजी की मृत्यु के बाद भी, Vithoji Chavan रामचंद्रपंत अमात्य की सेवा में बने रहे। वे अब एक अनुभवी योद्धा थे, जिन्होंने कई युद्ध देखे थे और “हिम्मत बहादुर” की उपाधि को सही साबित किया था।
राजाराम महाराज का ध्यान अब मराठा सेना को एकजुट करने और मुगलों को खदेड़ने पर केंद्रित था।
Vithoji Chavan इस पूरी अवधि में रामचंद्रपंत के साथ रहे। उनकी निष्ठा और साहस निर्विवाद था। “हिम्मत बहादुर” की उपाधि उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई थी। हर युद्ध में, हर चुनौती में, विठोजी ने अपनी वीरता का परिचय दिया।
यह दौर Vithoji Chavan के जीवन का स्वर्णिम काल था – जब वे एक प्रतिष्ठित योद्धा के रूप में पहचाने जाते थे और मराठा साम्राज्य की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर रहे थे।
⚡कर्नाटक युद्ध और महानगर में अंतिम लड़ाई (1696)
1695-1696 का दौर मराठा साम्राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। राजाराम महाराज जिंजी में अपना दरबार चला रहे थे और मराठा सेना पुनर्गठित हो रही थी। मुगलों के खिलाफ संघर्ष जारी था, और मराठे अधिक संगठित और मजबूत हो रहे थे।
इसी दौरान, मराठा साम्राज्य ने कर्नाटक क्षेत्र (वर्तमान कर्नाटक) में अपना प्रभाव बढ़ाने की योजना बनाई। कर्नाटक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था – यहां से दक्षिण भारत के समृद्ध क्षेत्रों तक पहुंच थी, और मुगल भी इस क्षेत्र पर नियंत्रण चाहते थे।
रामचंद्रपंत अमात्य को कर्नाटक अभियान की जिम्मेदारी दी गई। और स्वाभाविक रूप से, Vithoji Chavan “हिम्मत बहादुर” को भी इस अभियान में शामिल किया गया। विठोजी रामचंद्रपंत के सबसे विश्वसनीय योद्धाओं में से एक थे।
1696 की शुरुआत में, मराठा सेना कर्नाटक की ओर बढ़ी। उनका लक्ष्य था महानगर (जिसे आज बेंगलुरु के नाम से जाना जाता है)। महानगर उस समय एक महत्वपूर्ण नगर था और वहां मुगल तथा स्थानीय शक्तियों का नियंत्रण था।
कर्नाटक अभियान आसान नहीं था। यह क्षेत्र पहाड़ी, जंगली और अपरिचित था। मराठा सेना को न केवल मुगल सेना से लड़ना था, बल्कि स्थानीय शासकों से भी निपटना था। इस अभियान में कई छोटे-बड़े युद्ध हुए।
25 मई 1696 का दिन। महानगर (बेंगलुरु) के निकट एक भीषण युद्ध छिड़ा। मराठा सेना और विरोधी सेनाओं के बीच घमासान लड़ाई हुई। यह युद्ध कर्नाटक अभियान का एक निर्णायक मोड़ था।
इसी युद्ध में, Vithoji Chavan “हिम्मत बहादुर” ने अपनी अंतिम लड़ाई लड़ी।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, 25 मई 1696 को महानगर (बेंगलुरु) के निकट कर्नाटक युद्ध के दौरान Vithoji Chavan वीरगति को प्राप्त हुए।
Vithoji Chavan ने अपना पूरा जीवन मराठा साम्राज्य की सेवा में समर्पित कर दिया। एक अनाथ बच्चे से लेकर “हिम्मत बहादुर” बनने तक की यात्रा में, उन्होंने अनगिनत युद्ध लड़े, अपार साहस दिखाया और अंत तक अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते रहे।
विठोजी की मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए एक बड़ी क्षति थी। वे न केवल एक कुशल योद्धा थे, बल्कि एक विश्वसनीय सेनानायक भी थे। उनकी वीरता और निष्ठा ने उन्हें अमर बना दिया।
विठोजी की मृत्यु के बाद, रामचंद्रपंत अमात्य ने उनके पुत्र उदाजी चव्हाण को “हिम्मत बहादुर” की उपाधि के साथ प्रोटोकॉल वस्त्र प्रदान किए। यह मराठा परंपरा का हिस्सा था – एक वीर योद्धा की मृत्यु के बाद, उसकी उपाधि और जिम्मेदारियां उसके पुत्र को दी जाती थीं।
रामचंद्रपंत ने उदाजी को निम्नलिखित प्रदान किए:
- बीजापुर तहसील
- मंगुट्टी स्टेशन सहित अठारह परगने
- शिरोल और रायबाग जैसे जागीर क्षेत्र
यह प्रावधान Vithoji Chavan की सेवाओं का सम्मान था और साथ ही यह सुनिश्चित करता था कि उनका परिवार आर्थिक रूप से सुरक्षित रहे।
Vithoji Chavan की मृत्यु के साथ, एक युग समाप्त हुआ। लेकिन उनकी वीरता की कहानियां मराठा सेना में प्रेरणा का स्रोत बनीं। “हिम्मत बहादुर” सिर्फ एक उपाधि नहीं थी – यह Vithoji Chavan के साहस, निष्ठा और बलिदान का प्रतीक थी।
25 मई 1696 – यह तारीख इतिहास में दर्ज हो गई, जब एक महान योद्धा ने अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
👑 उदाजी चव्हाण – विठोजी के पुत्र की विरासत और संघर्ष
Vithoji Chavan की मृत्यु के बाद, उनके पुत्र उदाजी चव्हाण को “हिम्मत बहादुर” की उपाधि विरासत में मिली। लेकिन उदाजी की कहानी उनके पिता से बिलकुल अलग थी। जहां Vithoji Chavan एक वफादार और साहसी योद्धा थे, वहीं उदाजी का जीवन राजनीतिक उथल-पुथल और संघर्षों से भरा था।
रामचंद्रपंत अमात्य ने उदाजी को Vithoji Chavan की उपाधि और जागीरें देकर सम्मानित किया। प्रारंभ में, उदाजी ने रामचंद्रपंत की सेवा की और मराठा साम्राज्य के प्रति वफादार रहे।
लेकिन Vithoji Chavan की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद, 3 मार्च 1700 को छत्रपति राजाराम महाराज की मृत्यु हो गई। उनके बाद, उनके पुत्र शिवाजी द्वितीय छत्रपति बने, लेकिन चूंकि वे नाबालिग थे, इसलिए उनकी मां ताराबाई ने रीजेंट के रूप में शासन संभाला।
इसी समय से मराठा साम्राज्य में आंतरिक राजनीतिक संघर्ष शुरू हो गया। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, मुगल साम्राज्य कमजोर हो गया और मुगलों ने छत्रपति संभाजी के पुत्र शाहू महाराज को रिहा कर दिया। शाहू 1689 से मुगल कैद में थे।
शाहू महाराज वापस आए और उन्होंने छत्रपति का दावा किया। इससे मराठा साम्राज्य दो गुटों में बंट गया – एक ताराबाई और शिवाजी द्वितीय का समर्थन करता था, और दूसरा शाहू महाराज का।
उदाजी चव्हाण ने प्रारंभ में ताराबाई का पक्ष लिया। दामाजी थोरात की तरह, उदाजी भी ताराबाई की ओर से शाहू महाराज के खिलाफ संघर्ष में शामिल हो गए। यह मराठा इतिहास का एक दुखद अध्याय था जब योद्धा एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे थे।
10 फरवरी 1716 को, बालाजी विश्वनाथ (पहले पेशवा) ने शाहू महाराज को एक पत्र लिखा: “स्वामी की आज्ञापत्र प्राप्त हुई। आपने भोज्जी पाटिल को रिहा करने का आदेश दिया है। लेकिन येसजी थोरात, Vithoji Chavan और भोज्जी पाटिल – सभी विश्वासघाती हैं। यह सिद्ध हो चुका है और इसलिए उन्हें गिरफ्तार करके दंडित किया गया है।”
यह पत्र दर्शाता है कि उदाजी चव्हाण शाहू के खिलाफ विद्रोह में शामिल थे। लेकिन यहां एक भ्रम है – पत्र में “Vithoji Chavan” का उल्लेख है, जबकि 1716 में Vithoji Chavan की मृत्यु के 17 वर्ष हो चुके थे। संभवतः यह उदाजी चव्हाण का ही संदर्भ है, या फिर उदाजी के पुत्र विठोजी का।
चव्हाण परिवार लगभग साठ वर्षों तक मराठा राजनीति में सक्रिय रहा और तीन पेशवाओं को परेशानी में डाला। उदाजी की स्वाभाविक झुकाव संभाजी द्वितीय (ताराबाई के पुत्र) की ओर थी, और उन्होंने प्रारंभ में रामचंद्रपंत की बहुत मदद की।
बाजीराव पेशवा ने उदाजी को कुछ समय के लिए नियंत्रण में रखा। उदाजी ने शाहू को मारने के लिए हत्यारे भी भेजे थे। बाद में, जब वे निजाम के साथ जुड़ गए, तो 1737 में शाहू ने प्रतिनिधि को भेजा और उनके मुख्य स्टेशन अठनी पर कब्जा कर लिया।

8 नवंबर 1739 को, प्रतिनिधि ने चव्हाणों के अठनी स्टेशन पर कब्जा किया और आधी रात को महाराज का झंडा वहां फहराया। इसके बाद भी, चव्हाण ने समय-समय पर शाहू को परेशान करना जारी रखा।
1748 में, शाहू ने त्रिंबकराव सोमवंशी को आदेश दिया कि वे चव्हाण मामले को स्थायी रूप से निपटाएं। शाहू के बाद, नानासाहेब पेशवा ने 1751 में चतुराई से उदाजी को मुगलों को छोड़ने, उनके साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया और उन्हें दिगराज में प्रोटोकॉल कार्यालय के साथ रखा। लेकिन उदाजी अपने जीवनकाल में कभी भी अपनी उद्दंड प्रकृति से मुक्त नहीं हुए।
1752-53 में, नानासाहेब को खुद उनके खिलाफ अभियान चलाना पड़ा। एक बार उदाजी गोवा के खिलाफ अभियान पर गए। उस समय, उनके घोड़े को गोली लगी और वह बिगड़ गया। उदाजी का पैर रकाब में फंस गया, वे गिर गए, उनका सिर एक पत्थर से टकराया और 24 नवंबर 1762 को उनकी मृत्यु हो गई।
उदाजी के पुत्रों में से एक, विठोजी दिगराज में रहे, जबकि दूसरे प्रीतिराव ने करवीर सीट पर छत्रपति शिवाजी महाराज (शाहू के उत्तराधिकारी) की सेवा की।
चव्हाण परिवार बाद में सांगली प्रांत में दिगराजकर चव्हाण के नाम से रहने लगे। यह परिवार विठोजी चव्हाण द्वारा स्थापित किया गया था, जिन्होंने मालोजी घोरपड़े की सेवा की थी।
उदाजी की कहानी जटिल है – वे एक साहसी योद्धा थे, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल में फंस गए। उन्होंने कभी शाहू का पक्ष लिया, कभी ताराबाई का, कभी निजाम का। उनकी वफादारी बदलती रही, और इसने उन्हें विवादास्पद बना दिया।
लेकिन यह भी सच है कि उस समय का राजनीतिक परिदृश्य बेहद जटिल था। मराठा साम्राज्य दो गुटों में बंटा था, और कई योद्धाओं को कठिन चुनाव करने पड़े।
Vithoji Chavan की विरासत उनके पुत्र उदाजी के माध्यम से जारी रही, और चव्हाण परिवार मराठा राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा।
🏰 चव्हाण परिवार का योगदान और मराठा इतिहास में स्थान
Vithoji Chavan और उनके परिवार ने मराठा साम्राज्य के निर्माण और विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। चव्हाण परिवार मराठा कुलों में से एक प्रतिष्ठित परिवार था, जिसने पीढ़ियों तक मराठा शासकों की सेवा की।
रणोजी चव्हाण (विठोजी के पिता) से शुरू होकर, यह परिवार मालोजी घोरपड़े के साथ जुड़ा था। घोरपड़े परिवार भोसले वंश की एक शाखा थी और छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से ही प्रभावशाली थी।
Vithoji Chavan का पालन-पोषण मालोजी घोरपड़े के घर में हुआ, और उन्होंने संताजी घोरपड़े के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े। तुलापुर का हमला (1689) चव्हाण परिवार के इतिहास में सबसे गौरवशाली घटना थी।
“हिम्मत बहादुर” की उपाधि चव्हाण परिवार की पहचान बन गई। यह उपाधि Vithoji Chavan को मिली, फिर उनके पुत्र उदाजी को, और यह परिवार की विरासत का हिस्सा बनी।
चव्हाण परिवार को बीजापुर तहसील, अठारह परगने, मंगुट्टी स्टेशन, शिरोल, रायबाग जैसे जागीर क्षेत्र प्रदान किए गए। यह प्रावधान विठोजी की सेवाओं का सम्मान था और परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता था।
18वीं शताब्दी में, जब मराठा साम्राज्य आंतरिक संघर्षों से गुजर रहा था, चव्हाण परिवार भी राजनीतिक उथल-पुथल में फंसा। उदाजी चव्हाण की कहानी इस जटिलता का प्रतीक है। वे एक साहसी योद्धा थे, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें विवादास्पद बना दिया।

फिर भी, चव्हाण परिवार ने मराठा साम्राज्य में अपनी पहचान बनाए रखी। वे दिगराजकर चव्हाण के नाम से सांगली प्रांत में बसे। यह परिवार आज भी महाराष्ट्र में मौजूद है और अपने पूर्वजों की विरासत को संजोए हुए है।
मराठा इतिहास में चव्हाण परिवार का स्थान:
- सैन्य योगदान: Vithoji Chavan ने तुलापुर के हमले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो मराठा मनोबल को फिर से जगाने में सहायक था।
- वफादारी: Vithoji Chavan ने अपना पूरा जीवन मराठा साम्राज्य की सेवा में समर्पित किया और 1699 में कर्नाटक युद्ध में वीरगति प्राप्त की।
- राजनीतिक प्रभाव: चव्हाण परिवार 18वीं शताब्दी की मराठा राजनीति में सक्रिय रहा। हालांकि उदाजी की वफादारी बदलती रही, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि परिवार राजनीतिक रूप से प्रभावशाली था।
- भूमि अनुदान: चव्हाण परिवार को प्रदान की गई जागीरें और परगने उनके योगदान का सम्मान थीं।
- परिवार की निरंतरता: चव्हाण परिवार पीढ़ियों तक मराठा राजनीति और सेना में सक्रिय रहा।
तुलना:
Vithoji Chavan की तुलना अन्य समकालीन मराठा योद्धाओं से की जा सकती है:
- तानाजी मालुसरे: सिंहगढ़ के युद्ध में शहीद हुए। “गड आला पण सिंह गेला” (किला तो मिला, लेकिन शेर चला गया) – यह उनके बलिदान का प्रतीक है।
- येसाजी कंक: जिन्होंने राजाराम महाराज को रायगड से सुरक्षित निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- बाजी प्रभु देशपांडे: पवन खिंड की लड़ाई में शहीद हुए और शिवाजी महाराज को बचाया।
Vithoji Chavan इन सभी योद्धाओं की तरह एक निःस्वार्थ और साहसी योद्धा थे। उनका योगदान भले ही तानाजी या बाजी प्रभु जितना प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण था।
आधुनिक समय में चव्हाण परिवार:
चव्हाण परिवार के वंशज आज भी महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में मौजूद हैं। दिगराज, सांगली, कोल्हापुर,सोलापूर,नळदुर्ग क्षेत्रों में चव्हाण परिवार के लोग रहते हैं। वे अपने पूर्वजों की विरासत को गर्व से याद करते हैं।
Vithoji Chavan की कहानी प्रेरणादायक है – एक अनाथ बच्चे से “हिम्मत बहादुर” बनने तक की यात्रा, मराठा साम्राज्य के लिए निःस्वार्थ सेवा, और अंततः मातृभूमि के लिए बलिदान।
चव्हाण परिवार ने मराठा इतिहास में अपनी जगह पक्की की है, और Vithoji Chavan का नाम हमेशा “हिम्मत बहादुर” के रूप में याद किया जाएगा।
📚 ऐतिहासिक महत्व और विरासत – विठोजी चव्हाण की अमर कहानी
Vithoji Chavan की कहानी केवल एक योद्धा की कहानी नहीं है – यह मराठा संस्कृति, मूल्यों और साहस का प्रतीक है। उनका जीवन हमें कई महत्वपूर्ण सबक सिखाता है।
1. अनाथ से योद्धा – जीवन के संघर्ष:
Vithoji Chavan का जीवन हमें बताता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ संकल्प और साहस से कोई भी व्यक्ति महानता हासिल कर सकता है। पिता की मृत्यु के बाद अनाथ हुए विठोजी ने हार नहीं मानी, बल्कि मालोजी घोरपड़े के संरक्षण में प्रशिक्षण लिया और एक महान योद्धा बने।
2. वफादारी और निष्ठा:
Vithoji Chavan ने अपना पूरा जीवन मराठा साम्राज्य की सेवा में समर्पित किया। तुलापुर के हमले से लेकर कर्नाटक युद्ध तक, उन्होंने कभी भी अपनी वफादारी नहीं बदली। यह निष्ठा मराठा संस्कृति की नींव थी।
3. साहस और पराक्रम:
“हिम्मत बहादुर” की उपाधि विठोजी के अपार साहस का प्रमाण थी। औरंगजेब के शिविर पर हमला करना – जो उस समय दुनिया के सबसे शक्तिशाली सम्राट था – अकल्पनीय साहस था। लेकिन विठोजी और संताजी ने यह कर दिखाया।
4. भाईचारा और सहयोग:
Vithoji Chavan और संताजी घोरपड़े का रिश्ता खून के रिश्ते से परे था। यह मराठा संस्कृति का सुंदर उदाहरण है, जहां योद्धा एक-दूसरे को परिवार मानते थे। मालोजी घोरपड़े ने विठोजी को अपने बच्चे की तरह पाला – यह मराठा मूल्यों का प्रतीक है।

5. बलिदान:
22 मई 1699 को महानगर (बेंगलुरु) में Vithoji Chavan ने अपनी मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। यह अंतिम बलिदान उनकी वीरता का सर्वोच्च प्रमाण है।
ऐतिहासिक दस्तावेज और संदर्भ:
Vithoji Chavan का उल्लेख निम्नलिखित ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है:
- NDHistories वेबसाइट: यह वेबसाइट मराठा इतिहास पर विस्तृत शोध प्रदान करती है। विठोजी चव्हाण का विस्तृत विवरण यहां उपलब्ध है।
- DNA India (2017): “The Pinnacles of Maratha Attack” – इस लेख में तुलापुर के हमले का विस्तृत विवरण है।
- Alchetron और Academic Encyclopedia: संताजी घोरपड़े पर लेखों में विठोजी का उल्लेख है।
- Kids Kiddle – Rajaram I: राजाराम महाराज के जीवन पर लेख में विठोजी को “हिम्मत बहादुर” उपाधि मिलने का उल्लेख है।
तुलापुर हमले का महत्व:
तुलापुर का हमला मराठा इतिहास की सबसे साहसिक घटनाओं में से एक है। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है:
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव: संभाजी महाराज की मृत्यु के बाद मराठों का मनोबल गिर गया था। तुलापुर के हमले ने यह संदेश दिया कि मराठे अभी भी लड़ने के लिए तैयार हैं।
- औरंगजेब को झटका: यह हमला औरंगजेब के अभियान को एक बड़ा झटका था। उसे एहसास हुआ कि मराठों को कुचलना आसान नहीं होगा।
- गुरिल्ला युद्ध का उदाहरण: यह हमला मराठा गुरिल्ला युद्ध तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण था।
Vithoji Chavan की विरासत:
आज, Vithoji Chavan को याद करना महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- प्रेरणा: उनकी कहानी आज की युवा पीढ़ी को प्रेरित करती है कि साहस और निष्ठा से कोई भी बाधा पार की जा सकती है।
- मराठा इतिहास का हिस्सा: विठोजी मराठा साम्राज्य के निर्माण में योगदान देने वाले अनगिनत योद्धाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें याद करना पूरे मराठा इतिहास को सम्मान देना है।
- भूली हुई कहानियां: विठोजी की कहानी अक्सर इतिहास की किताबों में नहीं मिलती। उन्हें याद करना उन सभी अज्ञात योद्धाओं को श्रद्धांजलि है जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया।
- मूल्य और संस्कृति: विठोजी का जीवन मराठा मूल्यों – वफादारी, साहस, भाईचारा – का जीवंत उदाहरण है।
आधुनिक प्रासंगिकता:
21वीं सदी में, जब हम अपने इतिहास को भूलते जा रहे हैं, Vithoji Chavanजैसे योद्धाओं को याद करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उनकी कहानी हमें सिखाती है:
- संघर्ष से सफलता: परिस्थितियां कठिन हों, तो भी हार नहीं माननी चाहिए।
- वफादारी: अपने सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति वफादार रहना चाहिए।
- साहस: सही के लिए लड़ने से कभी नहीं डरना चाहिए।
- बलिदान: कभी-कभी बड़े लक्ष्यों के लिए व्यक्तिगत बलिदान आवश्यक होता है।
Vithoji Chavan “हिम्मत बहादुर” का जीवन एक प्रेरक गाथा है। यह कहानी हमें बताती है कि महानता किसी की जन्मसिद्ध नहीं होती – यह कठिन परिश्रम, साहस और निष्ठा से अर्जित की जाती है।
उनकी स्मृति में:
महाराष्ट्र में कई स्थानों पर मराठा योद्धाओं की स्मृति में स्मारक और संग्रहालय हैं। Vithoji Chavan जैसे योद्धाओं की कहानियां इन स्थानों पर सुनाई जानी चाहिए। उनकी विरासत को संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है।
Vithoji Chavan की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। यह कहानी हर उस व्यक्ति में जीवित है जो कठिनाइयों के बावजूद अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है, जो अपने सिद्धांतों के लिए खड़ा होता है, और जो अपनी मातृभूमि से प्रेम करता है।
“हिम्मत बहादुर” – यह सिर्फ एक उपाधि नहीं, यह एक जीवन शैली है।
🎯 निष्कर्ष: Vithoji Chavan – एक अमर प्रेरणा
Vithoji Chavan की कहानी मराठा इतिहास के सबसे प्रेरक अध्यायों में से एक है। एक अनाथ बच्चे से लेकर “हिम्मत बहादुर” बनने तक की यात्रा – यह केवल एक व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि मराठा संस्कृति, मूल्यों और साहस का जीवंत प्रमाण है।
हमने इस ब्लॉग में Vithoji Chavan के जीवन के विभिन्न पहलुओं को देखा:
- प्रारंभिक जीवन: पिता रणोजी चव्हाण की मृत्यु के बाद मालोजी घोरपड़े द्वारा पालन-पोषण
- तुलापुर का ऐतिहासिक हमला: औरंगजेब के शिविर पर साहसिक धावा (1689)
- हिम्मत बहादुर की उपाधि: राजाराम महाराज द्वारा प्रदत्त सम्मान

- कर्नाटक युद्ध: महानगर (बेंगलुरु) के निकट अंतिम लड़ाई (25 मई 1696)
- उदाजी चव्हाण: विठोजी के पुत्र की विरासत और संघर्ष
- चव्हाण परिवार का योगदान: मराठा इतिहास में स्थान
- ऐतिहासिक महत्व: विरासत और प्रेरणा
Vithoji Chavan का जीवन हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:
साहस कभी नहीं मरता: तुलापुर के हमले में दिखाया गया साहस आज भी प्रासंगिक है। जीवन में कितनी भी कठिनाइयां हों, साहस के साथ उनका सामना करना ही सच्ची वीरता है।
वफादारी अमूल्य है: Vithoji Chavan ने अपना पूरा जीवन मराठा साम्राज्य की सेवा में समर्पित किया। इस निष्ठा ने उन्हें अमर बना दिया।
परिस्थितियां हमें परिभाषित नहीं करतीं: अनाथ होने के बावजूद, Vithoji Chavan ने एक महान योद्धा बनने का सपना पूरा किया। यह हमें सिखाता है कि हमारे जन्म या परिस्थितियां हमारी नियति नहीं हैं।
बलिदान सर्वोच्च सेवा है: 22 मई 1699 को अपनी मातृभूमि के लिए विठोजी का बलिदान उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
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