Early Life of Raja Bhoja: कैसे बना मालवा का भावी विद्वान राजा
— HistoryVerse7 | क्लस्टर लेख |
धारानगरी। रात का अंतिम पहर। महल के भीतरी कक्ष में एक दीपक कांप रहा था। बाहर पहरेदारों के भारी कदमों की आहट थी और भीतर — एक बालक की आँखें ग्रंथ पर टिकी थीं। वह बालक जो कभी रात को नींद से जागकर गणित के प्रश्न सुलझाता, कभी आचार्य के जाने के बाद भी श्लोक दोहराता रहता। उसके आसपास राजनीति की चालें थीं, शत्रुओं की तलवारें थीं, उत्तराधिकार की अनिश्चितताएँ थीं — फिर भी उसकी उंगलियाँ ताड़पत्र पर फिरती रहतीं। उस बालक का नाम था — भोज।

यह कहानी है उस भोज की — जो राजा बनने से पहले एक शिष्य था, एक जिज्ञासु था, एक ऐसा युवक था जिसने अपने बचपन में ही तय कर लिया था कि वह केवल राज्य नहीं, एक सभ्यता बनाएगा।
युवा राजा भोज कौन थे?
Raja Bhoja का नाम सुनते ही मन में एक प्रौढ़, प्रतापी, विद्वान शासक की छवि उभरती है। परंतु वह महानता किसी एक दिन में नहीं बनी। उनके बचपन को समझे बिना उनकी उपलब्धियों की गहराई को पूरी तरह नहीं जाना जा सकता।
परमार वंश के राजकुमार के रूप में जन्मे भोज ने अपने शैशव और बाल्यावस्था में वह सब देखा, सुना और सीखा जो आगे चलकर उन्हें ‘विद्वान राजा’ बनाने वाला था। धारानगरी का राजमहल, वहाँ के विद्वत् दरबार, आचार्यों की शिक्षाएँ, और साथ ही राजनीतिक उथल-पुथल — इन सबने मिलकर भोज को गढ़ा।

इतिहासकार आर. सी. मजूमदार और उपिंदर सिंह दोनों इस बात पर सहमत हैं कि भोज का व्यक्तित्व असाधारण रूप से बहुआयामी था। यह बहुआयामीपन उनके प्रारंभिक जीवन की उस शिक्षा और उन अनुभवों का परिणाम था जो उन्होंने राजकुमार के रूप में ग्रहण किए।
भोज के बचपन में मालवा की राजनीतिक स्थिति
दसवीं शताब्दी के अंत और ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ का मालवा — जहाँ भोज का बचपन बीता — एक ऐसा क्षेत्र था जो संभावनाओं और खतरों दोनों से भरा था। परमार राज्य अपनी सीमाओं के भीतर भले ही समृद्ध था, किंतु बाहर से अनेक शक्तियाँ उसे चुनौती दे रही थीं।
परमार राज्य: मालवा की काली मिट्टी और व्यापारिक मार्गों पर स्थिति ने इसे सदा से एक वांछित भूखंड बनाया। उज्जयिनी जैसा धार्मिक और व्यापारिक नगर, और धारानगरी जैसी सुरक्षित राजधानी — ये परमार सत्ता के दो स्तम्भ थे।
पड़ोसी राज्यों की चुनौती: दक्षिण में कल्याणी के चालुक्य सदा विस्तारवादी नीति रखते थे। पूर्व में कलचुरि शक्ति थी। पश्चिम और उत्तर से गजनवी साम्राज्य का भय था — महमूद गजनवी के आक्रमणों ने समूचे उत्तर भारत को आतंकित कर रखा था। इस भूराजनीतिक तनाव में पले-बढ़े भोज ने बचपन से ही यह समझ लिया था कि एक राजा को केवल प्रजा का पालक नहीं, बल्कि राज्य का रक्षक भी होना पड़ता है।
धारानगरी का महत्व: धार केवल एक राजधानी नहीं थी — यह एक बौद्धिक केंद्र भी था। यहाँ के दरबार में देश के कोने-कोने से विद्वान आते थे। इस वातावरण में एक जिज्ञासु बालक का पलना — यही भोज की शिक्षा का सबसे बड़ा सौभाग्य था।
राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव: भोज के बचपन में परमार वंश अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। वाक्पति मुंज की दुखद मृत्यु के बाद उनके भाई सिंधुराज ने राज्य सँभाला था। यह सत्ता-संघर्ष और उसके परिणाम भोज ने अपनी आँखों से देखे। बाद में उनकी परिपक्व राजनीतिक दृष्टि के बीज शायद इन्हीं बचपन के अनुभवों में बोए गए थे।
परमार वंश और भोज का परिवार
परमार वंश की उत्पत्ति के विषय में दो धाराएँ मिलती हैं — एक पौराणिक और एक ऐतिहासिक।
पौराणिक परंपरा: परमार स्वयं को अग्निकुल राजपूत मानते थे — आबू पर्वत पर हुए वशिष्ठ के यज्ञ से उत्पन्न। यह परंपरा उनकी दैवीय वैधता स्थापित करने के लिए प्रचलित की गई थी। ऐसी उत्पत्ति-कथाएँ मध्यकालीन राजवंशों में सामान्य थीं।
ऐतिहासिक साक्ष्य: एपिग्राफिया इंडिका में संकलित परमार अभिलेखों के अनुसार वंश की वास्तविक स्वतंत्र सत्ता उपेंद्र (कृष्णराज) से प्रारंभ हुई। वंश क्रम इस प्रकार है: उपेंद्र → वैरसिंह प्रथम → सीयक प्रथम → वाक्पति → वैरसिंह द्वितीय → सीयक द्वितीय → वाक्पति मुंज → सिंधुराज → Raja Bhoja।

सिंधुराज (Raja Bhoja के पिता): सिंधुराज एक सक्षम शासक थे जिन्होंने वाक्पति मुंज की मृत्यु के बाद राज्य को स्थिर किया। उनके विषय में ऐतिहासिक साक्ष्य सीमित हैं, किंतु यह स्पष्ट है कि उन्होंने भोज के लिए एक व्यवस्थित उत्तराधिकार सुनिश्चित किया।
माता के विषय में: Raja Bhoja की माता के नाम और परिचय के बारे में ऐतिहासिक अभिलेखों में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। परंपरागत साहित्य में कुछ नाम मिलते हैं किंतु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है।
वंश में भोज की स्थिति: Raja Bhoja परमार वंश में सिंधुराज के प्रमुख पुत्र और उत्तराधिकारी थे। वे एक ऐसे राजकुमार थे जिन्हें बचपन से ही यह बोध था कि एक दिन उन पर समूचे मालवा की जिम्मेदारी होगी।
Raja Bhoja का जन्म
Raja Bhoja के जन्म की सटीक तिथि इतिहास के पृष्ठों पर अंकित नहीं है। अधिकांश इतिहासकार उनका जन्म 990 से 1000 ई. के बीच मानते हैं।
जन्म स्थान: धारानगरी (वर्तमान धार, मध्यप्रदेश) में जन्म की संभावना सर्वाधिक मानी जाती है, यद्यपि इसका कोई प्रत्यक्ष अभिलेखीय प्रमाण नहीं है।
ऐतिहासिक साक्ष्य: Raja Bhoja के जन्म के विषय में कोई समकालीन अभिलेख उपलब्ध नहीं है। उनके शासनकाल के अभिलेख और उनके ग्रंथ ही उनके विषय में जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं।

जन्म से जुड़ी किंवदंतियाँ: ‘भोज प्रबंध’ और अन्य परवर्ती ग्रंथों में भोज के जन्म के साथ अनेक शुभ संकेतों का उल्लेख है — जैसे ज्योतिषियों का यह भविष्यवाणी करना कि यह बालक एक असाधारण राजा बनेगा। ये किंवदंतियाँ परवर्ती काल में Raja Bhoja की महानता को स्थापित करने के लिए गढ़ी गई थीं। इनके ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।
तथ्य और लोकश्रुति में अंतर: इतिहासकार डी. सी. सरकार ने स्पष्ट किया है कि मध्यकालीन भारतीय राजवंशों में शासक के जन्म को पौराणिक रूप देना एक सामान्य साहित्यिक परंपरा थी। अतः भोज के जन्म की किंवदंतियों को उनके युग की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में समझना उचित है।
Raja Bhoja का बचपन
परमार राजमहल का वातावरण एक राजकुमार के लिए अद्वितीय था। एक ओर शक्ति, वैभव और सुरक्षा — दूसरी ओर जिम्मेदारियाँ, अपेक्षाएँ और राजनीतिक जटिलताएँ।
महल का जीवन: धारानगरी का राजमहल उस समय केवल शासन का केंद्र नहीं था — यह ज्ञान और कला का भी केंद्र था। विद्वानों की आवाजाही, शास्त्रार्थों की गूँज, संगीत और नृत्य के कार्यक्रम — इस वातावरण में पले Raja Bhoja के मन पर इन सबका गहरा प्रभाव पड़ा।
ज्ञान की जिज्ञासा: परवर्ती साहित्य और उनके स्वयं के ग्रंथों की गहराई यह संकेत देती है कि Raja Bhoja एक असाधारण जिज्ञासु बालक थे। वे प्रश्न पूछते थे, उत्तर से संतुष्ट नहीं होते थे, और हर विषय को उसकी जड़ तक समझने की कोशिश करते थे।

अनुशासन और दिनचर्या: राजकुमार की दिनचर्या कठोर अनुशासन से भरी होती थी। सूर्योदय से पहले उठना, शारीरिक व्यायाम, वेद पाठ, शस्त्र अभ्यास, और फिर विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन — यह क्रम प्रतिदिन दोहराया जाता था।
व्यक्तित्व की झलक: बाद के जीवन में Raja Bhoja ने जिस संयम, गहराई और विविधता का परिचय दिया — उसकी नींव इसी बचपन में रखी गई थी। एक ऐसा बालक जो तलवार और कलम दोनों को समान श्रद्धा से देखता था।
शिक्षा और बौद्धिक प्रशिक्षण
Raja Bhoja की शिक्षा — जैसा कि उनके ग्रंथों की विषय-विविधता से स्पष्ट है — असाधारण रूप से व्यापक थी। वे केवल एक विषय के विशेषज्ञ नहीं थे; वे एक सार्वभौम विद्वान थे।
संस्कृत और व्याकरण: संस्कृत भाषा की गहन शिक्षा किसी भी उच्चकुलीन राजकुमार के लिए अनिवार्य थी। भोज ने न केवल संस्कृत सीखी, बल्कि उन्होंने ‘सरस्वतीकंठाभरण’ जैसा व्याकरण ग्रंथ भी रचा — जो उनकी भाषाई गहराई का प्रमाण है।
दर्शन: वेदांत, सांख्य, न्याय, और विशेषतः शैव दर्शन में भोज की रुचि गहरी थी। उनके ‘तत्त्वप्रकाश’ और ‘राजमार्तण्ड’ ग्रंथ इस बात के साक्षी हैं।
राजनीतिशास्त्र: कौटिल्य के अर्थशास्त्र की परंपरा में राजनीति की शिक्षा प्रत्येक राजकुमार को दी जाती थी। दंड, साम, दाम, भेद — नीति के इन चारों अंगों का व्यावहारिक बोध भोज को बचपन से ही दिया गया।

गणित और खगोलशास्त्र: मालवा ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य की परंपरा का क्षेत्र था। यहाँ गणित और ज्योतिष की उन्नत शिक्षा उपलब्ध थी। भोज के ग्रंथ ‘राजमृगांक’ में खगोलीय गणनाओं का वर्णन इस शिक्षा की गहराई को दर्शाता है।
आयुर्वेद: चिकित्साशास्त्र में Raja Bhoja की रुचि उनके ‘आयुर्वेदसर्वस्व’ ग्रंथ में प्रकट होती है। एक राजा के लिए अपनी प्रजा के स्वास्थ्य की जानकारी रखना भी एक आवश्यक गुण माना जाता था।
वास्तुशास्त्र और अभियांत्रिकी: यह शायद Raja Bhoja का सबसे प्रिय विषय था। ‘समरांगणसूत्रधार’ — उनका सबसे विशाल और प्रसिद्ध ग्रंथ — वास्तुशास्त्र पर है। नगर निर्माण, मंदिर स्थापत्य, जल-अभियांत्रिकी और युद्ध यंत्र — सब इसमें समाहित हैं।
शिक्षा का प्रभाव: इन सभी विषयों की समग्र शिक्षा ने भोज को एक ऐसा राजा बनाया जो न केवल युद्धभूमि में, बल्कि विद्वत् सभा में भी समान रूप से सक्षम था। उनकी शिक्षा ने उन्हें यह विश्वास दिया कि ज्ञान और शासन परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं।
सैन्य प्रशिक्षण
परमार राजकुमार के लिए सैन्य प्रशिक्षण उतना ही अनिवार्य था जितना शास्त्र-अध्ययन। Raja Bhoja ने शस्त्र विद्या में भी पूर्ण दक्षता प्राप्त की।
अश्वारोहण: घुड़सवारी राजपूत परंपरा का अभिन्न अंग थी। Raja Bhoja ने युवावस्था में ही उत्तम अश्वारोहण कौशल अर्जित किया। बाद में उनके सैन्य अभियानों में घुड़सवार सेना की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
तलवारबाजी और धनुर्विद्या: युद्ध की दोनों प्रमुख विधाओं में प्रशिक्षण दिया जाता था। धनुर्विद्या में सटीकता और तलवारबाजी में चपलता — दोनों पर समान ध्यान दिया जाता था।
गज-युद्ध: हाथियों पर युद्ध करना मध्यकालीन भारत में एक उच्च कौशल था। परमार सेना में हस्ति-सेना का महत्वपूर्ण स्थान था। भोज को इस विद्या में भी प्रशिक्षित किया गया।

रणनीतिक शिक्षा: केवल व्यक्तिगत युद्ध-कौशल नहीं, बल्कि सेना के व्यूह-रचना, रसद प्रबंधन और किला-रक्षा की शिक्षा भी दी जाती थी। यही कारण है कि Raja Bhoja ने अपने ‘समरांगणसूत्रधार’ में युद्ध-यंत्रों और किला-निर्माण का इतना विस्तृत वर्णन किया।
नेतृत्व प्रशिक्षण: सैनिकों के साथ व्यवहार, उनका मनोबल बनाए रखना, और युद्ध में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता — ये गुण भी प्रशिक्षण का हिस्सा थे।
गुरु और शिक्षक
Raja Bhoja के शिक्षकों के बारे में ऐतिहासिक जानकारी सीमित है। कोई समकालीन अभिलेख उनके गुरुओं के नाम नहीं बताता। परंतु परवर्ती साहित्य और परंपरागत ग्रंथों में कुछ संकेत अवश्य मिलते हैं।
दरबारी विद्वान: परमार दरबार में सदा विद्वानों का समादर था। Raja Bhoja के पिता सिंधुराज और उनके पूर्ववर्ती मुंज के दरबार में उच्चकोटि के विद्वान थे। इन विद्वानों ने भोज की प्रारंभिक बौद्धिक जिज्ञासा को दिशा दी होगी।
ऐतिहासिक साक्ष्य और परंपरा में अंतर: ‘भोज-प्रबंध’ जैसे परवर्ती ग्रंथों में भोज के साथ कालिदास, दण्डी जैसे महाकवियों की उपस्थिति का उल्लेख है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से असंभव है — ये कवि भोज से शताब्दियों पूर्व हुए थे। ये उल्लेख भोज की महानता को स्थापित करने के लिए परवर्ती काल में जोड़े गए।

व्यावहारिक गुरु: सबसे संभावित शिक्षक वे दरबारी विद्वान थे जो व्याकरण, दर्शन, और राजनीतिशास्त्र में पारंगत थे — और जिनके नाम इतिहास ने संरक्षित नहीं किए। भोज के ग्रंथों की परिपक्वता और गहराई इस बात का प्रमाण है कि उनके शिक्षक उच्चकोटि के रहे होंगे।
बचपन की चुनौतियाँ
राजकुमार का जीवन बाहर से जितना वैभवशाली दिखता था, भीतर से उतना ही जटिल था। भोज के बचपन में अनेक चुनौतियाँ थीं जिन्होंने उन्हें मजबूत बनाया।
राजनीतिक अनिश्चितता: वाक्पति मुंज की दुखद मृत्यु (चालुक्यों के हाथों) ने परमार वंश को एक गहरे आघात से भर दिया था। यह आघात Raja Bhoja के बचपन की स्मृतियों में था। इसने उन्हें यह सिखाया कि शक्ति कितनी भी बड़ी हो, अहंकार उसे क्षण में नष्ट कर सकता है।
उत्तराधिकार का बोझ: एक युवा राजकुमार पर यह अपेक्षा सदा बनी रहती थी कि वह अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाए। यह बोझ प्रेरणा भी था और दबाव भी।

‘भोज-प्रबंध’ की किंवदंती: इस परवर्ती ग्रंथ में एक कथा है जिसके अनुसार भोज के चाचा मुंज के मंत्री मुंज की मृत्यु के बाद भोज को भी मरवाना चाहते थे, किंतु एक चरवाहे या किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से भोज बच गए। यह कथा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है और इसे लोक-साहित्य की परंपरा में रखना उचित है। तथापि यह कथा यह दर्शाती है कि भोज के बचपन में राजनीतिक खतरे वास्तविक थे।
बाहरी आक्रमणों का भय: महमूद गजनवी के आक्रमणों ने उत्तर भारत को जो भय और अनिश्चितता दी, उसका असर मालवा के दरबार पर भी था। एक संवेदनशील बालक के मन पर यह वातावरण गहरी छाप छोड़ता।
Raja Bhoja के व्यक्तित्व का निर्माण
बचपन की इन सभी परिस्थितियों — शिक्षा, प्रशिक्षण, चुनौतियाँ और वातावरण — ने मिलकर Raja Bhoja के उस व्यक्तित्व को गढ़ा जो इतिहास में अमर हो गया।
नेतृत्व क्षमता: जिस बालक ने बचपन से राजनीतिक जटिलताओं को देखा, जिसने युद्ध और कूटनीति दोनों की शिक्षा ली, वह स्वाभाविक रूप से एक प्रभावशाली नेता बना।
जिज्ञासा और विद्वत्ता: उनकी ग्रंथ-रचना की विविधता — वास्तु से लेकर योग तक, काव्य से लेकर आयुर्वेद तक — यह दर्शाती है कि उनकी जिज्ञासा बचपन से ही असीमित थी।

साहस: युद्धभूमि में स्वयं उतरने का साहस, कठिन निर्णय लेने की क्षमता — ये गुण सैन्य प्रशिक्षण और बचपन की कठिनाइयों ने दिए।
करुणा और उदारता: भोज को ‘दानवीर’ के रूप में भी जाना जाता है। विद्वानों के प्रति उनकी उदारता, जनकल्याण के कार्य — ये गुण किसी न किसी रूप में उनके बचपन के संस्कारों से आए।
ज्ञान के प्रति श्रद्धा: शायद भोज का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह था कि वे ज्ञान को शक्ति से ऊँचा मानते थे। एक ऐसा बोध जो उनके बचपन की विद्वत् परंपरा ने दिया।
रोचक तथ्य — Raja Bhoja का प्रारंभिक जीवन
- उनके गुरुओं के नाम इतिहास में सुरक्षित नहीं हैं, परंतु उनके ग्रंथों की गुणवत्ता उनके शिक्षकों की श्रेष्ठता का प्रमाण है।
- भोज के जन्म की सटीक तिथि किसी समकालीन अभिलेख में दर्ज नहीं है।
- उनके पिता सिंधुराज ने वाक्पति मुंज की मृत्यु के बाद परमार राज्य को पुनर्स्थापित किया।
- भोज ने बचपन से ही वास्तुशास्त्र में गहरी रुचि ली — जो आगे ‘समरांगणसूत्रधार’ बनी।
- ‘भोज-प्रबंध’ में उनके बचपन की जो कथाएँ हैं, वे परवर्ती काल की रचनाएँ हैं।
- धारानगरी के दरबार में देश भर के विद्वानों का आना-जाना भोज की शिक्षा का अप्रत्यक्ष स्रोत था।
- भोज ने पातंजल योगसूत्र पर जो भाष्य लिखा (‘राजमार्तण्ड’), उसकी नींव बचपन में ही पड़ी।
- वाक्पति मुंज की दुखद मृत्यु ने भोज के बाल-मन पर गहरी छाप छोड़ी।
- महमूद गजनवी के आक्रमणों का भय मालवा के दरबार में भी था जब भोज बालक थे।
- भोज को संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत और स्थानीय भाषाओं का भी ज्ञान था।
- उनके ‘युक्तिकल्पतरु’ ग्रंथ में राजनीतिशास्त्र का जो ज्ञान है, वह बचपन की शिक्षा का परिणाम है।
- परमार वंश में शिक्षा को राजकीय प्राथमिकता दी जाती थी — यह भोज की शिक्षा का आधार था।
- भोज ने बचपन से ही मंदिर स्थापत्य में रुचि ली — भोजपुर मंदिर इसी रुचि की परिणति है।
- उनकी माता का नाम ऐतिहासिक अभिलेखों में नहीं मिलता।
- भोज ने शासक बनते ही जो सबसे पहले काम किए उनमें विद्यापीठ की स्थापना थी — यह बचपन के संस्कारों की झलक है।
इतिहासकार की दृष्टि
भारतीय इतिहास के एक अध्येता के रूप में जब मैं Raja Bhoja के प्रारंभिक जीवन पर विचार करता हूँ, तो एक बात बार-बार मन में आती है — महान व्यक्तित्व अचानक नहीं बनते। वे गढ़े जाते हैं। धीरे-धीरे। उन प्रश्नों से जो बचपन में उठते हैं, उन शिक्षाओं से जो आचार्य देते हैं, उन चुनौतियों से जो परिस्थितियाँ सामने रखती हैं।
Raja Bhoja का बचपन हमें यह बताता है कि एक राजा की असली परीक्षा सिंहासन पर बैठने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले होती है — जब वह तय करता है कि वह किस तरह का इंसान बनना चाहता है। Raja Bhoja ने बचपन में ही तय कर लिया था — वह केवल एक विजेता नहीं, एक निर्माता बनेगा।
उपसंहार
धारानगरी के उस दीपक की रोशनी में जो बालक रातों को ग्रंथ पढ़ता था — वही एक दिन मालवा का राजा बना। वही राजा जिसने भोजपुर का विशाल शिव मंदिर बनवाया, भोजसर की झील खुदवाई, ‘समरांगणसूत्रधार’ जैसा अद्भुत ग्रंथ रचा।
Raja Bhoja का बचपन हमें एक गहरा सत्य सिखाता है — महानता एक दिन में नहीं आती। वह वर्षों की जिज्ञासा, वर्षों की साधना, वर्षों की कठिनाइयों से जन्म लेती है। राजा भोज का प्रारंभिक जीवन यही सिखाता है — कि जब एक बालक के हाथ में तलवार और कलम दोनों हों, और जब उसके मन में अपनी धरती के प्रति प्रेम हो — तब इतिहास लिखा जाता है।

राजा भोज के शासनकाल की और अधिक जानकारी के लिए हमारा पिलर लेख अवश्य पढ़ें: ‘राजा भोज (1010–1055 ई.): मालवा के महान विद्वान राजा’।
— लेखक: Abhishek Chavan @HistoryVerse7 शोध दल | © 2026 HistoryVerse7
FAQ —- Raja Bhoja
प्रश्न 1: राजा भोज का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: भोज का जन्म लगभग 990–1000 ई. के बीच धारानगरी (वर्तमान धार, मध्यप्रदेश) में हुआ माना जाता है। सटीक तिथि किसी अभिलेख में नहीं मिलती।
प्रश्न 2: राजा भोज के पिता कौन थे?
उत्तर: उनके पिता सिंधुराज थे, जो परमार वंश के शासक थे।
प्रश्न 3: राजा भोज ने बचपन में कौन-कौन से विषय सीखे?
उत्तर: संस्कृत, व्याकरण, दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और सैन्यशास्त्र.
प्रश्न 4: क्या कालिदास सच में भोज के गुरु थे?
उत्तर: नहीं। कालिदास पाँचवीं शताब्दी में हुए थे और भोज ग्यारहवीं शताब्दी में — यह ऐतिहासिक रूप से असंभव है।
प्रश्न 5: परमार वंश में शिक्षा को कितना महत्व था?
उत्तर: परमार वंश में शिक्षा और विद्वत् संरक्षण को राजकीय प्राथमिकता दी जाती थी। भोज इसी परंपरा की उच्चतम अभिव्यक्ति थे।
Early Life of Raja BhojaEarly Life of Raja Bhoja
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