राजा भोज की धार्मिक नीति: परमार साम्राज्य में आस्था, सहिष्णुता और राजनीति
HistoryVerse7 | धार्मिक इतिहास विशेषांक |
भोजपुर। एक सुबह जब पूर्व की ओर से सूर्य की पहली किरण बेतवा नदी के जल पर पड़ती है। उस विशाल मंदिर के गर्भगृह में — जहाँ एकाश्म शिवलिंग की ऊँचाई छत तक पहुँचती है — पुजारियों ने शंख फूँका। धूप की सुगंध बाहर तक फैली। और उस प्रांगण में — शैव श्रद्धालुओं के साथ-साथ — एक जैन व्यापारी भी था, एक वैष्णव कवि भी, और एक ब्राह्मण विद्वान भी। राजा भोज के राज्य में यह दृश्य असामान्य नहीं था।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है जो इतिहासकारों को आज भी सोचने पर मजबूर करता है — क्या राजा भोज केवल एक महान शैव राजा थे, या उनकी धार्मिक नीति उस संकीर्ण परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक और समावेशी थी जैसा लोकप्रिय इतिहास सुझाता है?
परिचय: धार्मिक नीति का अलग अध्ययन क्यों?
राजा भोज (लगभग 1010–1055 ई.) की चर्चा होती है तो उनके ग्रंथ, मंदिर और सैन्य अभियान — ये तीन विषय सर्वाधिक उभरते हैं। धार्मिक नीति को प्रायः उनके व्यक्तित्व के एक आयाम के रूप में देखा जाता है, न कि एक स्वतंत्र राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के रूप में।
परंतु मध्यकालीन भारत में धर्म और राजनीति अविभाज्य थे। राजा की धार्मिक नीति — किसे संरक्षण दिया, किसे नहीं, किन मंदिरों का निर्माण किया, किन विद्वानों को आश्रय दिया — ये सब राजनीतिक निर्णय भी थे। राजकीय धार्मिक नीति से प्रजा की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक सद्भाव और राज्य की वैधता — सभी प्रभावित होते थे।

इस लेख में हम ऐतिहासिक साक्ष्यों — अभिलेखों, ग्रंथों, पुरातात्त्विक अवशेषों — के आधार पर भोज की धार्मिक नीति का विश्लेषण करेंगे। जहाँ साक्ष्य सीमित हैं, वहाँ स्पष्ट रूप से कहा जाएगा।
ग्यारहवीं शताब्दी के भारत का धार्मिक परिदृश्य
भोज के शासनकाल का भारत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत विविध था। यह विविधता उनकी धार्मिक नीति को समझने के लिए आवश्यक संदर्भ प्रदान करती है।
शैव मत: उत्तर और मध्य भारत में शैव मत सर्वाधिक प्रभावशाली था। कश्मीर शैवदर्शन (प्रत्यभिज्ञा दर्शन) और पाशुपत शैवमत दोनों इस काल में फल-फूल रहे थे। परमार राजवंश परंपरागत रूप से शैव था।
वैष्णव मत: वैष्णव परंपरा भी व्यापक थी। राजस्थान और मालवा में वैष्णव मंदिर और आचार्य सक्रिय थे।

शाक्त मत: देवी की पूजा — विशेषकर उज्जयिनी जैसे शक्तिपीठों में — अत्यंत प्रचलित थी।
जैन धर्म: मालवा और राजस्थान में जैन समुदाय व्यापारिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। जैन मंदिरों और विद्वानों को अनेक राजाओं का संरक्षण प्राप्त था।
बौद्ध धर्म: 11वीं शताब्दी तक उत्तर भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव घट रहा था। मालवा में कुछ बौद्ध केंद्र अभी भी सक्रिय थे। इस बहुधार्मिक परिदृश्य में भोज की धार्मिक नीति का अध्ययन विशेष महत्व रखता है — क्योंकि एक शासक को इस विविधता के साथ काम करना था।
राजा भोज की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था
राजा भोज की व्यक्तिगत धार्मिक आस्था के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्य अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं।
शैव भक्ति — मुख्य साक्ष्य:
परमार अभिलेखों में भोज को ‘परम माहेश्वर’ (शिव के परम भक्त) कहा गया है। भोजपुर का विशाल शिव मंदिर — जिसे ‘भोजेश्वर’ भी कहते हैं — उनकी शैव आस्था का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है। उनके ‘तत्त्वप्रकाश’ ग्रंथ में शैव दर्शन की विवेचना है।
दार्शनिक शैवत्व:
भोज का शैव मत केवल भावनात्मक नहीं था — वह दार्शनिक भी था। ‘तत्त्वप्रकाश’ में उन्होंने शैव सिद्धांत के तात्त्विक पक्ष — तत्त्व, पाश, पशु और पति — की विवेचना की है। यह एक विद्वान भक्त की आस्था थी।

योग और अध्यात्म:
‘राजमार्तण्ड’ — पातंजल योगसूत्र पर भोज का भाष्य — यह दर्शाता है कि उनकी आस्था केवल मंदिर-पूजा तक सीमित नहीं थी। योग और अध्यात्म-साधना उनके धार्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग था।
अभिलेखीय साक्ष्य:
एपिग्राफिया इंडिका में संकलित परमार अभिलेखों में शिव और महेश्वर के प्रति श्रद्धा के अनेक उल्लेख हैं। ये अभिलेख भोज की शैव आस्था के सबसे विश्वसनीय ऐतिहासिक साक्ष्य हैं।
मंदिर-संरक्षण: भोज की धार्मिक नीति का व्यावहारिक स्वरूप
मंदिर-निर्माण और मंदिरों को दान — यह मध्यकालीन भारतीय राजाओं की धार्मिक नीति का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण होता था।
भोजपुर शिव मंदिर (भोजेश्वर मंदिर):
यह भोज की धार्मिक वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रमाणित उदाहरण है। भोपाल से 28 किलोमीटर दूर बेतवा नदी के किनारे स्थित यह मंदिर अपूर्ण है — इसका शिखर कभी नहीं बना। परंतु जो बना वह अद्भुत है। गर्भगृह में एकाश्म शिवलिंग — लगभग 7.5 फीट ऊँचा — भारत के विशालतम मंदिर-शिवलिंगों में से एक है। ASI ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है। मंदिर की दीवारों पर निर्माण की अधूरी रेखाएँ (working drawings) उत्कीर्ण हैं — यह भारतीय मंदिर-स्थापत्य में एक अनूठा उदाहरण है।
उज्जयिनी के मंदिर:
उज्जैन — परमार राज्य का प्रमुख धार्मिक केंद्र में भोज के काल में मंदिर-निर्माण और जीर्णोद्धार हुआ। महाकालेश्वर मंदिर से उनका संबंध परंपरागत रूप से जोड़ा जाता है, यद्यपि इसके प्रत्यक्ष अभिलेखीय साक्ष्य सीमित हैं।
धार में मंदिर:
राजधानी धारानगरी में भी भोज ने मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। ये मंदिर मुख्यतः शैव परंपरा के थे।
धार्मिक अनुदान:
परमार अभिलेखों में भूमि-दान और धन-दान के उल्लेख हैं जो मंदिरों और ब्राह्मण विद्वानों को दिए गए। ये दान धार्मिक संस्थाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ रखते थे।
धार्मिक सहिष्णुता और राज्य नीति
क्या भोज की धार्मिक नीति केवल शैव-केंद्रित थी, या उनके राज्य में अन्य परंपराओं को भी स्थान था? यह प्रश्न ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जैन संरक्षण के संकेत:
भोज के दरबार में जैन विद्वान धनपाल की उपस्थिति — जिनकी ‘तिलकमंजरी’ एक प्रसिद्ध जैन संस्कृत रचना है — यह संकेत देती है कि भोज का दरबार केवल शैव विद्वानों तक सीमित नहीं था। एक जैन विद्वान को राजकीय संरक्षण मिलना धार्मिक सहिष्णुता का एक व्यावहारिक उदाहरण है।
ऐतिहासिक साक्ष्य की सीमा:
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि भोज की ‘धार्मिक सहिष्णुता’ के बारे में व्यापक दावे करने के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। जो साक्ष्य मिलते हैं — जैसे धनपाल का दरबार में होना — वे संकेत देते हैं कि शैव राजा होते हुए भी भोज ने अन्य परंपराओं के प्रति उदार दृष्टिकोण रखा।

राजनीतिक व्यावहारिकता:
मध्यकालीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता अक्सर व्यावहारिक राजनीति का परिणाम होती थी। मालवा में जैन व्यापारी समुदाय आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। उनके साथ अच्छे संबंध बनाए रखना राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से लाभकारी था।
शक्ति-पूजा और उज्जयिनी:
उज्जयिनी में शक्ति-पूजा (देवी-पूजा) की प्राचीन परंपरा थी। परमार शासकों ने इस परंपरा को भी सम्मान दिया। शैव और शाक्त परंपराओं के बीच भारत में एक गहरा दार्शनिक संबंध रहा है।
धर्म और शासन: राजधर्म की अवधारणा
मध्यकालीन भारत में धर्म और शासन अविभाज्य थे। ‘राजधर्म’ — अर्थात् राजा के धार्मिक कर्तव्य — में प्रजा की रक्षा, न्याय और धार्मिक व्यवस्था का संरक्षण शामिल था।
धर्म राजकीय वैधता का आधार:
मध्यकालीन भारत में राजा की धार्मिक पहचान उसकी राजनीतिक वैधता का एक महत्वपूर्ण स्रोत थी। ‘परम माहेश्वर’ जैसी उपाधि केवल धार्मिक नहीं थी — यह राजनीतिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक था।
धर्म और नैतिक प्राधिकार:
भोज के ग्रंथों में — विशेषकर ‘युक्तिकल्पतरु’ में — राजधर्म की विवेचना है। धर्म के अनुसार शासन करना राजा का सर्वोच्च दायित्व था। यह नैतिक प्राधिकार उनके शासन को एक धार्मिक आधार देता था।

धर्म और सामाजिक व्यवस्था:
वर्णाश्रम व्यवस्था का संरक्षण राजा का धार्मिक दायित्व था। भोज ने इस परंपरा का पालन किया ब्राह्मण विद्वानों को संरक्षण और भूमि-दान इसी दायित्व की अभिव्यक्ति थी।
धर्म और राजनीतिक एकता:
एक विविध धार्मिक समाज में शैव राजा होते हुए भी अन्य समुदायों के साथ सम्मानजनक संबंध बनाए रखना यह भोज की शासन-नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी।
विद्वानों और पुजारियों की भूमिका
भोज की धार्मिक नीति में ब्राह्मण विद्वानों और मंदिर-पुजारियों की केंद्रीय भूमिका थी।
ब्राह्मण विद्वानों को संरक्षण:
परमार अभिलेखों में ब्राह्मण विद्वानों को भूमि-दान के अनेक उल्लेख हैं। यह संरक्षण धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक — तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। ब्राह्मण विद्वान राजा के धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करते थे, उनके दरबार में धर्मशास्त्र की व्याख्या करते थे, और राज्य को एक नैतिक ढाँचा प्रदान करते थे।
धार्मिक सलाहकार:
भोज के दरबार में धर्मशास्त्र के ज्ञाता पंडित थे जो धार्मिक नीति पर परामर्श देते थे। राज्य के प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों — राजसूय, विजयादशमी और अन्य पर्वों — का संचालन इन्हीं विद्वानों के निर्देशन में होता था।

मंदिर-संस्थाएँ:
मंदिर मध्यकालीन भारत में केवल धार्मिक स्थल नहीं थे — वे आर्थिक और सामाजिक संस्थाएँ भी थे। भोज द्वारा मंदिरों को भूमि-दान से ये संस्थाएँ आर्थिक रूप से स्वायत्त होती थीं।
विद्यापीठ और धार्मिक शिक्षा:
धार की भोजशाला में धार्मिक और शास्त्रीय शिक्षा साथ-साथ चलती थी। वेद, धर्मशास्त्र और दर्शन की शिक्षा — यह धार्मिक ज्ञान-परंपरा को जीवित रखने का प्रयास था।
ऐतिहासिक बहस
राजा भोज की धार्मिक नीति के बारे में इतिहासकारों में कई महत्वपूर्ण प्रश्न विवादित हैं।
क्या भोज विशुद्ध शैव थे?:
अभिलेखीय साक्ष्य — ‘परम माहेश्वर’ उपाधि और भोजपुर मंदिर — स्पष्टतः शैव हैं। परंतु धनपाल जैसे जैन विद्वान को संरक्षण और उनके दरबार में धार्मिक विविधता — ये संकेत देते हैं कि ‘विशुद्ध शैव’ एक अतिरंजित वर्णन हो सकता है।
धार्मिक सहिष्णुता के दावे:
कुछ परवर्ती स्रोत और लोक-परंपरा भोज को एक अत्यंत उदार और सहिष्णु शासक चित्रित करते हैं। R. C. Majumdar ने इन दावों को सावधानी से परखने की सलाह दी है। ऐतिहासिक सत्य यह है कि भोज मुख्यतः शैव थे, परंतु अन्य परंपराओं के प्रति उनका दृष्टिकोण उत्पीड़क नहीं था।
‘तत्त्वप्रकाश’ और शैव दर्शन:
D. C. Sircar ने भोज के शैव दर्शन को उनकी राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर देखा है। शैव दर्शन में राजा को शिव का प्रतिनिधि माना जाता है — यह राजकीय वैधता का एक शक्तिशाली आधार था।

बौद्ध धर्म और भोज:
11वीं शताब्दी में उत्तर भारत में बौद्ध धर्म क्षीण हो रहा था। भोज के काल में मालवा में बौद्ध संस्थाओं के साथ उनके संबंध के बारे में विस्तृत ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
इतिहासकार की दृष्टि
भारतीय धार्मिक इतिहास के एक अध्येता के रूप में राजा भोज की धार्मिक नीति पर विचार करते समय मुझे एक बात बार-बार याद आती है — मध्यकालीन भारत के राजाओं को आधुनिक ‘धर्मनिरपेक्षता’ या ‘कट्टरता’ जैसी श्रेणियों में नहीं रखा जा सकता।
भोज एक शैव राजा थे — यह स्पष्ट और प्रमाणित है। उन्होंने शैव परंपरा को राजकीय संरक्षण दिया, महान शिव मंदिर बनाया, और शैव दर्शन पर ग्रंथ लिखा। परंतु उनके दरबार में एक जैन विद्वान भी था, उनके राज्य में विभिन्न धर्मों के लोग रहते थे, और उन्होंने किसी धर्म के प्रति उत्पीड़क नीति नहीं अपनाई।

यह वह संतुलन था जो मध्यकालीन भारत के श्रेष्ठ शासकों की पहचान थी — अपनी आस्था में दृढ़ रहना और दूसरों की आस्था का सम्मान करना। भोज इसी संतुलन के प्रतीक थे।
राजा भोज की धार्मिक नीति के 15 अल्पज्ञात तथ्य
- भोज की धार्मिक नीति का सबसे बड़ा प्रभाव यह था कि मालवा में एक विशिष्ट शैव-सांस्कृतिक पहचान विकसित हुई।
- परमार अभिलेखों में भोज को ‘परम माहेश्वर’ — शिव के परम भक्त — कहा गया है।
- भोजपुर मंदिर का एकाश्म शिवलिंग भारत के विशालतम मंदिर-शिवलिंगों में से एक है।
- ‘तत्त्वप्रकाश’ में भोज ने शैव सिद्धांत के तात्त्विक पहलुओं की विस्तृत विवेचना की है।
- भोज के दरबार में जैन विद्वान धनपाल को संरक्षण मिला — यह धार्मिक सहिष्णुता का एक ठोस उदाहरण है।
- ‘राजमार्तण्ड’ — पातंजल योगसूत्र पर उनका भाष्य — दर्शाता है कि उनकी आस्था दार्शनिक भी थी।
- भोजपुर मंदिर की दीवारों पर निर्माण की अधूरी रेखाएँ उत्कीर्ण हैं — यह किसी भारतीय मंदिर में दुर्लभ है।
- उज्जयिनी में शक्ति-पूजा की परंपरा को भोज के संरक्षण में नई ऊर्जा मिली।
- परमार वंश परंपरागत रूप से शैव था — भोज इस परंपरा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति थे।
- ‘समरांगणसूत्रधार’ में मंदिर-निर्माण के विस्तृत धार्मिक और तकनीकी निर्देश हैं।
- भोज की धार्मिक नीति में मंदिरों को भूमि-दान एक महत्वपूर्ण तत्व था — जो उन्हें आर्थिक स्वायत्तता देता था।
- भोजपुर मंदिर का अधूरा शिखर शासन के अंतिम वर्षों के आर्थिक दबाव का प्रमाण हो सकता है।
- धार्मिक नीति में भोज ने ‘राजधर्म’ की अवधारणा को केंद्रीय बनाया।
- भोज की ‘परम माहेश्वर’ उपाधि केवल धार्मिक नहीं — यह राजनीतिक वैधता का भी प्रतीक थी।
- ASI ने भोजपुर मंदिर को राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया है।
निष्कर्ष
भोजपुर मंदिर के उस गर्भगृह में — जहाँ एकाश्म शिवलिंग की छाया में दीपक जलता है — राजा भोज की धार्मिक आस्था का सबसे जीवंत प्रमाण है। एक ऐसे राजा की आस्था जो अपने आराध्य के लिए पहाड़ जितना बड़ा मंदिर बनाने का स्वप्न देखता था — और जो स्वप्न अधूरा रहा, पर जो बना वह अमर हो गया।

राजा भोज की धार्मिक नीति उनके व्यक्तित्व की तरह बहुआयामी थी। एक ओर गहरी शैव आस्था — ग्रंथों में, मंदिरों में, दर्शन में। दूसरी ओर एक व्यावहारिक शासक की समझ — कि राज्य की शक्ति केवल एक धार्मिक परंपरा को संरक्षण देने से नहीं, बल्कि अपनी विविध प्रजा के साथ सम्मानजनक संबंध बनाने से आती है।
मालवा की वह शैव-सांस्कृतिक पहचान जो भोज ने बनाई — वह आज भी जीवित है। भोजपुर के मंदिर में हर महाशिवरात्रि पर जो दीप जलता है, वह राजा भोज की उस आस्था की निरंतरता है जो एक हजार साल बाद भी नहीं बुझी।
— इतिहास के एक जिज्ञासु अध्येता (Abhishek chavan) की कलम से
संदर्भ और स्रोत
- Archaeological Survey of India — Reports on Bhojpur Temple and Paramara sites.
- Majumdar, R. C. (Ed.) — The History and Culture of the Indian People, Vol. V: The Struggle for Empire. Bharatiya Vidya Bhavan.
- Singh, Upinder — A History of Ancient and Early Medieval India. Pearson, 2008.
- Sircar, D. C. — Indian Epigraphy. Motilal Banarsidass.
- Kane, P. V. — History of Dharmashastra, Vol. II & III. Bhandarkar Oriental Research Institute.
- Trivedi, H. V. — Inscriptions of the Paramāras. Corpus Inscriptionum Indicarum, Vol. VII. ASI.
- Epigraphia Indica — Paramara inscriptions. Archaeological Survey of India.
- Bhoja — Tattvaprakāśa (Shaiva philosophical text). Various Sanskrit editions.
- Bhoja — Rājamārtaṇḍa (Yoga commentary). Various Sanskrit editions.
FAQ —-Religious Policy of Raja Bhoja
प्रश्न 1: राजा भोज किस धर्म के अनुयायी थे?
उत्तर: राजा भोज शैव मतानुयायी थे। परमार अभिलेखों में उन्हें ‘परम माहेश्वर’ कहा गया है और भोजपुर का विशाल शिव मंदिर उनकी शैव आस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
प्रश्न 2: भोजपुर मंदिर क्यों अधूरा रहा?
उत्तर: इसका निश्चित ऐतिहासिक कारण ज्ञात नहीं है। संभवतः शासन के अंतिम वर्षों में आर्थिक दबाव और युद्धों के कारण निर्माण अधूरा रह गया।
प्रश्न 3: क्या भोज ने जैन धर्म को भी संरक्षण दिया?
उत्तर: जैन विद्वान धनपाल को भोज के दरबार में संरक्षण मिला, यह एक संकेत है। परंतु जैन मंदिरों को प्रत्यक्ष राजकीय संरक्षण के विस्तृत साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
प्रश्न 4: ‘तत्त्वप्रकाश’ क्या है?
उत्तर: भोज द्वारा रचित शैव दर्शन का ग्रंथ जिसमें शैव सिद्धांत के तात्त्विक पहलुओं की विवेचना है।
प्रश्न 5: भोज की धार्मिक नीति के बारे में प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत क्या हैं?
उत्तर: एपिग्राफिया इंडिका के परमार अभिलेख, भोज के स्वयं के ग्रंथ (‘तत्त्वप्रकाश’, ‘राजमार्तण्ड’), भोजपुर मंदिर, और R.C. Majumdar, D.C. Sircar के ऐतिहासिक विश्लेषण।
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