👑⚔️ Dattaji Rao Shinde l — दिल्ली से बरारी घाट तक मराठा शौर्य
मराठा साम्राज्य के उत्तर अभियान में Dattaji Rao Shinde l का नाम अमर सेनानायक के रूप में दर्ज है। वे वह रणनीति‑धुरी थे जिन्होंने दिल्ली की पुनर्स्थापना (1757), अटॉक–पेशावर पर मराठा उपस्थिति और बरारी घाट की शहादत (1760) में निर्णायक भूमिका निभाई। उनकी पहचान केवल एक सैनिक तक सीमित नहीं रही—एक Silent Commander जिन्होंने अनुशासन, साहस और त्याग के माध्यम से उत्तर भारत की शक्ति‑संतुलन को बदल दिया। मराठा–अफगान संघर्ष की इस गाथा में उनका नाम अमर, भूमिका निर्णायक और विरासत प्रेरणादायी है। यदि यह अनसुना इतिहास आपको प्रेरित करता है, तो इसे शेयर करें—क्योंकि साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, अनुशासन और त्याग से टिकती हैं। 👑⚔️
🏛️ परिचय: भुला दिया गया नायक
भारतीय इतिहास के पन्नों में अनेक वीर योद्धाओं की गाथाएं दर्ज हैं, परंतु Dattaji Rao Shinde (1723-10 जनवरी 1760) उन अमर शहीदों में से एक हैं जिनकी कहानी समय की धूल में दब गई। वे केवल एक योद्धा नहीं थे – वे 18वीं शताब्दी के मध्य में मराठा साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली सेनापतियों में से एक थे जिन्होंने उत्तर भारत में मराठा ध्वज को पंजाब तक फहराया।
Dattaji Rao Shinde रणोजी राव शिंदे और माइनाबाई (उर्फ निंबाबाई) के दूसरे पुत्र थे। उनके बड़े भाई जयप्पाजी राव शिंदे थे और छोटे भाई ज्योतिबा थे। दत्ताजी महादजी शिंदे के बड़े सौतेले भाई थे, जिन्होंने बाद में ग्वालियर रियासत की स्थापना की।

Dattaji Rao Shinde का जीवन एक साधारण मराठा परिवार से उठकर पंजाब और मुल्तान के गवर्नर बनने की असाधारण यात्रा है। उनके पिता रणोजी शिंदे ने मालवा क्षेत्र में मराठा शक्ति की नींव रखी थी, और उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया था। लेकिन Dattaji Rao Shinde ने अपने पिता से भी आगे जाकर मराठा साम्राज्य की सीमाओं को अफगानिस्तान की सीमा तक विस्तारित किया।
यह ब्लॉग आपको दत्ताजी राव शिंदे के जीवन, उनके युद्ध अभियानों, पंजाब विजय, और उनकी वीरगति के बारे में विस्तृत और सत्यापित जानकारी प्रदान करेगा। प्रत्येक तथ्य ऐतिहासिक स्रोतों से सत्यापित है।
👶 प्रारंभिक जीवन और परिवार (1723-1745)
Dattaji Rao Shinde का जन्म 1723 में कन्हेरखेड़ गांव (महाराष्ट्र के सतारा जिले में) में हुआ था। शिंदे परिवार मूल रूप से “सेंद्रक” जाति से थे और कन्हेरखेड़ के पाटिल (गांव प्रमुख) थे। यह परिवार छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से ही मराठा सेना से जुड़ा हुआ था।
पारिवारिक पृष्ठभूमि:
Dattaji Rao Shinde के पिता रणोजी राव शिंदे पेशवा बाजीराव के बचपन के साथी थे और छत्रपति शाहूजी महाराज के दरबार में एक अधिकारी थे। रणोजी ने पेशवा बालाजी विश्वनाथ और बाजीराव प्रथम के अधीन सेवा की और मालवा विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रणोजी शिंदे की दो पत्नियां थीं – निंबाबाई (माइनाबाई) और चिमाबाई। निंबाबाई से तीन पुत्र थे – जयप्पाजी राव, दत्ताजी राव और ज्योतिबा राव। चिमाबाई से महादजी शिंदे का जन्म हुआ, जो बाद में ग्वालियर के महान शासक बने।

शिक्षा और प्रशिक्षण:
Dattaji Rao Shinde की शिक्षा पारंपरिक मराठा शैली में हुई। उन्होंने मराठी, संस्कृत और फारसी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। उस समय फारसी मुगल दरबार की भाषा थी, इसलिए उत्तर भारत में कूटनीतिक कार्यों के लिए यह आवश्यक थी।
सैन्य प्रशिक्षण में तलवारबाजी, घुड़सवारी, तीरंदाजी और भाला फेंकने की कला शामिल थी। मराठा युद्ध कला में “गुरिल्ला युद्ध” और तीव्र गति से हमले करने की रणनीति पर विशेष जोर दिया जाता था।
1745 में रणोजी राव शिंदे की मालवा के शुजालपुर में मृत्यु हो गई। उनके बाद बड़े पुत्र जयप्पाजी राव शिंदे ग्वालियर के शासक बने।
⚔️ सैन्य जीवन का आरंभ: रीजेंट से सेनापति तक (1745-1757)
1745 में जयप्पाजी राव शिंदे की असामयिक मृत्यु के बाद, उनके नाबालिग पुत्र जानकोजी राव शिंदे ग्वालियर के शासक बने। Dattaji Rao Shinde ने 1755 तक अपने भतीजे जानकोजी के लिए रीजेंट (संरक्षक) के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने ग्वालियर रियासत का प्रशासन संभाला और साथ ही मराठा साम्राज्य के विभिन्न सैन्य अभियानों में भाग लिया।
राजपुताना अभियान (1755-1756):
Dattaji Rao Shinde ने मारवाड़ अभियान का नेतृत्व किया और जनवरी 1756 तक राठौर शासक बिजय सिंह को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया। उन्होंने 50 लाख रुपये का जुर्माना वसूला और अजमेर और जालोर सहित क्षेत्रीय रियायतें प्राप्त कीं। यह अभियान Dattaji Rao Shinde की सैन्य और कूटनीतिक दक्षता का प्रमाण था।

Dattaji Rao Shinde के बड़े भाई जयप्पाजी ने राजपुताना में शिंदे शक्ति का विस्तार किया था और जोधपुर के महाराजा बिजय सिंह के सेवकों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। यह घटना Dattaji Rao Shinde के लिए व्यक्तिगत आघात थी।
वित्तीय अभियान:
पेशवा बालाजी बाजीराव ने Dattaji Rao Shinde को पूर्वी प्रांतों में राजस्व संचालन का कार्य सौंपा, और बिहार और बंगाल में 20 मिलियन रुपये की बकाया राशि वसूलने का निर्देश दिया। यह कार्य मराठा साम्राज्य के वित्तीय संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
🏰 पंजाब विजय: मराठा साम्राज्य का स्वर्णिम अध्याय (1757-1758)
1757-1758 का दौर मराठा इतिहास में स्वर्णिम अध्याय था। मराठाओं ने 1757-1758 में अटक और पेशावर के किलों पर कब्जा कर लिया था और अपना शासन काबुल, कंधार और अफगानिस्तान-ईरान सीमा तक विस्तारित करना चाहते थे।
लाहौर और मुल्तान पर विजय:
रघुनाथराव और मल्हारराव होल्कर के नेतृत्व में मराठा सेना ने पंजाब पर आक्रमण किया। उन्होंने अफगान सरदारों को पराजित किया और लाहौर, मुल्तान, सियालकोट, और पेशावर तक के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
700 वर्षों के बाद, पंजाब और सिंधु क्षेत्र में हिंदू संप्रभुता बहाल हुई। ये क्षेत्र, जो मुगलों द्वारा लंबे समय तक शासित थे, 1020 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा हिंदू सम्राट त्रिलोचन पाल को हराने के बाद से मुस्लिम शासन के अधीन थे।

दत्ताजी की नियुक्ति:
रघुनाथराव पंजाब में स्थायी रूप से बसना नहीं चाहते थे। पेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब पेशवा) ने Dattaji Rao Shinde को लाहौर और मुल्तान प्रांतों की कमान दी और 18,000 घुड़सवार सेना के साथ अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व में अफगान आक्रमण को रोकने का काम सौंपा।
मार्च 1759 में, Dattaji Rao Shinde लगभग 40,000 घुड़सवारों की विशाल सेना के साथ मछीवाड़ा पहुंचे। लेकिन रघुनाथराव की तरह, Dattaji Rao Shinde भी पंजाब में स्थायी रूप से बसना नहीं चाहते थे।
🎯 रोहिल्ला संघर्ष: नजीब-उद-दौला के खिलाफ (1759)
Dattaji Rao Shinde पूरी तरह से मराठा साम्राज्य के मुख्य दुश्मन, यानी नजीब-उद-दौला रोहिल्ला को जड़ से उखाड़ने के लिए दृढ़ थे। नजीब-उद-दौला रोहिलखंड का नवाब था और अहमद शाह अब्दाली का मुख्य सहयोगी था।
रणनीतिक निर्णय:
Dattaji Rao Shinde ने नानासाहेब पेशवा को एक सूचना पत्र लिखा और सबाजीराव शिंदे को बापू राव और दादू राव शिंदे की सहायता से पंजाब की मराठा गैरिसन को संभालने के लिए तैनात किया। Dattaji Rao Shinde स्वयं दोआब में नजीब खान रोहिल्ला से लड़ने गए।
यह निर्णय बाद में घातक साबित हुआ। सबाजीराव शिंदे की रोहतास किले में अनुपस्थिति के कारण, जनरल जहां खान के नेतृत्व में अफगानों ने अटक और रोहतास किले दोनों पर हमला किया और मराठाओं से वापस जीत लिया।

लाहौर का युद्ध (1759):
सबाजीराव शिंदे और स्थानीय सिखों ने एकत्रित होकर 1759 के लाहौर युद्ध में अफगानों को पराजित किया। अफगान जनरल जहां खान ने इस युद्ध में अपना इकलौता पुत्र खो दिया और एक बार फिर अफगान काबुल की ओर पीछे हट गए।
अब्दाली की प्रतिक्रिया:
लाहौर में मराठाओं की जीत ने अहमद शाह अब्दाली को अत्यधिक क्रोधित और व्यथित कर दिया। अफगानों और रोहिल्लों ने गठबंधन किया और जहां खान को 60,000 घुड़सवारों की विशाल सेना के साथ भेजा।
⚰️ बुराड़ी घाट का युद्ध: वीरगति का अमर क्षण (10 जनवरी 1760)
युद्ध की पृष्ठभूमि:
Dattaji Rao Shinde की दुर्रानियों के हाथों हार के बाद, वे दिल्ली की ओर पीछे हट गए और 29 दिसंबर को सोनीपत पहुंचे। उन्होंने मुगल वजीर इमाद-उल-मुल्क को दिल्ली की रक्षा व्यवस्था को संगठित करने का निर्देश दिया, लेकिन वजीर ने धोखा दिया और दिल्ली को असुरक्षित छोड़ दिया।
4 जनवरी को, यमुना नदी दोनों सेनाओं को अलग कर रही थी, मराठा सैनिकों को शत्रु को नदी पार करने से रोकने के लिए यमुना नदी के सभी घाटों पर तैनात किया गया था।
8-9 जनवरी की रात:
8-9 जनवरी की रात को, अब्दाली ने मराठा रक्षा और नदी पार करने की संभावना की जांच करने का निर्णय लिया। नजीब-उद-दौला और अन्य रोहिल्ला सरदार ऊंटों और छोटे हाथियों के एक समूह के साथ इस उद्यम में लगे, प्रत्येक में हल्की तोपों और तोपखाने की एक जोड़ी थी। वे पानी की धारा को पार कर गए और छिप गए, लेकिन मराठाओं ने उन्हें देख लिया।

Dattaji Rao Shinde को इसकी रिपोर्ट करने के बाद, सबाजी शिंदे और उनके आदमी केवल तलवारों और भाला से लैस होकर, दुश्मन का सामना करने के लिए दूसरी तरफ नदी पार कर गए। वे झाड़ियों और झाड़ियों के पीछे से छिपे मस्केटियरों द्वारा गोलियों की बौछार से मिले।
Dattaji Rao Shinde का अंतिम हमला:
मराठाओं की स्थिति के खतरे को जानने के बाद, Dattaji Rao Shinde घटनास्थल पर पहुंचे। शत्रु की स्थिति को जाने बिना, वे केवल तलवारें ले जाने वाले मुट्ठी भर लोगों के साथ अफगानों पर झपट पड़े।
हालांकि, एक गोली ने Dattaji Rao Shinde को मार गिराया और उनकी मृत्यु हो गई। जानकोजी शिंधिया, जो सहायता के लिए आए थे, उन्हें भी गोली मार दी गई और वे बेहोश हो गए। ज्योतिबा, Dattaji Rao Shinde के छोटे भाई, भी युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए।
अंतिम शब्द:
आज भी, दत्ताजी को लोकप्रिय मराठा इतिहास में उनके अंतिम शब्दों के लिए याद किया जाता है जब कुतुब शाह और नजीब ने कहा, “क्यों पाटील, और लड़ेंगे” और Dattaji Rao Shinde ने जवाब दिया, “क्यों नहीं.. बचेंगे तो और भी लड़ेंगे”।
कुतुबशाह रोहिल्ला, नजीब खान के गुरु, ने Dattaji Rao Shinde का शव पाया और सिर काट दिया और नजीब और अब्दाली दोनों को दिखाया गया।
🌟 10 अनजाने तथ्य जो इतिहास ने छुपाए
1. पेशवा बाजीराव के साथ विशेष संबंध: दत्ताजी के पिता रणोजी राव शिंदे पेशवा बाजीराव के बचपन के साथी थे। यह पारिवारिक संबंध दत्ताजी के सैन्य करियर में अत्यंत सहायक रहा।
2. रीजेंट के रूप में शासन: दत्ताजी ने 1755 से 1760 तक अपने भतीजे जानकोजी राव शिंदे के लिए रीजेंट के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल में ग्वालियर रियासत समृद्ध हुई।
3. 700 वर्षों बाद हिंदू संप्रभुता: दत्ताजी के नेतृत्व में मराठाओं ने 1757-1758 में अटक और पेशावर के किलों पर कब्जा कर लिया, जिससे लगभग 700 वर्षों के बाद पंजाब और सिंधु क्षेत्र में हिंदू संप्रभुता बहाल हुई।
4. सिखों के साथ सहयोग: सबाजीराव शिंदे और स्थानीय सिखों ने मिलकर 1759 में अफगानों को लाहौर युद्ध में पराजित किया। यह हिंदू-सिख एकता का उत्कृष्ट उदाहरण था।
5. परिवार का बलिदान: दत्ताजी के साथ उनके छोटे भाई ज्योतिबा भी बुराड़ी घाट के युद्ध में शहीद हुए। उनके भतीजे जानकोजी राव भी गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में पानीपत के तीसरे युद्ध (1761) में शहीद हो गए।

6. महादजी शिंदे का प्रतिशोध: बाद में महादजी शिंदे ने कुतुब खान को मार डाला और हरियाणा के कुंजपुरा में अफगान कमांडर को हराने के बाद शिंदे परिवार के हाथी को ले लिया।
7. वीर सावरकर का सम्मान: वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक में लिखा: “कोई भी सैनिक दुनिया में अपने राष्ट्रीय ध्वज की अधिक ईमानदारी से रक्षा नहीं करता, या उसकी रक्षा में अधिक वीरता से मरा, दत्ताजी की तुलना में”।
8. फिल्म और टीवी में: 1994 की हिंदी टीवी श्रृंखला “द ग्रेट मराठा” में, मंगल ढिल्लन ने दत्ताजी का किरदार निभाया। 2019 की बॉलीवुड फिल्म “पानीपत” में मिलिंद गुनाजी ने दत्ताजी राव शिंदे का किरदार निभाया।
9. स्किंडिया स्कूल में श्रद्धांजलि: ग्वालियर के प्रसिद्ध स्किंडिया स्कूल में एक हाउस दत्ताजी के नाम पर है, जिसका मूलमंत्र है “सुयस्था आत्मा जगत्सतु”।
10. कन्हेरखेड़ में स्मारक: पानीपत के तीसरे युद्ध में शहीद हुए 16 शिंदे योद्धाओं की स्मृति अभी भी उनके गांव कन्हेरखेड़ में मौजूद है।
🎬 निष्कर्ष: अमर वीर की गाथा
दत्ताजी राव शिंदे का जीवन एक साधारण मराठा परिवार से उठकर मराठा साम्राज्य के सबसे प्रतिष्ठित सेनापतियों में से एक बनने की अद्भुत कहानी है। उनके जीवन ने साबित किया कि सच्ची वीरता केवल जीतने में नहीं, बल्कि अपने धर्म और कर्तव्य के लिए अंतिम सांस तक लड़ने में है।
जब घायल दत्ताजी से नजीब खान ने पूछा “क्यों पाटील, और लढोगे?”, तो उनका जवाब था – “क्यों नहीं, बचेंगे तो और भी लढेंगे!” यह वाक्य केवल एक उक्ति नहीं, बल्कि मराठा वीरता का प्रतीक बन गया।
दत्ताजी ने 1751 में कुकडी की लड़ाई में निजाम के हाथी पर हमला किया, 1756 में मारवाड़ से 5 करोड़ रुपये की खंडणी वसूली, 1758 में पंजाब और लाहौर पर मराठा ध्वज फहराया, और अंततः 10 जनवरी 1760 को बुराड़ी घाट पर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके छोटे भाई महादजी शिंदे ने बाद में मराठा साम्राज्य को पुनर्जीवित किया और ग्वालियर में शिंदे राजवंश की स्थापना की। स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर ने लिखा – “कोई भी सैनिक दुनिया में अपने राष्ट्रीय ध्वज की अधिक ईमानदारी से रक्षा नहीं करता, दत्ताजी की तुलना में”।
आज भले ही दत्ताजी राव शिंदे का नाम इतिहास की मुख्यधारा में उतना प्रसिद्ध न हो, लेकिन मराठा इतिहास में उनका स्थान स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने कभी भी विपरीत परिस्थितियों में हार नहीं मानी।
📚 ऐतिहासिक स्रोत और संदर्भ
यह ब्लॉग निम्नलिखित प्रमाणित स्रोतों से तैयार किया गया है:
- Wikipedia – Dattaji Rao Scindia (अंग्रेजी)
- Britannica Encyclopedia – Battle of Barari Ghat
- Jai Vilas Palace Official Website – The Scindias
- Organiser – Historical articles on Maratha history
- Grokipedia – Dattaji Rao Scindia biography
- Veer Savarkar’s writings – Hindu Pad Padshahi
- Persian court documents – Ahmad Shah Abdali period
- Marathi historical texts – Peshwa period accounts
❓ FAQ – Dattaji Rao Shinde
प्रश्न 1: दत्ताजी राव शिंदे कौन थे?
दत्ताजी राव शिंदे (1723-1760) 18वीं शताब्दी के प्रमुख मराठा सेनापति थे जिन्हें पेशवा ने पंजाब और मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया था।
प्रश्न 2: “बचेंगे तो और भी लढेंगे” यह वाक्य किसने कहा?
जब घायल दत्ताजी जमीन पर पड़े थे, तब नजीब खान ने पूछा “क्यों पाटील, और लढोगे?” दत्ताजी ने उत्तर दिया – “क्यों नहीं, बचेंगे तो और भी लढेंगे!” यह वाक्य मराठा इतिहास में अमर हो गया।
प्रश्न 3: बुराड़ी घाट का युद्ध कब हुआ?
10 जनवरी 1760 को यमुना नदी के किनारे बुराड़ी घाट पर यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमें दत्ताजी राव शिंदे ने वीरगति प्राप्त की।
प्रश्न 4: क्या दत्ताजी राव शिंदे ने पंजाब पर विजय प्राप्त की थी?
हां, 1758 में पेशवा ने दत्ताजी राव को लाहौर और मुल्तान प्रांतों की कमान दी। उन्होंने पंजाब में मराठा प्रशासन की स्थापना की।
प्रश्न 5: दत्ताजी राव शिंदे की पत्नी कौन थीं?
1758 में श्रीगोंदा में दत्ताजी का विवाह भागीरथीबाई से हुआ था।
प्रश्न 6: क्या दत्ताजी के स्मारक आज भी मौजूद हैं?
हां, पानीपत के तीसरे युद्ध में शहीद हुए 16 शिंदे योद्धाओं की स्मृति में कन्हेरखेड़ गांव (सातारा) में 16 खंभों का स्मारक आज भी मौजूद है।
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👑⚔️ Share the Eternal Legacy of Dattaji Rao Shinde l — दिल्ली, अटॉक–पेशावर और बरारी घाट का अमिट अध्याय
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