Raja Bhoja की न्याय व्यवस्था: परमार साम्राज्य की विधिक सिद्धांत और न्यायिक प्रशासन
HistoryVerse7 | विधि-इतिहास विशेषांक | हिंदी संस्करण
धारानगरी। एक सुबह जब शहनाई की आवाज़ अभी थमी नहीं थी और सूर्य की पहली किरणें किले की प्राचीरों पर पड़ रही थीं, दरबार का द्वार खुला। एक किसान — धूल भरे वस्त्र, थके हुए चेहरे पर उम्मीद की एक रेखा — अपनी भूमि-विवाद की फरियाद लेकर आया था। दरबान ने उसे रोका नहीं। यही नियम था — राजा भोज के दरबार में न्याय माँगने का अधिकार हर व्यक्ति को था।

राजा अपने सिंहासन पर थे। उनके चारों ओर मंत्री, अमात्य और विद्वान थे। किंतु उस किसान की बारी आने पर भोज ने अपने ग्रंथ से दृष्टि हटाई और ध्यान से सुना। यह केवल एक शासक की दयालुता नहीं थी — यह एक न्याय-व्यवस्था की नींव थी जिसमें राजा स्वयं सर्वोच्च न्यायाधीश था।
प्रश्न यह है — Raja Bhoja ने परमार साम्राज्य में न्याय का वह वातावरण कैसे बनाया जिसने उन्हें ‘न्यायप्रिय राजा’ की उपाधि दिलाई?
परिचय: न्याय-व्यवस्था का अलग अध्ययन क्यों?
Raja Bhoja के विषय में अधिकांश ऐतिहासिक चर्चा उनके ग्रंथों, मंदिरों और सैन्य अभियानों पर केंद्रित रही है। परंतु किसी भी शासन की सबसे गहरी परीक्षा उसकी न्याय-व्यवस्था में होती है — क्योंकि न्याय ही वह धागा है जो शासक और प्रजा को बाँधता है।
Raja Bhoja के न्याय-प्रशासन का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उनके शासन-दर्शन को समझने की कुंजी है। ‘युक्तिकल्पतरु’ और ‘समरांगणसूत्रधार’ जैसे उनके ग्रंथों में राजधर्म और न्याय की विवेचना मिलती है। परमार अभिलेखों में न्यायिक निर्णयों और भूमि-अनुदानों का उल्लेख है। इन सबको मिलाकर हम Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था की एक रूपरेखा बना सकते हैं।

यह लेख ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित है। जहाँ साक्ष्य सीमित हैं, वहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है। न्याय-व्यवस्था का कोई भी पहलू जो ऐतिहासिक स्रोतों से समर्थित नहीं है, उसे इस लेख में शामिल नहीं किया गया।
मध्यकालीन भारत में न्याय की अवधारणा
Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था को समझने के लिए पहले उस वृहत्तर ढाँचे को समझना आवश्यक है जिसमें मध्यकालीन भारतीय न्याय की अवधारणा विकसित हुई।
धर्म और राजधर्म: मध्यकालीन भारत में ‘धर्म’ केवल धार्मिक आचरण नहीं था — यह सामाजिक व्यवस्था, नैतिक आचरण और विधिक सिद्धांतों का समुच्चय था। राजा के लिए ‘राजधर्म’ — अर्थात् शासक के कर्तव्य — में प्रजा की सुरक्षा और न्याय प्रमुख थे। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति और नारदस्मृति जैसे धर्मशास्त्र ग्रंथ राजा के न्यायिक दायित्वों को विस्तार से परिभाषित करते थे।
विधिक परंपरा: भारतीय विधिक परंपरा में तीन प्रमुख स्रोत थे — धर्मशास्त्र (शास्त्रीय विधि), स्थानीय रीति-रिवाज (आचार), और राजाज्ञा (राजकीय आदेश)। इन तीनों के बीच संतुलन बनाना राजा का दायित्व था।

न्याय का दार्शनिक आधार: भारतीय दर्शन में न्याय केवल अपराध और दंड का विषय नहीं था — यह सामाजिक सद्भाव, वर्णाश्रम व्यवस्था की रक्षा, और कमजोरों को सशक्त करने की प्रक्रिया थी। एक आदर्श राजा वह था जो ‘दण्ड’ (दंड-शक्ति) का उपयोग न्याय के लिए करे, स्वार्थ के लिए नहीं।
Raja Bhoja और न्याय-दर्शन: भोज ने इस परंपरा को न केवल आत्मसात किया बल्कि इसे अपने ग्रंथों में विवेचित भी किया। ‘युक्तिकल्पतरु’ में राजनीतिशास्त्र के अंतर्गत न्याय-नीति की चर्चा मिलती है।
राजा भोज के अधीन न्यायिक संरचना
परमार साम्राज्य की न्यायिक संरचना परंपरागत भारतीय राजशाही पद्धति पर आधारित थी। यह एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था थी जो ग्राम स्तर से राजदरबार तक फैली हुई थी।
राजदरबार (सर्वोच्च न्यायालय): धारानगरी का राजदरबार सर्वोच्च न्यायालय था। यहाँ महत्वपूर्ण मामले, राज्य-सम्बन्धी विवाद, और निचली अदालतों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनी जाती थी। राजा स्वयं अंतिम निर्णयकर्ता थे।
नगर न्यायालय: धार, उज्जयिनी जैसे प्रमुख नगरों में नगर-स्तरीय न्यायालय होते थे। यहाँ नगरपति या उनके प्रतिनिधि न्याय करते थे।

विषय (जिला) स्तर: कई ग्राम-समूहों को मिलाकर बने ‘विषय’ में विषयपति के अधीन न्यायिक कार्य होता था। भूमि-विवाद, स्थानीय व्यापारिक मतभेद और मध्यम-स्तरीय अपराध यहाँ सुने जाते थे।
ग्राम स्तर (ग्राम सभा): सबसे निचले स्तर पर ग्राम सभाएँ स्थानीय विवादों का निपटान करती थीं। ग्रामपति और वरिष्ठ ग्रामवासियों की समिति छोटे विवाद सुलझाती थी। यह विकेंद्रीकृत न्याय-व्यवस्था प्रजा के लिए सुलभ और व्यावहारिक थी।
ऐतिहासिक साक्ष्य की सीमा: यह स्वीकार करना आवश्यक है कि Raja Bhoja के न्यायिक तंत्र के बारे में समकालीन विस्तृत अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। उपर्युक्त संरचना उनके काल की सामान्य भारतीय राजशाही पद्धति और परमार अभिलेखों में मिले संकेतों पर आधारित है।
सर्वोच्च न्यायाधीश के रूप में राजा भोज
मध्यकालीन भारत में राजा केवल शासक नहीं — सर्वोच्च न्यायाधीश भी था। Raja Bhoja ने इस भूमिका को अपने शासन-दर्शन का केंद्र बनाया।
व्यक्तिगत दायित्व: धर्मशास्त्र की परंपरा में राजा का न्यायिक दायित्व व्यक्तिगत था। यदि राजा अन्याय करे या अन्याय को अनदेखा करे, तो उसे स्वयं उस पाप का भागी माना जाता था। यह धार्मिक-नैतिक दबाव राजाओं को जवाबदेह बनाता था।
सार्वजनिक सुनवाई: परमार काल में राजदरबार सार्वजनिक रूप से खुला था। जनसाधारण अपनी फरियाद लेकर दरबार में आ सकते थे। यह परंपरा ‘दरबारे-आम’ की पूर्ववर्ती थी।

निर्णय-प्रक्रिया: राजा के पास विद्वान अमात्य और धर्मशास्त्र के ज्ञाता पंडित होते थे जो जटिल मामलों में परामर्श देते थे। अंतिम निर्णय राजा का होता था।
भोज का विद्वत्तापूर्ण दृष्टिकोण: भोज स्वयं एक उच्चकोटि के विद्वान थे। धर्मशास्त्र और राजनीतिशास्त्र का उनका ज्ञान उन्हें एक सुविचारित न्यायाधीश बनाता था। उनके ग्रंथों में न्याय-दर्शन की जो विवेचना है, वह उनके व्यावहारिक न्यायिक दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित करती है।
परंपरा और साक्ष्य में अंतर: ‘भोज-प्रबंध’ जैसे परवर्ती ग्रंथों में Raja Bhoja के अनेक न्यायिक निर्णयों की कथाएँ हैं। ये प्रेरणादायक हैं परंतु ऐतिहासिक दृष्टि से इन्हें प्राथमिक स्रोत नहीं माना जा सकता।
विधि के स्रोत
परमार काल में न्यायिक निर्णय किस आधार पर होते थे — यह समझना महत्वपूर्ण है।
धर्मशास्त्र: मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, नारदस्मृति और बृहस्पतिस्मृति जैसे ग्रंथ विधिक संहिताओं का काम करते थे। संपत्ति-अधिकार, विवाह-विधि, उत्तराधिकार, और दंड-व्यवस्था — इन सबके सिद्धांत इन ग्रंथों में थे।
स्थानीय रीति-रिवाज: धर्मशास्त्र की मान्यता थी कि जब शास्त्रीय विधि स्थानीय परंपरा से टकराए, तो परंपरा को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह लचीलापन न्याय-व्यवस्था को जन-सामान्य के जीवन से जोड़ता था।

राजाज्ञा: राजा के आदेश (शासनपत्र) भी विधि के स्रोत थे। भूमि-अनुदान, व्यापारिक अधिकार और करारोपण से संबंधित राजकीय आदेश अभिलेखों में दर्ज किए जाते थे।
विद्वानों की सलाह: Raja Bhoja के दरबार में धर्मशास्त्र के ज्ञाता पंडित और अनुभवी मंत्री थे जो जटिल मामलों में परामर्श देते थे। भोज की अपनी विद्वत्ता इस परामर्श को और प्रभावी बनाती थी।
व्यापारिक संघों के नियम: मध्यकालीन भारत में व्यापारिक संघ (श्रेणी) अपने आंतरिक विवादों का निपटान स्वयं करते थे। राज्य इन निर्णयों को मान्यता देता था।
दीवानी न्याय
परमार काल में दीवानी विवादों — भूमि, संपत्ति, परिवार और व्यापार से संबंधित — का निपटान एक महत्वपूर्ण न्यायिक कार्य था।
भूमि-विवाद: मध्यकालीन भारत में भूमि सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति थी। भूमि-सीमाओं के विवाद, स्वामित्व के दावे, और भूमि-अनुदानों की वैधता — ये सब सामान्य मामले थे। परमार अभिलेखों में भूमि-दान और उनकी सीमाओं का विस्तृत उल्लेख मिलता है जो यह दर्शाता है कि भूमि-स्वामित्व को आधिकारिक रूप से दर्ज किया जाता था।
पारिवारिक विवाद: उत्तराधिकार, विवाह-विच्छेद और स्त्री-धन से संबंधित विवाद धर्मशास्त्र के आधार पर सुलझाए जाते थे।

व्यापारिक विवाद: उज्जयिनी जैसे बड़े व्यापारिक नगरों में व्यापारियों के बीच विवाद प्रायः श्रेणी (व्यापारी संघ) के स्तर पर सुलझाए जाते थे। जटिल मामले नगर-न्यायालय तक पहुँचते थे।
साक्ष्य और गवाही: दीवानी मामलों में गवाहों की गवाही, लिखित दस्तावेज और शपथ — ये प्रमुख साक्ष्य-प्रकार थे। धर्मशास्त्र में गवाहों की विश्वसनीयता के मानदंड विस्तार से दिए गए थे।
दाण्डिक (आपराधिक) न्याय
आपराधिक न्याय मध्यकालीन भारत में ‘दण्डनीति’ के सिद्धांत पर आधारित था। दंड का उद्देश्य केवल सजा नहीं — बल्कि समाज की रक्षा और अपराधी का सुधार भी था।
अपराध की श्रेणियाँ: धर्मशास्त्र में अपराधों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया था — राज्य-विरोधी अपराध (राजद्रोह), व्यक्ति के विरुद्ध अपराध (हत्या, चोरी, बलात्कार), और सामाजिक व्यवस्था-विरोधी अपराध।
दंड-सिद्धांत: ‘समरांगणसूत्रधार’ और ‘युक्तिकल्पतरु’ में भोज ने दंड-नीति की विवेचना की है। दंड अपराध की गंभीरता और अपराधी की स्थिति के अनुसार होता था। यह व्यवस्था धर्मशास्त्र की परंपरा का पालन करती थी।

सार्वजनिक व्यवस्था: राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक शांति बनाए रखना राजा का प्राथमिक दायित्व था। चोरी, डकैती और सार्वजनिक उपद्रव के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाती थी।
महत्वपूर्ण सीमा: Raja Bhoja के काल में विशिष्ट अपराधों और उनके दंडों का कोई प्रत्यक्ष अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता। जो जानकारी उपलब्ध है वह सामान्य धर्मशास्त्र परंपरा और परमार काल की सामान्य पद्धतियों पर आधारित है।
न्यायिक प्रशासन में मंत्रियों और अधिकारियों की भूमिका
राजा अकेले संपूर्ण न्याय-व्यवस्था नहीं चला सकता था। एक कुशल अधिकारी-तंत्र इस व्यवस्था का आधार था।
महामंत्री (प्रधानमंत्री): राज्य के सर्वोच्च मंत्री राजा के मुख्य सलाहकार थे। न्यायिक मामलों में उनकी सलाह महत्वपूर्ण होती थी।
धर्माधिकारी: धर्मशास्त्र के ज्ञाता विशेषज्ञ जो जटिल विधिक प्रश्नों पर परामर्श देते थे। ये दरबार के ‘कानूनी विशेषज्ञ’ थे।
विषयपति और ग्रामपति: जिला और ग्राम स्तर पर ये अधिकारी न्यायिक कार्य करते थे। उनकी नियुक्ति राज्य करता था और उनका दायित्व था कि वे स्थानीय न्याय सुनिश्चित करें।

लेखक और अभिलेखकर्ता: न्यायिक निर्णयों को अभिलेखबद्ध करना महत्वपूर्ण था। भूमि-दान और अधिकार-पत्र ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण किए जाते थे जो स्थायी न्यायिक दस्तावेज थे।
भोज का प्रभाव: Raja Bhoja की विद्वत्ता और धर्मशास्त्र-ज्ञान ने उनके दरबार के न्यायिक प्रशासन को एक बौद्धिक गरिमा दी। उनके अधिकारी जानते थे कि राजा स्वयं इन विषयों के ज्ञाता हैं — इससे जवाबदेही बढ़ती थी।
न्याय और धर्म का संबंध
मध्यकालीन भारत में न्याय और धर्म अविभाज्य थे। भोज के न्याय-दर्शन में यह संबंध केंद्रीय था।
धर्म की केंद्रीयता: भारतीय न्याय-परंपरा में ‘धर्म’ केवल धार्मिक नियम नहीं था — यह सामाजिक नैतिकता, राजकीय कर्तव्य और व्यक्तिगत आचरण का समग्र सिद्धांत था। न्यायाधीश (राजा सहित) का दायित्व था कि वह ‘धर्म के अनुसार’ निर्णय करे।
भोज का शैव दर्शन और न्याय: Raja Bhoja शैव मतानुयायी थे। शैव दर्शन में ‘शिव’ सत्य, न्याय और करुणा का प्रतीक है। यह दार्शनिक पृष्ठभूमि Raja Bhoja के न्याय-दृष्टिकोण को प्रभावित करती थी।

मंदिर और न्याय: मंदिर मध्यकालीन भारत में केवल धार्मिक स्थल नहीं थे — वे सामुदायिक केंद्र भी थे जहाँ कभी-कभी विवादों का निपटान होता था और समझौते किए जाते थे।
धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक न्याय में संतुलन: ऐतिहासिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है कि परमार न्याय-व्यवस्था में धर्मशास्त्र के सिद्धांतों के साथ-साथ स्थानीय परंपराएँ और व्यावहारिक विचार भी महत्वपूर्ण थे।
ऐतिहासिक बहस
Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था के बारे में इतिहासकारों में कई महत्वपूर्ण प्रश्न विवादित हैं।
साहित्यिक स्रोतों की विश्वसनीयता: ‘भोज-प्रबंध’ जैसे परवर्ती ग्रंथों में Raja Bhoja के अनेक न्यायिक निर्णयों की कथाएँ हैं। आर. सी. मजूमदार और उपिंदर सिंह दोनों इन स्रोतों का उपयोग सावधानी से करने की सलाह देते हैं।
अभिलेखीय साक्ष्य की सीमा: एपिग्राफिया इंडिका में परमार अभिलेख मुख्यतः भूमि-दान और राजनीतिक घटनाओं से संबंधित हैं। न्यायिक प्रक्रियाओं का विस्तृत विवरण इनमें नहीं मिलता।

आदर्श और वास्तविकता का अंतर: धर्मशास्त्र में जो न्याय-आदर्श वर्णित है, वह हमेशा व्यवहार में पूरी तरह लागू नहीं होता था। भोज के काल में आदर्श और वास्तविकता का अंतर क्या था — यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।
D. C. सरकार का दृष्टिकोण: सरकार ने मध्यकालीन भारतीय शासन-व्यवस्था के अध्ययन में अभिलेखों की प्राथमिकता पर बल दिया। उनके अनुसार परवर्ती साहित्यिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी को सावधानीपूर्वक जाँचना आवश्यक है।
इतिहासकार की दृष्टि
भारतीय इतिहास के एक अध्येता के रूप में जब मैं Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था पर विचार करता हूँ, तो एक गहरी अनुभूति होती है — न्याय किसी भी शासक की सबसे बड़ी विरासत होती है। युद्ध में जीती भूमि समय के साथ बदल जाती है, किंतु प्रजा के मन में एक न्यायप्रिय राजा की स्मृति पीढ़ियों तक जीवित रहती है।
Raja Bhoja की न्यायप्रिय छवि — जो लोकश्रुति में आज भी जीवित है — यह बताती है कि उनकी न्याय-व्यवस्था ने प्रजा के मन में कुछ ऐसा छोड़ा जो युद्धों और मंदिरों से भी अधिक स्थायी था। एक राजा जो स्वयं विद्वान हो, जो धर्मशास्त्र को जानता हो, जो न्याय को राजधर्म का सर्वोच्च रूप मानता हो — ऐसे राजा का न्यायदरबार स्वाभाविक रूप से असाधारण होगा।

यह भी सत्य है कि हम उनकी न्याय-व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते — साक्ष्य सीमित हैं। परंतु जो जानते हैं, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि Raja Bhoja के दरबार में न्याय केवल एक औपचारिकता नहीं थी — वह एक सजीव और सक्रिय प्रक्रिया थी।
Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था के 15 अल्पज्ञात तथ्य
- Raja Bhoja की न्यायप्रिय छवि इतनी प्रबल थी कि ‘भोज’ शब्द हिंदी में आदर्श शासक का पर्याय बन गया।
- ‘युक्तिकल्पतरु’ में भोज ने राजनीतिशास्त्र के अंतर्गत न्याय-नीति की विवेचना की है।
- परमार अभिलेखों में भूमि-दान के जो विस्तृत विवरण हैं, वे एक व्यवस्थित न्यायिक-प्रशासनिक तंत्र का प्रमाण हैं।
- Raja Bhoja के दरबार में धर्मशास्त्र के विशेषज्ञ पंडित न्यायिक परामर्शदाता की भूमिका निभाते थे।
- ‘भोज-प्रबंध’ में वर्णित न्यायिक कथाएँ लोकस्मृति की अभिव्यक्ति हैं, प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोत नहीं।
- ग्राम सभा की स्वायत्तता परमार शासन का एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक तत्व था।
- भोज की विद्वत्ता ने उनके न्यायिक निर्णयों को एक बौद्धिक आधार दिया जो साधारण शासकों में दुर्लभ था।
- उज्जयिनी में व्यापारी संघों (श्रेणियों) को अपने आंतरिक विवाद सुलझाने का अधिकार था।
- भोज के शासन में ‘राजधर्म’ की अवधारणा — अर्थात् न्याय राजा का सर्वोच्च कर्तव्य है — केंद्रीय थी।
- ताम्रपत्र अभिलेख मध्यकालीन भारत में न्यायिक निर्णयों के स्थायी दस्तावेज थे।
- भोज के काल में मालवा में बौद्ध, जैन और शैव — सभी समुदायों को न्याय-व्यवस्था में समान अधिकार था।
- धर्मशास्त्र परंपरा में दंड-नीति के जो सिद्धांत थे, उनमें सुधार और पुनर्वास भी दंड के उद्देश्य माने जाते थे।
- Raja Bhoja के ‘समरांगणसूत्रधार’ में नगर-नियोजन के अंतर्गत न्यायालय-स्थान का भी उल्लेख है।
- परमार न्याय-व्यवस्था में स्त्रियों के संपत्ति-अधिकारों को धर्मशास्त्र के अनुसार मान्यता दी जाती थी।
- Raja Bhoja के शासन में व्यापारिक कर-विवादों का निपटान प्रायः नगर-स्तर पर होता था।
निष्कर्ष
धारानगरी के उस दरबार में जहाँ एक किसान न्याय माँगने आया था — वहाँ एक ऐसी व्यवस्था काम कर रही थी जो हजार साल बाद भी हमें प्रेरित करती है। वह व्यवस्था यह थी कि राजा का सबसे बड़ा दायित्व विजय नहीं — न्याय है।
Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था उनके शासन की वह अदृश्य नींव थी जिस पर उनकी बाकी सभी उपलब्धियाँ — ग्रंथ, मंदिर, विद्यापीठ — टिकी थीं। जब प्रजा को विश्वास था कि उनके राजा के दरबार में न्याय मिलेगा, तो वे उस राजा के साथ हर कठिनाई में खड़ी रहती थी।
यही कारण है कि Raja Bhoja की स्मृति आज भी जीवित है — ‘कहाँ राजा भोज’ — यह केवल उनकी महानता का स्मरण नहीं है, यह उस न्याय का स्मरण है जो उन्होंने अपनी प्रजा को दिया।
— इतिहास के एक जिज्ञासु अध्येता (Abhishek chavan) की कलम से
FAQ — Justice System of Raja Bhoja
प्रश्न 1: Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था किस सिद्धांत पर आधारित थी?
उत्तर: धर्मशास्त्र (मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति आदि), स्थानीय रीति-रिवाज और राजाज्ञा — इन तीन स्तंभों पर।
प्रश्न 2: क्या Raja Bhoja स्वयं न्यायाधीश का काम करते थे?
उत्तर: हाँ। मध्यकालीन भारत में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। भोज की विद्वत्ता ने इस भूमिका को और प्रभावशाली बनाया।
प्रश्न 3: परमार काल में ग्राम-स्तर पर न्याय कैसे होता था?
उत्तर: ग्राम सभाएँ स्थानीय विवादों का निपटान करती थीं। ग्रामपति और वरिष्ठ नागरिकों की समिति न्याय करती थी।
प्रश्न 4: Raja Bhoja की न्याय-व्यवस्था के बारे में जानकारी के क्या स्रोत हैं?
उत्तर: एपिग्राफिया इंडिका के परमार अभिलेख, ‘युक्तिकल्पतरु’, और R.C. Majumdar, Upinder Singh के ऐतिहासिक विश्लेषण।
प्रश्न 5: क्या Raja Bhoja के समय सभी नागरिकों को समान न्याय मिलता था?
उत्तर: धर्मशास्त्र की परंपरा में वर्ण के अनुसार भेद था। पूर्णतः समान न्याय का दावा ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
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