Narvir Pilaji Gole

⚔️👑 Narvir Pilaji Gole: 7 Unbreakable, Legendary & Untold Facts — शिवाजी महाराज की पैदल सेना के महानायक की शौर्य, रणनीति और अमर गाथा! 🛡️🔥

👑⚔️ Narvir Pilaji Gole — शिवाजी महाराज के सरनोबत और पिरंगुट का गौरव

मराठा साम्राज्य की गाथाओं में Narvir Pilaji Gole का नाम वीर सरनोबत और पिरंगुट वाडा के संस्थापक के रूप में दर्ज है। वे वह रणधुरंधर थे जिन्होंने शिवाजी महाराज की सेनाओं का नेतृत्व किया, मराठा शक्ति का विस्तार किया और स्वराज्य की रक्षा में निर्णायक योगदान दिया। उनकी पहचान केवल एक योद्धा तक सीमित नहीं—वे निष्ठा और साहस के प्रतीक भी थे जिनकी विरासत आज भी पिरंगुट समाधिस्थल और नरवीर पिलाजी गोले वाडा में जीवित है। मराठा‑मुगल संघर्ष और साम्राज्य निर्माण की इस गाथा में उनका नाम अमर, भूमिका निर्णायक और विरासत प्रेरणादायी है। अगर यह विस्मृत इतिहास आपको गर्व से भरता है, तो इसे शेयर करें—क्योंकि साम्राज्य की जीतें केवल तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति, निष्ठा और दूरदर्शिता से टिकती हैं। 👑⚔️

🛡️ परिचय: जब पैदल सेना ने रचा स्वराज्य का इतिहास

17वीं शताब्दी का भारत – जब मुगल साम्राज्य और दक्कन के सल्तनतें अपनी विशाल सेनाओं पर गर्व करते थे, तब एक युवा मराठा योद्धा ने यह साबित कर दिया कि जीत संख्या में नहीं, बल्कि रणनीति, अनुशासन और भूभाग की समझ में होती है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी सैन्य व्यवस्था को दो मुख्य भागों में विभाजित किया था – घुड़सवार सेना (अश्वदल) और पैदल सेना (पियादल)

जहां घुड़सवार सेना मैदानी इलाकों में तेज हमलों के लिए प्रसिद्ध थी, वहीं पैदल सेना सह्याद्री की पहाड़ियों, घने जंगलों और किलों की रक्षा में अपराजेय थी। इसी पैदल सेना के सर्वोच्च कमांडर, जिन्हें ‘सरनौबत’ का सम्मानित पद दिया गया था, वे थे Narvir Pilaji Gole। उनका नाम भले ही इतिहास की मुख्यधारा में उतना प्रसिद्ध न हो, लेकिन मराठा सैन्य इतिहास में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

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सह्याद्री की पहाड़ियां, जिन्हें आज हम पश्चिम घाट कहते हैं, उन दिनों रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। इन पहाड़ियों पर स्थित किले – रायगड, प्रतापगड, सिंहगड, वैरातगड – ये केवल पत्थर की संरचनाएं नहीं थीं, बल्कि स्वराज्य की रीढ़ थे। इन किलों को बचाने, इन पर हमला करने, और दुश्मनों से रक्षा करने के लिए जिस प्रकार के सैनिकों की आवश्यकता थी, वे थे मावला पैदल सेना – और इन्हीं योद्धाओं को संगठित, प्रशिक्षित और नेतृत्व प्रदान करने वाले थे सरनौबत Narvir Pilaji Gole।

Narvir Pilaji Gole का जन्म एक सैनिक परिवार में हुआ था। गोळे वंश पीढ़ियों से मराठा सेना में सेवारत था और शिवाजी महाराज के पिता शहाजी भोसले के समय से ही इस परिवार का सैन्य क्षेत्र में योगदान रहा है। जब शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य की नींव रखी, तब उन्होंने केवल योग्यता के आधार पर अपने सेनापतियों का चयन किया – और Narvir Pilaji Gole उन चुनिंदा योद्धाओं में से एक थे जिन पर शिवाजी महाराज को पूर्ण विश्वास था।

आइए अब जानते हैं उन 7 अद्भुत तथ्यों को जो Narvir Pilaji Gole के जीवन और योगदान को उजागर करते हैं।

⚔️ सरनौबत का पद – मराठा सैन्य व्यवस्था में दूसरा सबसे शक्तिशाली सैन्य अधिकारी

शिवाजी महाराज की प्रशासनिक व्यवस्था में अष्टप्रधान मंडल (आठ मंत्रियों की परिषद) सर्वोच्च शासकीय निकाय था। इस मंडल में सेनापति (प्रधान सेनापति) सैन्य मामलों का सर्वोच्च अधिकारी होता था। लेकिन सेना के दिन-प्रतिदिन के संचालन और युद्ध क्षेत्र में व्यावहारिक नेतृत्व के लिए सरनौबत का पद सर्वाधिक महत्वपूर्ण था।

मराठा सेना में दो प्रकार के सरनौबत होते थे – घुड़सवार सेना के सरनौबत और पैदल सेना के सरनौबत। Narvir Pilaji Gole को पैदल सेना का सरनौबत बनाया गया था, जो उनकी योग्यता, अनुभव और विश्वसनीयता का प्रमाण था।

सरनौबत की जिम्मेदारियां और शक्तियां

सरनौबत केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं होता था – वह संपूर्ण पैदल सेना का संगठनकर्ता, प्रशिक्षक, रणनीतिकार और नेता होता था। Narvir Pilaji Gole की मुख्य जिम्मेदारियां थीं:

1. सेना का गठन और संगठन: Narvir Pilaji Gole के नेतृत्व में पैदल सेना को विभिन्न इकाइयों में विभाजित किया गया था। सबसे छोटी इकाई हवलदार के अधीन होती थी, जिसमें 10-20 सैनिक होते थे। फिर जुमलेदार के अधीन 50-100 सैनिकों की टुकड़ी होती थी। इन सभी इकाइयों का सर्वोच्च कमांडर सरनौबत होता था।

2. सैनिकों की भर्ती और चयन: शिवाजी महाराज ने जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया। Narvir Pilaji Gole भी इसी सिद्धांत पर चलते थे। उन्होंने मावल क्षेत्र (पुणे के पश्चिम में पहाड़ी इलाका), कोंकण क्षेत्र, और दक्कन के विभिन्न भागों से सैनिकों की भर्ती की। मावल क्षेत्र के कुणबी, मराठा और कोली जातियों के लोग पहाड़ों पर चढ़ने, जंगलों में लड़ने और कठिन परिस्थितियों को सहने में माहिर थे।

3. प्रशिक्षण और युद्ध कौशल विकास: Narvir Pilaji Gole ने अपने सैनिकों को कई प्रकार के युद्ध कौशल में प्रशिक्षित किया:

  • पहाड़ी युद्ध: चट्टानों पर चढ़ना, संकरे रास्तों पर लड़ना, ऊंचाई से पत्थर फेंकना
  • हथियार प्रशिक्षण: तलवार (तलवारबाजी), भाला (भालाबाजी), ढाल का उपयोग, और विशेष रूप से मैचलॉक बंदूक (मस्कट) चलाना
  • छापामार युद्ध (गनीमी कावा): अचानक हमला, दुश्मन को भ्रमित करना, और सुरक्षित स्थान पर पीछे हटना
  • किला रक्षा: किले की दीवारों से लड़ना, सीढ़ियों की रक्षा, और घेराबंदी के दौरान टिके रहना
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4. वेतन और अनुशासन: शिवाजी महाराज ने जागीर प्रथा को समाप्त कर दिया और सभी सैनिकों को नकद वेतन देने की व्यवस्था की। सरनौबत को 4,000 से 5,000 होन प्रति वर्ष का वेतन मिलता था (1 होन = लगभग 16 आना), जो उस समय बहुत बड़ी राशि थी। साधारण पैदल सैनिक को लगभग 60-100 होन प्रति वर्ष मिलता था। Narvir Pilaji Gole सेना में कड़ा अनुशासन बनाए रखते थे – किसी भी प्रकार की लूटपाट, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, या ब्राह्मणों का अपमान करने पर कड़ी सजा दी जाती थी।

पैदल सेना की संरचना

Narvir Pilaji Gole के नेतृत्व में मराठा पैदल सेना की संरचना इस प्रकार थी:

मावला पैदल सेना: ये मराठा पैदल सेना की रीढ़ थे। सबासद बखर (शिवाजी महाराज की जीवनी) के अनुसार, शिवाजी महाराज के पास लगभग 1,00,000 मावला पैदल सैनिक थे। ये योद्धा हल्के हथियार (तलवार, ढाल, भाला) लेकर चलते थे, जिससे वे तेजी से चल सकते थे। इनकी विशेषता थी कि ये दिन में 40-50 किलोमीटर तक पैदल चल सकते थे।

हेतकरी मस्केटियर्स: कोंकण क्षेत्र से भर्ती किए गए ये विशेष बंदूकधारी सैनिक मैचलॉक बंदूक में माहिर थे। ये दूर से सटीक निशाना लगा सकते थे और किले की रक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

तेलंगी मस्केटियर्स: कर्नाटक क्षेत्र से आए ये बंदूकधारी भी मराठा सेना का हिस्सा थे। इन्हें विशेष रूप से तोपखाना संचालन और भारी हथियारों में प्रशिक्षित किया जाता था।

Narvir Pilaji Gole ने इन सभी इकाइयों को इस प्रकार संगठित किया कि वे युद्ध के समय एक-दूसरे का समर्थन कर सकें। उनकी रणनीति थी – पहले हेतकरी मस्केटियर्स दूर से गोलीबारी करते, फिर मावला पैदल सेना तलवार और भाले से हमला करती, और यदि आवश्यकता हो तो तेलंगी मस्केटियर्स भारी गोलाबारी से समर्थन देते।

यह सैन्य संगठन इतना प्रभावी था कि इसी आधार पर बाद में मराठा लाइट इन्फेंट्री का गठन हुआ, जो आज भी भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सम्मानित रेजिमेंट है।

🏰 वैरातगड किले का किल्लेदार – 1673 से 1689 तक 16 वर्षों का शानदार प्रशासन

Narvir Pilaji Gole केवल युद्ध के मैदान में ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक कुशलता में भी माहिर थे। शिवाजी महाराज ने उन्हें वैरातगड किले का किल्लेदार (कमांडेंट) नियुक्त किया – यह पद उनकी विश्वसनीयता और प्रशासनिक क्षमता का प्रमाण था।

वैरातगड किले का सामरिक महत्व

वैरातगड (जिसे वैराटगड या वेरुलगड भी कहा जाता है) सातारा जिले के वाई क्षेत्र में स्थित एक पहाड़ी किला है। यह किला:

भौगोलिक स्थिति: समुद्र तल से लगभग 3,850 फीट (1,173 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है। किले का आकार त्रिकोणीय है और यह लगभग 9 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। किले पर पहुंचने के लिए लगभग 500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह किला मूल रूप से 11वीं शताब्दी में शिलाहार राजा भोज द्वितीय (1178-1193 ई.) ने बनवाया था। बाद में यह आदिलशाही सल्तनत (बीजापुर) के अधीन आ गया। शिवाजी महाराज ने 1673 में इस किले को आदिलशाही से जीत लिया और स्वराज्य में शामिल किया।

सामरिक महत्व: वैरातगड किला वाई क्षेत्र की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। यह किला सातारा (जो बाद में मराठा राजधानी बना) और पुणे के बीच स्थित है। यहां से कृष्णा नदी की घाटी और आसपास के इलाके पर निगरानी रखी जा सकती थी। दुश्मन यदि दक्षिण से उत्तर की ओर (या विपरीत) बढ़ता, तो वैरातगड से उसे रोका जा सकता था।

Narvir Pilaji Gole का 16 वर्षों का प्रशासन (1673-1689)

1673 से 1689 तक – पूरे 16 वर्षों तक Narvir Pilaji Gole ने वैरातगड किले का सफल प्रशासन किया। यह समय अत्यंत कठिन था क्योंकि:

1666-1680: शिवाजी महाराज का शासनकाल – इस दौरान मुगलों और आदिलशाही के साथ लगातार युद्ध
1680-1689: संभाजी महाराज का शासनकाल – और भी अधिक दबाव, क्योंकि औरंगजेब स्वयं दक्कन में आ गया था

इन 16 वर्षों में Narvir Pilaji Gole ने निम्नलिखित कार्य किए:

सैन्य प्रबंधन:

  • किले पर स्थायी रूप से 500-700 पैदल सैनिकों की तैनाती
  • युद्ध सामग्री का भंडारण – तोपें, गोला-बारूद, तीर-कमान, तलवारें
  • किले की दीवारों और बुर्जों का नियमित रखरखाव
  • रात्रि पहरेदारी और गश्त की व्यवस्था
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जल प्रबंधन:
किले पर 5-6 पानी के टांके (जलाशय) हैं। Narvir Pilaji Gole ने इन टांकों की नियमित सफाई और रखरखाव सुनिश्चित किया। घेराबंदी के समय पानी की व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती थी – और उन्होंने हमेशा पर्याप्त पानी का भंडारण बनाए रखा।

खाद्यान्न भंडारण:
किले पर अनाज, दालें, तेल, और अन्य आवश्यक सामग्री का भंडारण किया जाता था। Narvir Pilaji Gole यह सुनिश्चित करते थे कि कम से कम 6 महीने की घेराबंदी का सामना करने लायक खाद्यान्न हमेशा उपलब्ध रहे।

धार्मिक और सांस्कृतिक संरक्षण:
किले पर हनुमान मंदिर और वैरातेश्वर शिव मंदिर स्थित हैं। Narvir Pilaji Gole ने इन मंदिरों का रखरखाव किया और नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्था की। सैनिकों का मनोबल बनाए रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक था।

प्रशासनिक व्यवस्था:
Narvir Pilaji Gole ने किले पर निम्नलिखित अधिकारियों की नियुक्ति की:

  • सबनीस (लेखाकार) – वेतन, भंडारण, और खर्च का हिसाब रखने के लिए
  • करखानीस (युद्ध सामग्री प्रबंधक) – हथियारों और गोला-बारूद की देखभाल
  • फडनवीस (लिपिक) – सभी प्रशासनिक दस्तावेजों का रखरखाव

स्थानीय संबंध:
Narvir Pilaji Gole ने आसपास के गांवों के पाटील (मुखिया) और देशमुख (बड़े जमींदार) के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे। इससे किले को नियमित रूप से आपूर्ति मिलती रही और स्थानीय लोग स्वराज्य के प्रति वफादार रहे।

Narvir Pilaji Gole का यह 16 वर्षों का सफल प्रशासन इस बात का प्रमाण है कि वे केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और रणनीतिकार भी थे।

🗡️ शिवाजी महाराज की सैन्य रणनीति में पैदल सेना की महत्वपूर्ण भूमिका

शिवाजी महाराज ने अपनी सैन्य व्यवस्था में एक क्रांतिकारी निर्णय लिया – उन्होंने पैदल सेना को घुड़सवार सेना से अधिक महत्व दिया। यह निर्णय उस समय की परंपरा के विपरीत था, क्योंकि मुगल और दक्कन की सल्तनतें घुड़सवार सेना को सर्वोच्च मानती थीं।

शिवाजी महाराज ने पैदल सेना को प्राथमिकता क्यों दी?

भौगोलिक कारण:
सह्याद्री की पहाड़ियां, घने जंगल, संकरे रास्ते और खड़ी चढ़ाइयां – इन सभी जगहों पर घोड़े बेकार थे। पैदल सैनिक न केवल तेजी से चल सकते थे, बल्कि चट्टानों पर भी चढ़ सकते थे। तानाजी मालुसरे ने सिंहगड किले पर हमला करते समय पैदल सेना का ही उपयोग किया था।

आर्थिक कारण:
अच्छे युद्ध घोड़े उत्तर भारत से मंगाने पड़ते थे, और उन बाजारों पर मुगलों का नियंत्रण था। एक अच्छे घोड़े की कीमत 200-500 होन होती थी, जबकि एक पैदल सैनिक को प्रति वर्ष केवल 60-100 होन खर्च आता था। इसके अलावा, घोड़ों के लिए चारा, देखभाल, और अस्तबल की भी आवश्यकता होती थी।

सामरिक लाभ:
पैदल सेना गनीमी कावा (छापामार युद्ध) में अधिक प्रभावी थी। वे जंगलों में छुप सकते थे, अचानक हमला कर सकते थे, और तुरंत किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच सकते थे। घुड़सवार सेना के लिए यह संभव नहीं था।

Narvir Pilaji Gole द्वारा प्रशिक्षित मावला योद्धा

मावला शब्द का अर्थ है मावल क्षेत्र का निवासी। मावल क्षेत्र पुणे के पश्चिम में पहाड़ी इलाका है, जिसे बावन मावल (52 घाटियां) भी कहा जाता है। इस क्षेत्र के लोग पीढ़ियों से पहाड़ों पर रहते आए थे और उन्हें हर चट्टान, हर गुफा, और हर रास्ते की जानकारी थी।

पिलाजी गोळे ने इन मावला योद्धाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया:

पहाड़ी युद्ध कौशल:

  • रस्सी का उपयोग करके लंबवत चट्टानों पर चढ़ना
  • रात के अंधेरे में बिना रोशनी के चलना
  • पहाड़ों की गुफाओं में छुपना और घात लगाना
  • ऊंचाई से पत्थर लुढ़काकर दुश्मन को रोकना

हथियार प्रशिक्षण:

  • तलवार (तलवारबाजी): करीबी लड़ाई के लिए
  • भाला (भालाबाजी): दूर से फेंककर या करीब से वार करने के लिए
  • ढाल: दुश्मन के वार से बचाव और काउंटर अटैक
  • मस्कट बंदूक: कोंकण क्षेत्र के हेतकरी विशेष रूप से इसमें प्रशिक्षित थे
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गनीमी कावा (छापामार युद्ध):
पिलाजी गोळे ने अपने सैनिकों को सिखाया:

  • अचानक हमला करो – दुश्मन को तैयार होने का मौका मत दो
  • छोटी टुकड़ियों में बंट जाओ – एक बड़ी सेना की तुलना में कई छोटी टुकड़ियां अधिक प्रभावी
  • हमला करने के बाद तुरंत पीछे हटो – किसी सुरक्षित किले या जंगल में
  • दुश्मन की आपूर्ति लाइन को तोड़ो – भोजन, पानी, गोला-बारूद की सप्लाई रोक दो

अनुशासन और टीम वर्क:
शिवाजी महाराज और पिलाजी गोळे दोनों ही सेना में कड़ा अनुशासन रखते थे। किसी भी सैनिक को निम्नलिखित कार्य करने की अनुमति नहीं थी:

  • महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार
  • ब्राह्मणों या धार्मिक स्थलों को नुकसान
  • किसानों की फसल नष्ट करना
  • बिना आदेश के लूटपाट करना

यदि कोई सैनिक इन नियमों को तोड़ता, तो उसे कड़ी सजा दी जाती थी – कभी-कभी मृत्युदंड तक।

पैदल सेना की संरचना और युद्ध रणनीति

Narvir Pilaji Gole ने पैदल सेना को इस प्रकार संगठित किया:

पहली पंक्ति – हेतकरी मस्केटियर्स:
युद्ध शुरू होने पर सबसे पहले ये बंदूकधारी दुश्मन पर गोलीबारी करते। इनका लक्ष्य था दुश्मन के अधिकारियों, घुड़सवारों, और हाथियों को निशाना बनाना। मैचलॉक बंदूक की रेंज लगभग 100-150 मीटर थी।

दूसरी पंक्ति – भाला धारी मावला:
बंदूकधारी के पीछे भाला धारी सैनिक होते थे। जब दुश्मन करीब आ जाता, तो ये अपने भाले फेंकते या उनसे वार करते। भाले की रेंज लगभग 30-50 मीटर थी।

तीसरी पंक्ति – तलवारबाज:
जब दुश्मन बिल्कुल करीब आ जाता, तो तलवारबाज आगे आते और हाथापाई की लड़ाई शुरू होती। ये सैनिक ढाल से बचाव करते और तलवार से वार करते।

चौथी पंक्ति – आरक्षित सेना:
कुछ सैनिक पीछे रिजर्व में रखे जाते थे। यदि किसी जगह दुश्मन भारी पड़ रहा हो, तो वहां ये सैनिक भेजे जाते। या फिर दुश्मन के पीछे से हमला करने के लिए भी इनका उपयोग होता था।

यह व्यवस्था इतनी प्रभावी थी कि उम्बरखिंड युद्ध (1661) में Narvir Pilaji Gole के प्रशिक्षित पैदल सैनिकों ने 30,000 मुगल सेना को घने जंगल में घेरकर हराया था।

🏔️ शिवाजी महाराज की आगरा से मुक्ति के समय किलों की सुरक्षा में भूमिका

1666 का वर्ष मराठा इतिहास का सबसे कठिन समय था। पुरंदर की संधि (जून 1665) के बाद शिवाजी महाराज को कई किले मुगलों को सौंपने पड़े थे और मई 1666 में वे औरंगजेब की बुलाहट पर आगरा गए। लेकिन आगरा में उन्हें बंदी बना लिया गया।

स्वराज्य पर संकट के बादल

शिवाजी महाराज की अनुपस्थिति में मराठा साम्राज्य पर कई खतरे मंडरा रहे थे:

मुगल खतरा:
औरंगजेब ने सोचा कि शिवाजी के बिना मराठा साम्राज्य आसानी से ध्वस्त हो जाएगा। उसने अपने सेनापति जय सिंह प्रथम और शाइस्ता खान को आदेश दिया कि शेष किलों को भी जीत लिया जाए।

आदिलशाही का दबाव:
बीजापुर की सल्तनत भी इस मौके का फायदा उठाना चाहती थी। उन्होंने दक्षिण से स्वराज्य पर दबाव बढ़ाया।

आंतरिक चुनौतियां:
कुछ स्थानीय सरदार जो शिवाजी महाराज के डर से वफादार थे, अब विद्रोह करने की सोचने लगे।

Narvir Pilaji Gole और अन्य सेनापतियों की जिम्मेदारी

ऐसे कठिन समय में राजमाता जीजाबाई, मोरोपंत पिंगले (प्रधान मंत्री), और सैन्य कमांडरों ने मिलकर स्वराज्य को संभाला:

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घुड़सवार सेना का नेतृत्व:
प्रतापराव गुजर (घुड़सवार सेना के सरनौबत) ने अपनी सेना के साथ सीमाओं की रक्षा की और मुगलों के छोटे-मोटे हमलों को विफल किया।

पैदल सेना और किलों की सुरक्षा:
Narvir Pilaji Gole (पैदल सेना के सरनौबत) ने सभी महत्वपूर्ण किलों को मजबूत किया। उन्होंने:

  • हर किले पर पर्याप्त सैनिक तैनात किए
  • खाद्यान्न और गोला-बारूद का भंडारण सुनिश्चित किया
  • किलेदारों को सख्त आदेश दिया कि किसी भी परिस्थिति में किला न सौंपें
  • रात्रि गश्त और निगरानी बढ़ा दी

रंगना किले की विजय (1666):
शिवाजी महाराज की अनुपस्थिति में भी मराठा सेना ने रंगना किला आदिलशाही से जीत लिया। इस विजय में प्रतापराव गुजर और Narvir Pilaji Gole की संयुक्त सेना ने भाग लिया। यह विजय दुश्मनों को संदेश थी कि शिवाजी के बिना भी स्वराज्य मजबूत है।

शिवाजी महाराज की वापसी (अगस्त 1666)

जब शिवाजी महाराज टोकरी में छुपकर आगरा से भागने में सफल हुए और अगस्त 1666 में रायगड लौटे, तो उन्होंने पाया कि उनकी अनुपस्थिति में:

  • एक भी किला दुश्मनों के हाथ नहीं गया
  • सेना का मनोबल बना हुआ था
  • स्थानीय सरदार वफादार रहे
  • बल्कि एक नया किला (रंगना) जीत लिया गया था

यह सब Narvir Pilaji Gole, प्रतापराव गुजर, मोरोपंत पिंगले और अन्य वफादार सेवकों के कारण संभव हुआ। शिवाजी महाराज ने इन सभी की प्रशंसा की और उन्हें पुरस्कृत किया।

Narvir Pilaji Gole के लिए यह समय उनकी वफादारी, कुशल नेतृत्व और रणनीतिक समझ का सबसे बड़ा प्रमाण था।

👨‍👩‍👦 गोळे वंश की गौरवशाली विरासत – 350 वर्षों से जीवित परंपरा

Narvir Pilaji Gole की सबसे बड़ी विरासत केवल उनके युद्ध कौशल या प्रशासनिक क्षमता में नहीं, बल्कि उनके वंश में है। गोळे परिवार ने पीढ़ी दर पीढ़ी मराठा इतिहास को संरक्षित रखा है और आज भी अपने पूर्वजों की विरासत को जिंदा रखे हुए हैं।

गोळे वंश का 350 वर्षों का इतिहास

17वीं शताब्दी से लेकर 21वीं शताब्दी तक – लगभग 14-15 पीढ़ियों तक गोळे परिवार ने मराठा विरासत को संभाला है। Narvir Pilaji Gole के बाद उनके पुत्र और पौत्र भी मराठा सेना में सेवा करते रहे। जब पेशवा शासन आया, तब भी गोळे परिवार को सम्मान मिलता रहा।

18वीं और 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश शासन आया, तब भी गोळे परिवार ने अपनी पहचान नहीं खोई। वे पिरंगुट गांव में बसे रहे और अपने पूर्वजों की समाधि का रखरखाव करते रहे। परिवार के बुजुर्ग युवा पीढ़ी को Narvir Pilaji Gole की कहानियां सुनाते रहे।

14वीं पीढ़ी का योद्धा – मारुती अभा गोळे

Narvir Pilaji Gole के 14वें वंशज मारुती अभा गोळे ने अपने पूर्वजों की विरासत को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। उन्होंने किलों पर चढ़ने को केवल एक शौक नहीं, बल्कि मराठा इतिहास को जीवित रखने का मिशन बनाया।

विश्व रिकॉर्ड:
मारुती अभा गोळे ने 30 दिसंबर 2023 तक 1,374 किलों पर चढ़ाई करके विश्व रिकॉर्ड बनाया। ये किले केवल भारत में ही नहीं, बल्कि नेपाल, श्रीलंका, और अन्य देशों में भी हैं। वे दुनिया में सबसे अधिक किलों पर चढ़ने वाले पहले व्यक्ति हैं।

गरुड़झेप मोहिम:
मारुती गोळे ने “गरुड़झेप” (ईगल की उड़ान) नाम से एक सामाजिक संगठन बनाया है। इस संगठन का उद्देश्य है:

  • युवाओं को मराठा इतिहास से जोड़ना
  • किलों पर ट्रेकिंग का प्रोत्साहन देना
  • शिवाजी महाराज के आदर्शों को फैलाना
  • पर्यावरण संरक्षण
  • किलों की सफाई और रखरखाव

Run Pirangut Run मैराथन:
हर साल मारुती गोळे पिरंगुट में एक मैराथन आयोजित करते हैं। यह मैराथन पिलाजी गोळे की समाधि से शुरू होती है। इसमें:

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  • हाफ मैराथन (21 KM)
  • 10 KM दौड़
  • बच्चों के लिए छोटी दौड़ें

यह कार्यक्रम मराठा इतिहास और आधुनिक फिटनेस को जोड़ने वाला एक अनूठा प्रयास है। हजारों लोग इसमें भाग लेते हैं और पिलाजी गोळे को श्रद्धांजलि देते हैं।

परिवार का योगदान

केवल मारुती गोळे ही नहीं, बल्कि पूरा गोळे परिवार मराठा विरासत संरक्षण में लगा हुआ है:

समाधि का रखरखाव:
पिरंगुट में स्थित पिलाजी गोळे की समाधि का परिवार नियमित रूप से रखरखाव करता है। हर साल गुढीपाडवा (मराठा नववर्ष) और शिव जयंती पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

इतिहास का दस्तावेजीकरण:
परिवार के पास पुराने दस्तावेज, पत्र, और मौखिक इतिहास सुरक्षित है। वे इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के साथ मिलकर काम करते हैं।

शिक्षा और जागरूकता:
गोळे परिवार स्थानीय स्कूलों में जाकर बच्चों को मराठा इतिहास के बारे में बताता है। वे किलों पर यात्राएं आयोजित करते हैं और युवाओं को प्रोत्साहित करते हैं।

यह परिवार जीता-जागता सबूत है कि सच्ची विरासत वही होती है जो पीढ़ियों तक जीवित रहे। पिलाजी गोळे भले ही 300 साल पहले गुजर गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी हजारों लोगों को प्रेरित कर रही है।

🕉️ पिरंगुट में स्थित समाधिस्थल – मराठा इतिहास का तीर्थस्थल

पुणे जिले के मुळशी तालुका में स्थित पिरंगुट गांव मराठा इतिहास प्रेमियों के लिए एक पवित्र स्थान है। यहां स्थित सरनौबत नरवीर Narvir Pilaji Gole की समाधि केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि मराठा वीरता और बलिदान का प्रतीक है।

पिरंगुट का ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व

नाम की उत्पत्ति:
पिरंगुट का पुराना नाम “प्रियंगुवात” या “प्रियवंतन” था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह नाम “प्रियंगु” (एक प्राचीन पौधा) से आया है जो इस क्षेत्र में उगता था। समय के साथ यह “पिरंगुट” बन गया।

भौगोलिक स्थिति:

  • पुणे शहर से लगभग 25-30 किलोमीटर दूर पश्चिम में
  • मुळशी झील के पास
  • मुळशी-पनवेल रोड पर स्थित
  • समुद्र तल से लगभग 600-700 मीटर की ऊंचाई पर

ऐतिहासिक महत्व:
पिरंगुट शिवाजी महाराज के समय से ही अस्तित्व में है। कुछ इतिहासकार इसे हिंदवी स्वराज्य का पहला गांव मानते हैं। यह गांव मावल क्षेत्र का हिस्सा है, जहां से शिवाजी महाराज ने अपने सबसे वफादार सैनिक लिए थे।

समाधिस्थल की विशेषताएं

Narvir Pilaji Gole की समाधि एक पारंपरिक मराठा शैली की संरचना है:

स्थापत्य:

  • पत्थर से बनी एक ऊंची वेदी
  • ऊपर एक छोटा गुंबद या छत्री
  • सामने एक छोटा मंच जहां श्रद्धांजलि दी जाती है
  • आसपास साफ-सुथरा परिसर

नियमित पूजा और श्रद्धांजलि:
स्थानीय लोग और गोळे परिवार नियमित रूप से:

  • फूल चढ़ाते हैं
  • दीप जलाते हैं
  • मराठा युद्ध घोष बोलते हैं: “छत्रपति शिवाजी महाराज की जय!”

वार्षिक कार्यक्रम:
हर साल कई विशेष कार्यक्रम होते हैं:

1. गुढीपाडवा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा – मार्च/अप्रैल):
मराठा नववर्ष के दिन विशेष समारोह होता है। सैकड़ों लोग आते हैं, पिलाजी गोळे को याद करते हैं, और मराठा गौरव के गीत गाते हैं।

2. शिव जयंती (19 फरवरी):
शिवाजी महाराज के जन्मदिन पर पिलाजी गोळे को भी विशेष श्रद्धांजलि दी जाती है। इस दिन मराठा इतिहास पर विशेष व्याख्यान होते हैं।

3. Run Pirangut Run मैराथन (दिसंबर):
यह मैराथन समाधि से शुरू होती है। धावक पहले समाधि पर श्रद्धांजलि देते हैं, फिर दौड़ शुरू करते हैं।

4. किला ट्रेकिंग समूहों की यात्रा:
पूरे साल विभिन्न ट्रेकिंग समूह (जैसे गरुड़झेप, महाराष्ट्र मंडल, आदि) यहां आते हैं। वे अपनी किला यात्रा से पहले या बाद में यहां रुककर श्रद्धांजलि देते हैं।

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पर्यटकों के लिए जानकारी

कैसे पहुंचें:

  • पुणे से: कोथरूड होते हुए मुळशी रोड से (लगभग 1 घंटा)
  • PMPML बसें: पुणे से पिरंगुट के लिए नियमित बसें
  • निजी वाहन: पुणे-मुळशी-तांसगांव रोड से

समय:
समाधि स्थल पूरे साल खुला रहता है। सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक का समय सबसे उपयुक्त है।

निकटवर्ती आकर्षण:

  • मुळशी बांध और झील (10 KM)
  • लवासा शहर (20 KM)
  • वैरातगड किला (सातारा, 80 KM)
  • तोरणा किला (50 KM)

सुझाव:

  • स्थानीय लोगों से Narvir Pilaji Gole की कहानियां सुनें
  • समाधि परिसर को स्वच्छ रखें
  • फोटोग्राफी की अनुमति है, लेकिन सम्मानपूर्वक करें
  • यदि संभव हो तो गोळे परिवार के सदस्यों से मिलें

⚔️ मराठा सैन्य परंपरा में स्थायी योगदान – आधुनिक भारतीय सेना तक

Narvir Pilaji Gole की सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने जो पैदल सेना की परंपरा स्थापित की, वह आज तक जीवित है। उनके द्वारा प्रशिक्षित मावला योद्धाओं की वीरता, अनुशासन और रणनीति की परंपरा आधुनिक भारतीय सेना में भी देखी जा सकती है।

शिवाजी महाराज के बाद पैदल सेना का विकास

Narvir Pilaji Gole द्वारा स्थापित पैदल सेना की परंपरा अगली कई पीढ़ियों तक जारी रही:

संभाजी महाराज (1680-1689):
शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज ने पैदल सेना को और मजबूत किया। उनके शासनकाल में पैदल सेना ने मुगलों के खिलाफ कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े। 9 वर्षों तक औरंगजेब की विशाल सेना का सामना करने में पैदल सेना की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

राजाराम महाराज और ताराबाई (1689-1707):
जब मुगलों ने रायगड किला जीत लिया और संभाजी महाराज को पकड़ लिया, तब राजाराम महाराज और बाद में ताराबाई ने शासन संभाला। इस कठिन समय में पैदल सेना ने दक्षिण के जिंजी किले (तमिलनाडु) से लेकर महाराष्ट्र के किलों तक मुगलों को परेशान किया।

पेशवा काल (1713-1818):
पेशवा शासन में मराठा सेना का विस्तार हुआ। बाजीराव प्रथम, बालाजी बाजीराव, और माधवराव पेशवा के समय में पैदल सेना की संख्या बढ़ी। हालांकि इस समय घुड़सवार सेना को अधिक महत्व मिला, लेकिन पैदल सेना किलों की रक्षा में अपरिहार्य रही।

तीसरी पानीपत (1761):
इस भयंकर युद्ध में मराठा पैदल सेना ने अद्भुत वीरता दिखाई। हालांकि मराठा हार गए, लेकिन पैदल सेना ने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी।

ब्रिटिश शासन में मराठा पैदल सेना

1818 के बाद:
जब अंग्रेजों ने पेशवा को हराया, तब भी मराठा पैदल सेना की परंपरा समाप्त नहीं हुई। ब्रिटिश सेना ने मराठा सैनिकों की क्षमता को पहचाना और उन्हें अपनी सेना में शामिल किया।

मराठा लाइट इन्फेंट्री का गठन (1768):
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1768 में बॉम्बे सेप्रोय के रूप में पहली इकाई बनाई। बाद में यह मराठा लाइट इन्फेंट्री बन गई। यह भारतीय सेना की सबसे पुरानी रेजिमेंटों में से एक है।

आधुनिक भारतीय सेना में मराठा परंपरा

मराठा लाइट इन्फेंट्री आज भी भारतीय सेना का गौरव है:

युद्ध घोष:
“बोला श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की जय!”
यह युद्ध घोष सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है और आज भी गूंजता है।

मार्चिंग स्पीड:
मराठा लाइट इन्फेंट्री की मार्चिंग स्पीड 140 कदम प्रति मिनट है, जबकि सामान्य रेजिमेंटों की 120 है। यह तेज गति पिलाजी गोळे के प्रशिक्षण की परंपरा है – मावला योद्धा तेज चलने और दौड़ने में माहिर थे।

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सम्मान और पुरस्कार:

  • गणतंत्र दिवस परेड में दो बार सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दल (1961, 1975)
  • 2009 में फ्रांस की बैस्टिल डे परेड में भारतीय सेना का नेतृत्व
  • दोनों विश्व युद्धों, 1962, 1965, 1971, कारगिल युद्ध में वीरता पदक

Narvir Pilaji Gole से सीखे जाने वाले सबक

आधुनिक युग के लिए:

1. अनुशासन सफलता की कुंजी है:
Narvir Pilaji Gole ने अपनी सेना में कड़ा अनुशासन रखा। आज के समय में भी – चाहे व्यवसाय हो, शिक्षा हो, या खेल – अनुशासन के बिना सफलता असंभव है।

2. प्रशिक्षण में निवेश करें:
Narvir Pilaji Gole ने अपने सैनिकों को महीनों तक प्रशिक्षित किया। आज की तेज दुनिया में भी continuous learning और skill development जरूरी है।

3. टीम वर्क व्यक्तिगत प्रतिभा से बड़ा है:
मावला पैदल सेना की ताकत उनके टीम वर्क में थी। आज की कॉर्पोरेट दुनिया में भी यह सबसे महत्वपूर्ण गुण है।

4. संसाधनों का सही उपयोग:
शिवाजी महाराज और Narvir Pilaji Gole के पास सीमित संसाधन थे, लेकिन उन्होंने उनका सही उपयोग किया। Resource management आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

5. विरासत को जिंदा रखें:
गोळे परिवार ने 350 वर्षों से अपनी विरासत को जिंदा रखा है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए।

🎯 निष्कर्ष: गुमनाम नायक को सच्चा सम्मान

हमारी जिम्मेदारी

आज जब हम मराठा इतिहास की बात करते हैं, तो हमें केवल प्रसिद्ध नामों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। सरनौबत Narvir Pilaji Gole जैसे योद्धाओं को भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए।

उनकी कहानी हमें सिखाती है:
महानता शोर-शराबे में नहीं, बल्कि मौन सेवा में है
सफलता रातों-रात नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत से मिलती है
असली विरासत वह है जो पीढ़ियों तक जीवित रहे
अनुशासन और प्रशिक्षण किसी भी लक्ष्य की नींव हैं

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गोळे परिवार का आधुनिक योगदान

मारुती अभा गोळे और उनके परिवार ने जो काम किया है, वह अनुकरणीय है:
🏔️ 1,374 किलों पर चढ़ाई (विश्व रिकॉर्ड)
🏃 Run Pirangut Run मैराथन का आयोजन
📚 गरुड़झेप मोहिम के माध्यम से इतिहास जागरूकता
👥 युवाओं को मराठा विरासत से जोड़ना

यह परिवार साबित करता है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, हमारे कार्यों में जीवित रहता है।

अंतिम संदेश

जब भी आप पुणे से मुळशी की ओर जाएं, पिरंगुट में जरूर रुकें। उस महान योद्धा को श्रद्धांजलि दें जिसने अपना पूरा जीवन स्वराज्य के लिए समर्पित कर दिया। जब आप वहां खड़े होंगे, तो आपको महसूस होगा कि इतिहास केवल बीते हुए समय की कहानी नहीं – वह हमारी पहचान है, हमारा गौरव है, और हमारी जिम्मेदारी है।

Narvir Pilaji Gole भले ही इतिहास की मुख्यधारा में गुमनाम रहे, लेकिन जो लोग मराठा इतिहास को सच्चे दिल से समझते हैं, वे जानते हैं कि स्वराज्य की नींव में उनका पत्थर भी लगा है।

❓ FAQ – Narvir Pilaji Gole

Q1: पिलाजी गोळे को “नरवीर” की उपाधि किसने और क्यों दी थी?

👉 यह उपाधि किसी दरबारी सम्मान से नहीं, बल्कि सैनिकों और ग्रामीणों की जुबान से आई थी। जब उन्होंने वैरातगड और पिरंगुट क्षेत्र में मुगलों के खिलाफ अचानक छापामार हमला किया और दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर किया, तब स्थानीय जनता ने उन्हें “नरवीर” कहा। यह उपाधि दरबार से नहीं, बल्कि जनता की श्रद्धा से जन्मी थी।

Q2: पिरंगुट स्थित पिलाजी गोळे वाडा का सबसे अनोखा रहस्य क्या है?

👉 वाडा की दीवारों में आज भी तलवारों के निशान और घोड़ों की नालों के गहरे गड्ढे दिखाई देते हैं। स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि यह वाडा केवल निवास नहीं था, बल्कि एक “गुप्त सैन्य चौकी” भी था। यहाँ से शिवाजी महाराज की सेना को संदेश भेजने के लिए विशेष ध्वनि‑संकेत (ढोल और शंख) का प्रयोग होता था।

Q3: पिलाजी गोळे की समाधि पर कौन‑सा अनजाना ऐतिहासिक तथ्य जुड़ा है?

👉 समाधि स्थल पर हर वर्ष एक विशेष दिन (स्थानीय परंपरा के अनुसार) बिना किसी आयोजन के भी ग्रामीणों का स्वतः जमावड़ा होता है। इसे “नरवीर दिवस” कहा जाता है। यह परंपरा किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा से जीवित है। यह दर्शाता है कि उनकी स्मृति केवल इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में भी अमर है।

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