Sambhaji II

Sambhaji II: 5 Decisive Years That Could Have Transformed Maratha History | Revolutionary Research Analysis

👑 Sambhaji II — मराठा इतिहास का भूला हुआ छत्रपति

जन्म से छत्रपति, लेकिन कभी वास्तविक शासक नहीं बन सके — Sambhaji II (1696-1760) की यह मार्मिक कहानी केवल एक राजकुमार की त्रासदी नहीं, बल्कि मराठा उत्तराधिकार संघर्ष और शक्ति की राजनीति का गहन विश्लेषण है। जानें कैसे ताराबाई के पुत्र और राजाराम के उत्तराधिकारी ने शाहू से 50 वर्षों का संघर्ष किया और अंततः कोल्हापुर राज्य की नींव रखी।

प्रस्तावना: एक भूले हुए छत्रपति का महत्व

मराठा इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो चमकदार तारों की तरह प्रकाशित होते हैं – शिवाजी, शाहू, बाजीराव। लेकिन कुछ ऐसे भी व्यक्तित्व हैं जो इतिहास के अंधकार में खो गए, यद्यपि उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। Sambhaji II (Sambhaji II, 1696-1760) ऐसे ही एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। वे छत्रपति राजाराम महाराज और महारानी ताराबाई के पुत्र थे, और तकनीकी रूप से मराठा साम्राज्य के वैध उत्तराधिकारी थे। लेकिन उनका जीवन एक त्रासदी बन गया – राजनीतिक षड्यंत्रों, पारिवारिक संघर्षों और शक्ति के खेल में फंसा एक राजकुमार जो कभी वास्तविक शासक नहीं बन सका।

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Sambhaji II के जीवन का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें मराठा राजनीति की जटिलताओं, उत्तराधिकार संघर्षों की विनाशकारी प्रकृति, और यह समझने में मदद करता है कि कैसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और पारिवारिक विवाद एक साम्राज्य की दिशा बदल सकते हैं। 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में जब मराठा शक्ति का तेजी से विस्तार हो रहा था, Sambhaji II एक प्रतीकात्मक उपस्थिति बनकर रह गए – एक छत्रपति जिनके पास उपाधि तो थी, लेकिन शक्ति नहीं।

यह लेख Sambhaji II के जीवन, उनके संघर्षों, राजनीतिक भूमिका और ऐतिहासिक महत्व का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह केवल एक जीवनी नहीं है, बल्कि यह उस युग की राजनीतिक संरचना, मराठा उत्तराधिकार प्रणाली की कमजोरियों, और छत्रपति पद के प्रतीकात्मक बनने की प्रक्रिया का अध्ययन है। इस अध्ययन के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि कैसे 18वीं शताब्दी में मराठा राज्य एक व्यक्ति-केंद्रित राजतंत्र से एक संस्थागत साम्राज्य में परिवर्तित हुआ।

ऐतिहासिक संदर्भ: मराठा उत्तराधिकार संकट का युग

शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद की अराजकता

छत्रपति शिवाजी महाराज की 1680 में मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य एक लंबे और कठिन संघर्ष के दौर में प्रवेश कर गया। शिवाजी के पुत्र संभाजी महाराज (1657-1689) ने शासन संभाला, लेकिन 1689 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने उन्हें बंदी बना लिया और क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी। इसके बाद संभाजी के छोटे भाई राजाराम (1670-1700) को छत्रपति घोषित किया गया। राजाराम एक साहसी शासक थे, लेकिन उन्हें लगातार मुगल दबाव का सामना करना पड़ा। 1700 में सिंहगढ़ किले में उनकी मृत्यु हो गई।

राजाराम की मृत्यु के समय उनके दो पुत्र थे – शिवाजी द्वितीय (जन्म 1696, जिन्हें बाद में Sambhaji II कहा गया) और संभाजी (बाद में शाहू नाम से जाने गए, लेकिन यह भ्रम है क्योंकि असली शाहू संभाजी प्रथम के पुत्र थे)। दोनों बच्चे अत्यंत कम आयु के थे। इस समय मराठा साम्राज्य की वास्तविक शक्ति महारानी ताराबाई (राजाराम की पत्नी) के हाथों में आ गई। ताराबाई एक असाधारण महिला थीं – कुशल प्रशासक, सेनानायक और राजनीतिज्ञ। उन्होंने अपने अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय के नाम पर 1700 से 1707 तक शासन किया।

छत्रपति शाहू की मुक्ति और विभाजन

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम ने छत्रपति शाहू (संभाजी प्रथम के पुत्र) को मुक्त कर दिया। शाहू 1689 से मुगल बंदी थे। जब वे महाराष्ट्र लौटे, तो उन्होंने सिंहासन का दावा किया। यहीं से मराठा साम्राज्य में गृहयुद्ध की शुरुआत हुई। एक ओर शाहू थे, जो संभाजी के पुत्र होने के कारण ज्येष्ठ उत्तराधिकारी थे। दूसरी ओर ताराबाई थीं, जो अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय (जिन्हें बाद में Sambhaji II कहा गया) के अधिकार की रक्षा कर रही थीं।

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यह विभाजन केवल उत्तराधिकार का मामला नहीं था, बल्कि यह भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक विभाजन भी था। उत्तरी मराठा क्षेत्र (सतारा, पुणे) शाहू का समर्थन करता था, जबकि दक्षिणी क्षेत्र (कोल्हापुर) ताराबाई और Sambhaji II के साथ था। यह विभाजन दशकों तक जारी रहा और Sambhaji II का संपूर्ण राजनीतिक जीवन इसी संघर्ष में बीता।

समकालीन राजनीतिक परिदृश्य

18वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल रही थी। मुगल साम्राज्य का पतन हो रहा था। दक्कन में निजाम स्वतंत्र होने का प्रयास कर रहे थे। यूरोपीय शक्तियां (पुर्तगाली, ब्रिटिश, फ्रांसीसी) भारतीय तटों पर अपना प्रभाव बढ़ा रही थीं। इस अराजक परिदृश्य में मराठा शक्ति का एकजुट होना अत्यावश्यक था। लेकिन Sambhaji II और शाहू के बीच संघर्ष ने मराठा शक्ति को कमजोर किया। यद्यपि शाहू के पेशवाओं (बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव) ने मराठा विस्तार जारी रखा, लेकिन यह विभाजन हमेशा एक कमजोरी बना रहा।

प्रारंभिक जीवन: राजपरिवार का बचपन और त्रासदी

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

Sambhaji II का जन्म 1696 में हुआ था। उनका मूल नाम शिवाजी द्वितीय था, जो उनके महान-दादा छत्रपति शिवाजी महाराज के सम्मान में रखा गया था। उनके पिता छत्रपति राजाराम महाराज उस समय मुगल दबाव में थे और विभिन्न किलों में घूम रहे थे। उनकी माता महारानी ताराबाई मोहिते परिवार से थीं और एक असाधारण बुद्धिमान और साहसी महिला थीं।

Sambhaji II का जन्म एक अत्यंत कठिन समय में हुआ था। मराठा साम्राज्य चारों ओर से मुगल सेना से घिरा हुआ था। औरंगजेब ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष दक्कन में बिताए थे, मराठा शक्ति को समाप्त करने के उद्देश्य से। इस वातावरण में संभाजी का बचपन शांतिपूर्ण नहीं हो सकता था। किलों में, युद्ध की आशंका में, और निरंतर स्थानांतरण में – यही उनके प्रारंभिक वर्षों की स्थिति थी।

पिता की मृत्यु और माता का शासन

मात्र चार वर्ष की आयु में Sambhaji II को पिता की मृत्यु का सामना करना पड़ा। 11 मार्च 1700 को सिंहगढ़ किले में छत्रपति राजाराम का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य में एक बड़ा संकट उत्पन्न हो गया। उत्तराधिकारी अत्यंत कम आयु का था और साम्राज्य शत्रुओं से घिरा हुआ था। इस संकट में महारानी ताराबाई ने अद्भुत साहस और नेतृत्व का प्रदर्शन किया।

ताराबाई ने अपने चार वर्षीय पुत्र को छत्रपति घोषित किया और स्वयं उनके नाम पर शासन करने लगीं। यह निर्णय उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में क्रांतिकारी था। एक महिला का सीधे शासन करना कठिन था, लेकिन अल्पवयस्क पुत्र के नाम पर शासन सामाजिक रूप से स्वीकार्य था। ताराबाई ने 1700 से 1707 तक सफलतापूर्वक शासन किया। उन्होंने मुगलों के विरुद्ध कई युद्ध लड़े और जीते। उन्होंने प्रशासन को सुव्यवस्थित किया और मराठा सरदारों को एकजुट रखा।

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Sambhaji II के लिए यह काल महत्वपूर्ण था। यद्यपि वे केवल नाम के छत्रपति थे, लेकिन उन्होंने अपनी माता को शासन करते देखा। उन्होंने सीखा कि राजनीति में शक्ति, साहस और कूटनीति की आवश्यकता होती है। लेकिन उन्होंने यह भी देखा कि उनकी अपनी भूमिका केवल प्रतीकात्मक है। यह अनुभव उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करने वाला था।

शिक्षा और प्रशिक्षण

राजपरिवार में जन्मे होने के कारण Sambhaji II को उच्च शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने मराठी, संस्कृत और फारसी भाषाओं का अध्ययन किया। धार्मिक शिक्षा, इतिहास, और राजनीति के पाठ पढ़ाए गए। सैन्य प्रशिक्षण में घुड़सवारी, तलवारबाजी, और युद्ध कला सिखाई गई। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा उन्हें अपनी माता से मिली – राजनीतिक व्यावहारिकता, कूटनीति, और शक्ति के संतुलन की समझ।

ताराबाई ने यह सुनिश्चित किया कि संभाजी शिवाजी महाराज की विरासत को समझें। उन्हें स्वराज्य का स्वप्न, मराठा गौरव, और राजधर्म की शिक्षा दी गई। लेकिन साथ ही संभाजी ने यह भी देखा कि वास्तविक शक्ति उनके पास नहीं है। सभी महत्वपूर्ण निर्णय उनकी माता लेती थीं, और सरदार भी उन्हें ही वास्तविक नेता मानते थे। यह स्थिति संभाजी के आत्मविश्वास को प्रभावित करने वाली थी।

उत्तराधिकार संघर्ष: शाहू बनाम संभाजी द्वितीय

1707: विभाजन का वर्ष

1707 मराठा इतिहास का एक निर्णायक वर्ष था। मार्च में औरंगजेब की मृत्यु हुई, और मई में छत्रपति शाहू को मुगलों ने मुक्त कर दिया। जब शाहू महाराष्ट्र लौटे, तो उन्होंने सिंहासन का दावा किया। यह दावा वैध था – वे संभाजी प्रथम के पुत्र थे और उत्तराधिकार में ज्येष्ठ थे। लेकिन महारानी ताराबाई ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया।

ताराबाई का तर्क यह था कि शाहू 28 वर्षों से मुगल बंदी रहे हैं, उन पर मुगल प्रभाव है, और उनकी वफादारी संदिग्ध है। साथ ही, पिछले 7 वर्षों से Sambhaji II छत्रपति के रूप में मान्य हैं और मराठा सरदारों ने उनके प्रति निष्ठा की शपथ ली है। इसलिए शाहू का दावा अमान्य है। यह तर्क राजनीतिक रूप से कमजोर था, लेकिन ताराबाई के पास सैन्य शक्ति थी।

अक्टूबर 1707 में खेड (सतारा के पास) में दोनों पक्षों की सेनाओं का आमना-सामना हुआ। यह एक मार्मिक स्थिति थी – मराठा बनाम मराठा। युद्ध में शाहू की सेना विजयी हुई। ताराबाई की सेना पीछे हट गई। इस पराजय के बाद Sambhaji II और ताराबाई को कोल्हापुर क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी। शाहू ने सतारा पर अधिकार कर लिया और 12 जनवरी 1708 को उनका राज्याभिषेक हुआ।

कोल्हापुर में छाया शासन

खेड की पराजय के बाद Sambhaji II का जीवन एक छाया शासक का जीवन बन गया। वे कोल्हापुर क्षेत्र में रहे, और अपने समर्थक सरदारों के बीच अभी भी छत्रपति के रूप में मान्य थे। लेकिन उनकी शक्ति सीमित थी। अधिकांश मराठा सरदार धीरे-धीरे शाहू के पक्ष में चले गए। शाहू के पास पेशवा बालाजी विश्वनाथ जैसे कुशल प्रशासक और बाजीराव जैसे महान सेनानायक थे। वे मराठा विस्तार कर रहे थे और शक्ति बढ़ा रहे थे।

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इसके विपरीत, Sambhaji II के पास न तो प्रतिभाशाली सलाहकार थे और न ही बड़ी सैन्य शक्ति। उनकी माता ताराबाई वास्तविक निर्णयकर्ता बनी रहीं। यह स्थिति Sambhaji II के लिए अत्यंत निराशाजनक थी। वे छत्रपति की उपाधि धारण करते थे, लेकिन वास्तविक शासक नहीं थे। न शाहू उन्हें मान्यता देते थे, न उनकी अपनी माता उन्हें स्वतंत्र शासक बनने देती थीं। यह एक दोहरी बंदी थी।

1731 का समझौता: औपचारिक विभाजन

दशकों के संघर्ष के बाद, 1731 में वारणा नदी को सीमा मानकर एक समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार:

  • छत्रपति शाहू – उत्तरी मराठा क्षेत्र (सतारा राजधानी)
  • Sambhaji II – दक्षिणी क्षेत्र (कोल्हापुर राजधानी)

यह समझौता एक राजनीतिक आवश्यकता थी। दोनों पक्ष लंबे युद्ध से थक चुके थे और मराठा शक्ति को बाह्य शत्रुओं से निपटने की जरूरत थी। लेकिन यह समझौता Sambhaji II के लिए कड़वा था। उन्हें छोटे और कम समृद्ध क्षेत्र के साथ संतुष्ट होना पड़ा। शाहू की राजधानी सतारा प्रमुख बनी रही, और पेशवा प्रणाली ने वहां से मराठा साम्राज्य का विस्तार जारी रखा। कोल्हापुर एक छोटी रियासत बनकर रह गई।

राजनीतिक भूमिका: एक प्रतीकात्मक छत्रपति का संघर्ष

कोल्हापुर शासन: सीमित शक्ति में प्रयास

1731 के समझौते के बाद (Sambhaji II) ने कोल्हापुर क्षेत्र पर शासन किया। उनका राज्य तुलनात्मक रूप से छोटा था, लेकिन उन्होंने इसे सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया। उन्होंने स्थानीय प्रशासन को मजबूत किया, राजस्व संग्रह की व्यवस्था स्थापित की, और किलों की मरम्मत करवाई। लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे हमेशा शाहू की छाया में रहे।

मराठा साम्राज्य की मुख्यधारा सतारा से संचालित होती थी। पेशवा बाजीराव उत्तर भारत में विजय अभियान चला रहे थे। माल्वा, गुजरात, बुंदेलखंड – सभी क्षेत्रों में मराठा झंडा फहर रहा था। इन सभी महान घटनाओं में Sambhaji II की कोई भूमिका नहीं थी। वे कोल्हापुर में एक स्थानीय शासक बनकर रह गए।

मातृ-पुत्र संबंधों में तनाव

महारानी ताराबाई और Sambhaji II के बीच संबंध जटिल थे। ताराबाई एक शक्तिशाली व्यक्तित्व थीं, जिन्होंने दशकों तक वास्तविक शक्ति का उपयोग किया था। उन्हें अपने पुत्र को शक्ति सौंपने में कठिनाई होती थी। Sambhaji II की आयु बढ़ने के साथ, उन्होंने स्वतंत्र रूप से शासन करने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन ताराबाई इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं।

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ऐतिहासिक अभिलेखों से संकेत मिलता है कि मां-बेटे के बीच कई बार मतभेद हुए। कुछ मामलों में संभाजी ने अपने निर्णय लिए, जिन्हें ताराबाई ने पलट दिया। यह स्थिति संभाजी के लिए अपमानजनक थी। वे छत्रपति की उपाधि धारण करते थे, लेकिन अपनी माता के सामने असहाय थे। यह मनोवैज्ञानिक संघर्ष उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करता रहा।

सीमित सैन्य भूमिका

Sambhaji II ने कुछ छोटे सैन्य अभियान चलाए, मुख्यतः दक्षिणी कर्नाटक क्षेत्र में। लेकिन ये अभियान सीमित सफलता वाले थे। उनके पास बड़ी सेना नहीं थी, और न ही बाजीराव जैसे प्रतिभाशाली सेनापति। उनकी सैन्य उपलब्धियाँ शाहू के पेशवाओं की तुलना में नगण्य थीं। यह तुलना उन्हें निरंतर याद दिलाती रही कि वे मराठा शक्ति की मुख्यधारा से बाहर हैं।

एक महत्वपूर्ण घटना यह थी कि कभी-कभी शाहू के पेशवा Sambhaji II के क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करते थे। जब दक्षिणी क्षेत्रों में मराठा अभियान होते थे, तो पेशवा की सेनाएं कोल्हापुर क्षेत्र से भी गुजरती थीं, और कभी-कभी Sambhaji II से सहयोग की मांग करती थीं। यह संभाजी के लिए एक कठिन स्थिति थी – वे न तो पूर्णतः स्वतंत्र थे, न ही शाहू के अधीनस्थ। यह अस्पष्टता उनकी स्थिति को और कमजोर बनाती थी।

ऐतिहासिक विश्लेषण: विद्वानों के दृष्टिकोण

इतिहासकारों का मूल्यांकन

Sambhaji II के ऐतिहासिक मूल्यांकन पर विद्वानों में विभिन्न मत हैं। प्रख्यात मराठा इतिहासकार गोविंद सखाराम सरदेसाई ने अपने विस्तृत कार्य “New History of the Marathas” में संभाजी को “एक दुर्भाग्यपूर्ण राजकुमार” के रूप में वर्णित किया है। सरदेसाई के अनुसार, संभाजी के पास न तो अवसर था और न ही परिस्थितियां जो उन्हें एक प्रभावी शासक बनने देतीं। उनका जीवन राजनीतिक परिस्थितियों का शिकार था।

सर जदुनाथ सरकार, जो मराठा इतिहास के विद्वान थे, ने संभाजी द्वितीय को “छत्रपति पद के पतन का प्रतीक” बताया है। सरकार के अनुसार, शाहू के समय में पेशवा प्रणाली की स्थापना हुई और छत्रपति का पद प्रतीकात्मक बनने लगा। Sambhaji II इस प्रक्रिया के जीवित उदाहरण थे। उनके पास उपाधि थी लेकिन शक्ति नहीं।

आधुनिक इतिहासकार स्टीवर्ट गॉर्डन ने अपनी पुस्तक “The Marathas 1600-1818” में संभाजी के जीवन को “मराठा राजनीति की जटिलताओं का केस स्टडी” बताया है। गॉर्डन के अनुसार, संभाजी का अनुभव यह दर्शाता है कि कैसे व्यक्तिगत प्रतिभा और योग्यता से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिस्थितियां और समय होते हैं।

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विवादास्पद पहलू

Sambhaji II के संबंध में कुछ विवादास्पद प्रश्न हैं:

1. क्या संभाजी एक कमजोर शासक थे या परिस्थितियों के शिकार? कुछ इतिहासकार मानते हैं कि संभाजी में नेतृत्व क्षमता की कमी थी और वे अपनी माता के प्रभुत्व से मुक्त नहीं हो सके। दूसरे विद्वानों का तर्क है कि परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल थीं कि कोई भी उनकी जगह होता तो सफल नहीं हो सकता था।

2. क्या ताराबाई ने अपने पुत्र की उन्नति को रोका? यह एक संवेदनशील प्रश्न है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि ताराबाई की शक्ति के प्रति आसक्ति ने संभाजी को एक स्वतंत्र शासक बनने से रोका। अन्य का कहना है कि ताराबाई ने केवल राजनीतिक वास्तविकता को समझा – शाहू की शक्ति इतनी बढ़ चुकी थी कि संभाजी के पास कोई वास्तविक विकल्प नहीं था।

3. क्या 1731 का समझौता उचित था? इस समझौते ने मराठा साम्राज्य को स्थायी रूप से विभाजित कर दिया। कुछ विद्वान मानते हैं कि यदि संभाजी ने शाहू को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया होता और उनके अधीन कार्य किया होता, तो मराठा शक्ति अधिक एकजुट होती। अन्य का तर्क है कि समझौता एक राजनीतिक आवश्यकता थी जिसने कम से कम आंतरिक युद्ध को समाप्त किया।

विरासत और दीर्घकालिक प्रभाव: कोल्हापुर की स्थापना

कोल्हापुर राज्य की नींव

Sambhaji II की सबसे महत्वपूर्ण विरासत कोल्हापुर राज्य की स्थापना थी। 1731 के समझौते के बाद जो क्षेत्र उन्हें मिला, वह एक स्वतंत्र रियासत बन गया। यद्यपि यह राज्य सतारा से छोटा और कम शक्तिशाली था, लेकिन यह 1947 तक अस्तित्व में रहा – भारतीय स्वतंत्रता तक। कोल्हापुर के भोंसले राजवंश ने 200 से अधिक वर्षों तक शासन किया।

कोल्हापुर राज्य ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी। यह सतारा की पेशवा-प्रधान व्यवस्था से अलग था। कोल्हापुर में छत्रपति का पद अधिक सम्मानित रहा, यद्यपि उनकी शक्ति सीमित थी। 19वीं और 20वीं शताब्दी में कोल्हापुर के कुछ शासक, विशेषकर छत्रपति शाहू महाराज (1874-1922, Sambhaji II के वंशज), ने सामाजिक सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए।

राजनीतिक विभाजन की विरासत

Sambhaji II के जीवन और संघर्ष ने मराठा साम्राज्य में एक स्थायी विभाजन स्थापित किया। सतारा और कोल्हापुर की दो छत्रपति परंपराएं समानांतर चलती रहीं। यद्यपि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध नहीं करते थे, लेकिन वे कभी पूर्णतः एकजुट भी नहीं हुए। यह विभाजन मराठा शक्ति की एक कमजोरी बनी रही।

जब 18वीं शताब्दी के अंत में मराठा साम्राज्य ब्रिटिश चुनौती का सामना कर रहा था, तो यह आंतरिक विभाजन एक समस्या साबित हुआ। कोल्हापुर और सतारा के बीच समन्वय की कमी ने मराठा प्रतिरोध को कमजोर किया। 1818 में जब ब्रिटिश ने पेशवा को पराजित किया, तो मराठा साम्राज्य समाप्त हो गया। लेकिन कोल्हापुर और सतारा दोनों रियासतें अलग-अलग ब्रिटिश संरक्षण में चली गईं।

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सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव

कोल्हापुर ने अपनी सांस्कृतिक पहचान विकसित की। यह क्षेत्र मराठी संस्कृति, धर्म और परंपरा का केंद्र बना रहा। कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। Sambhaji II और उनके उत्तराधिकारियों ने इस मंदिर का संरक्षण किया। कोल्हापुर क्षेत्र में पारंपरिक कुश्ती (मल्लखंब), संगीत और कला को प्रोत्साहन मिला।

20वीं शताब्दी में कोल्हापुर के शासकों, विशेषकर छत्रपति शाहू महाराज (1874-1922), ने सामाजिक सुधार के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य किए। उन्होंने शिक्षा में आरक्षण की शुरुआत की, जो आज के भारत में सामाजिक न्याय नीतियों की नींव बनी। यह विरासत अप्रत्यक्ष रूप से Sambhaji II द्वारा स्थापित कोल्हापुर राज्य से जुड़ी है।

लेखकीय टिप्पणी: इतिहास की त्रासदी और सबक

इतिहास के विद्यार्थी के रूप में, जब मैं संभाजी द्वितीय (Sambhaji II) के जीवन का अध्ययन करता हूं, तो मुझे एक गहरी त्रासदी दिखाई देती है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो जन्म से ही सत्ता के लिए नियत था, लेकिन परिस्थितियों ने उसे कभी वास्तविक शक्ति का अनुभव नहीं करने दिया। मात्र चार वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु, फिर एक शक्तिशाली माता की छाया में जीवन, और अंत में एक और शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी (शाहू) के उदय से पराजय – यह सब एक व्यक्ति के मनोविज्ञान को किस प्रकार प्रभावित करता होगा, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है।

Sambhaji II का जीवन हमें यह सिखाता है कि इतिहास केवल महान विजयों और शक्तिशाली शासकों की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है जो परिस्थितियों के शिकार बने, जिनके पास उपाधि तो थी लेकिन शक्ति नहीं, जो इतिहास की मुख्यधारा से बाहर रह गए। संभाजी की त्रासदी यह थी कि वे गलत समय पर पैदा हुए। यदि वे शाहू से कुछ वर्ष बड़े होते, या यदि शाहू को मुगलों ने मुक्त नहीं किया होता, तो संभाजी का जीवन बिल्कुल अलग होता।

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लेकिन इतिहास में “यदि” और “होता तो” का कोई स्थान नहीं है। जो हुआ, वह हुआ। Sambhaji II को एक सीमित राज्य के साथ संतुष्ट होना पड़ा। लेकिन उनकी विरासत पूर्णतः निरर्थक नहीं थी। उन्होंने कोल्हापुर राज्य की नींव रखी, जो 200 वर्षों से अधिक समय तक चला। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि राजाराम की परंपरा जीवित रहे। यद्यपि उनका नाम शाहू या बाजीराव जितना प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन वे मराठा इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

आज, जब हम 21वीं सदी में बैठकर इतिहास का अध्ययन करते हैं, तो हमें Sambhaji II जैसे व्यक्तित्वों को याद रखना चाहिए। वे हमें याद दिलाते हैं कि प्रत्येक ऐतिहासिक घटना के पीछे जीवित मनुष्य थे, उनकी आशाएं और निराशाएं थीं, उनके संघर्ष और समझौते थे। इतिहास केवल विजेताओं की कहानी नहीं है – यह उन सभी की कहानी है जिन्होंने अपने समय को जिया।

स्रोत और संदर्भ ग्रंथ

प्राथमिक स्रोत

1. समकालीन दस्तावेज:

  • भोंसले घराने के अभिलेख (कोल्हापुर)
  • पेशवा दफ्तर के दस्तावेज (पुणे)
  • ताराबाई कालीन पत्राचार
  • सतारा राज्य अभिलेख

2. बख़र (Bakhar) – मराठी ऐतिहासिक ग्रंथ:

  • राजाराम चरित्र बख़र
  • शाहू चरित्र बख़र
  • ताराबाई संबंधित बख़र

द्वितीयक स्रोत – प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथ

1. गोविंद सखाराम सरदेसाई (G.S. Sardesai):

  • “New History of the Marathas” (तीन खंड)
  • खंड 2 में संभाजी द्वितीय और ताराबाई का विस्तृत विवरण

2. सर जदुनाथ सरकार (Sir Jadunath Sarkar):

  • “Shivaji and His Times”
  • “House of Shivaji” (शिवाजी के उत्तराधिकारियों का इतिहास)
  • “Fall of the Mughal Empire”

3. स्टीवर्ट गॉर्डन (Stewart Gordon):

  • “The Marathas 1600-1818” (Cambridge University Press)
  • मराठा राजनीतिक संरचना का आधुनिक विश्लेषण

4. सी.ए. किनकैड और डी.बी. परासनिस (C.A. Kincaid and D.B. Parasnis):

  • “A History of the Maratha People” (तीन खंड)

5. वी.के. राजवाडे (V.K. Rajwade):

  • मराठा इतिहास पर व्यापक शोध संकलन
  • मूल दस्तावेजों का प्रकाशन

क्षेत्रीय इतिहास

1. Maharashtra State Gazetteers:

  • Kolhapur District Gazetteer
  • Satara District Gazetteer

2. स्थानीय अध्ययन:

  • कोल्हापुर राज्य का इतिहास
  • दक्षिणी मराठा क्षेत्र का अध्ययन

आधुनिक शोध कार्य

1. शोध पत्र:

  • Journal of the Asiatic Society of Bombay
  • Indian Historical Review
  • Maharashtra History Journal

2. विश्वविद्यालय शोध प्रबंध:

  • शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर के शोध कार्य

❓ (FAQ)

1. संभाजी द्वितीय को वास्तविक शासक क्यों नहीं माना जाता, जबकि वे छत्रपति की उपाधि धारण करते थे?

यह मराठा इतिहास का सबसे मार्मिक विरोधाभास है। संभाजी द्वितीय को 1700 में मात्र 4 वर्ष की आयु में छत्रपति घोषित किया गया, लेकिन वास्तविक शक्ति हमेशा उनकी माता महारानी ताराबाई के हाथों में रही। जब 1707 में छत्रपति शाहू मुगल कैद से लौटे और सिंहासन का दावा किया, तो संभाजी को दोहरी बंदी का सामना करना पड़ा – एक ओर उनकी माता जो शक्ति छोड़ने को तैयार नहीं थीं, दूसरी ओर शाहू जिनके पास बेहतर सैन्य शक्ति और कुशल पेशवा थे। 1731 के वारणा नदी समझौते के बाद भी संभाजी को कोल्हापुर का छोटा क्षेत्र मिला, जबकि वास्तविक मराठा शक्ति सतारा से संचालित होती रही। उनका पूरा जीवन “छत्रपति” उपाधि के साथ जीना लेकिन कभी वास्तविक शासक न बन पाना – यही उनकी त्रासदी थी।

2. यदि खेड के युद्ध (1707) में संभाजी द्वितीय जीत जाते, तो मराठा इतिहास कैसे बदल जाता?

यह इतिहास का सबसे रोचक “क्या होता यदि” प्रश्नों में से एक है। यदि अक्टूबर 1707 के खेड युद्ध में ताराबाई और संभाजी की सेना विजयी होती, तो शाहू को सतारा से बाहर रखा जा सकता था। लेकिन वास्तविकता यह है कि संभाजी की हार केवल सैन्य नहीं थी – यह राजनीतिक थी। अधिकांश शक्तिशाली मराठा सरदार धनाजी जाधव, बालाजी विश्वनाथ जैसे लोग शाहू के पक्ष में थे क्योंकि वे संभाजी प्रथम के पुत्र थे और ज्येष्ठ उत्तराधिकारी थे। यदि संभाजी द्वितीय जीत भी जाते, तो शायद मराठा साम्राज्य का वह व्यापक विस्तार नहीं होता जो बाजीराव पेशवा ने किया। लेकिन साथ ही, मराठा साम्राज्य में स्थायी विभाजन भी नहीं होता। इतिहास हमें सिखाता है कि कभी-कभी हार भी एक नई शुरुआत होती है – संभाजी की हार ने कोल्हापुर राज्य को जन्म दिया जो 200+ वर्षों तक चला।

3. संभाजी द्वितीय और छत्रपति शाहू के बीच व्यक्तिगत संबंध कैसे थे – क्या वे शत्रु थे या केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी?

यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म है और ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसका स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता। संभाजी द्वितीय और शाहू तकनीकी रूप से चचेरे भाई थे (संभाजी प्रथम और राजाराम भाई थे)। व्यक्तिगत स्तर पर, कोई साक्ष्य नहीं है कि उनके बीच व्यक्तिगत शत्रुता थी। वास्तव में, 1731 के समझौते की शर्तें यह दर्शाती हैं कि दोनों पक्ष एक सम्मानजनक समाधान चाहते थे। शाहू ने संभाजी को “छत्रपति” उपाधि बनाए रखने दी और कोल्हापुर क्षेत्र में स्वतंत्र शासन की अनुमति दी। समकालीन बख़रों (ऐतिहासिक ग्रंथों) से पता चलता है कि दोनों ने एक-दूसरे को पत्र लिखे और कुछ औपचारिक अवसरों पर सम्मान व्यक्त किया। असली संघर्ष उनके बीच नहीं, बल्कि उनके समर्थकों – विशेषकर ताराबाई बनाम शाहू के पेशवा के बीच था। यह राजनीतिक आवश्यकता थी, व्यक्तिगत शत्रुता नहीं।

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👑 Sambhaji II और मराठा उत्तराधिकार संघर्ष की गहराई

यह लेख मराठा साम्राज्य के भूले-बिसरे शासकों और उत्तराधिकार संकटों पर आधारित हमारी शोध-श्रृंखला का हिस्सा है। Sambhaji II के संघर्ष और कोल्हापुर राज्य की स्थापना को गहराई से समझने के लिए नीचे दिए गए आंतरिक और विश्वसनीय बाहरी स्रोत देखें।

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